भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 976

अथ मूत्रवर्गः तत्र गोमूत्रगुणानाह गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं क्षारं तिक्तकषायकम्। लघ्वग्निदीपनं मेध्यं पित्तकृत्कफवातहृत् ।।१।। शूलगुल्मोदरानाहकण्ड्वक्षिमुखरोगजित् । किलासगदवातामवस्तिरुक्कुष्ठनाशनम् ।। कासवासापहं शोथकामलापाण्डुरोगहृत् ।।२।। कण्डूकिलासगदशूलमुखाक्षिरोगान्गुल्मातिसारमरुदामयमूत्ररोधान् । कासं सकुष्ठजठरक्रिमिपाण्डुरोगानगोमूत्रमेकमपि पीतमपाकरोति ।।३।। सर्वेष्वपि च मूत्रेष्ु गोमूत्रं गुणतोऽधिकम् । अतोऽविशेषात्कथने मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ।।४।। प्लीहोदरश्वासकासशोथवर्चोग्रहापहम् ।।५।। शूलगुल्मरुजाऽऽनाहकामलापाण्डुरोगहृत् । कषायं तिक्ततीक्ष्णं च पूरणात्कर्णशूलहृत् ।।६।। गोमूत्र-कटु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, क्षार, लघु, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पित्तकारक, कफ तथा वातनाशक एवम् शूल, गुल्म, उदररोग, आनाह (अफारा), खुजली, नेत्र तथा मुखसम्बन्धी रोग, किलास रोग (कुष्ठभेद), वात, आम, बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, कास, श्वास, शोथ, कामला तथा पाण्डुरोग को नष्ट करने वाला होता है। और केवल एक गोमूत्र पान करने से खुजली, किलास रोग, शूल, मुख तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, गुल्म, अतिसार, वातरोग, मूत्ररोध, कास, कुष्ठ, उदररोग, क्रिमि तथा पाण्डुरोग ये सब दूर हो जाते हैं। और सम्पूर्ण मूत्रों में गोमूत्र ही सबसे अधिक गुणकारी होता है, अतः जहाँ पर सामान्य रूप से केवल "मूत्र" शब्द का प्रयोग आवे वहाँ पर "गोमूत्र" का ही बोध करना चाहिये। गोमूत्र-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, तीक्ष्ण गुण युक्त, कान में डालने से कर्णशूलनाशक एवम्-प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, शोथ, मलरोध, शूल, गुल्म, आनाह (अफारा), कामला तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला होता है। [१-६] अथ मनुष्यमूत्रगुणानाह नरमूत्रं गरं हन्ति सेवितं तद्रसायनम् । रक्तपामाहरं तीक्ष्णं सक्षारलवणं स्मृतम् ।।७।। मनुष्य का मूत्र-तीक्ष्ण, क्षार तथा लवण रसयुक्त, गरसंज्ञक विष, रक्तविकार तथा पामारोग नाशक होता है एवम् यह सेवन करने से रसायन है। [७] अथ मूत्रस्य सामान्यपरिभाषामाह गोऽजाऽविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रे भनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम् ।।९।। मूत्रविषयक सामान्य परिभाषा-गाय, बकरी तथा भैंस इनमें स्त्री जाति का मूत्र उत्तम होता है तथा गदहा, ऊँट, हाथी, मनुष्य तथा घोड़ा इनमें पुरुष जाति का मूत्र हितकारक होता है अर्थात् जहाँ पर प्रयोग करना हो तो वहाँ पर उक्त मूत्रों का ही ग्रहण करना चाहिये। [९] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मूत्रवर्गः समाप्तः ।।१८।।