भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 977, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तैलवर्गः
तत्र तैलस्य स्वरूपं गुणं चाह
तिलादिस्निग्धवस्तूनां स्नेहस्तैलमुदाहृतम्। तत्तु वातहरं सर्वं विशेषात्तिलसम्भवम् ।।१।। तेल का स्वरूप—तिल आदि स्निग्ध (स्नेहयुक्त) वस्तुओं के स्नेह भाग को मुनि लोग “तैल” कहते हैं। तेल—सभी प्रकार के तेल यद्यपि वातनाशक होते हैं तथापि तिल का तेल विशेष रूप से वात को नष्ट करने वाला होता है। [१]
अथ तिलतैलगुणानाह
तिलतैलं गुरु स्थैर्यबलवर्णकरं सरम्। वृष्यं विकाशि विशदं मधुरं रसपाकयोः ।।२।। सूक्ष्मं कषायानुरसं तिक्तं वातकफापहम्। वीर्येणोष्णं हिमं स्पर्शे बृंहणं रक्तपित्तकृत् ।।३।। लेखनं बद्धविण्मूत्रं गर्भाशयविशोधनम्। दीपनं बुद्धिदं मेध्यं व्यवायि व्रणमेहनुत् ।।४।। श्रोत्रयोनिशिरःशूलनाशनं लघुताकरम्। त्वच्यं केश्यं च चक्षुष्यमभ्यङ्गे भोजनेऽन्यथा ।।५।। छिन्नभिन्नच्युतोत्पिष्टमथितक्षतपिच्चिते । भग्नस्फुटितविद्धाग्निदग्धविश्लिष्टदारिते ।।६।। तथाऽभिहतनिर्भुग्नमृगव्याघ्रादिविक्षते । वस्तौ पानेऽन्नसंस्कारे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।। सेकाभ्यङ्गावगाहेषु तिलतैलं प्रशस्यते ।।७।। तिल का तेल—गुरु, स्थिरता तथा बल कारक, वर्ण को उत्तम करने वाला, सारक, वृष्य (वीर्यवर्धक), विकाशी, विशद, रस तथा पाक में मधुर, सूक्ष्म गुण युक्त, आरम्भ में तिक्तरसयुक्त पश्चात् कषाय रस युक्त, वात तथा कफ नाशक, उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), रक्तपित्तकारक, लेखन, मल तथा मूत्र को बाँधने वाला, गर्भाशय का शोधन करने वाला, अग्निदीपक, बुद्धिदायक, मेधा के लिये हितकर, व्यवायि गुण युक्त, व्रण तथा मेह को दूर करने वाला, कान, योनि तथा शिर सम्बन्धी शूल नाशक, शरीर में लघुता करने वाला, अभ्यङ्ग (शरीर में मालिश) करने से त्वचा, केश तथा नेत्रों के लिये हितकर, किन्तु भोजन करने से अन्यथा होता है अर्थात् त्वचा, केश तथा नेत्र के लिये अहितकर होता है। एवम्—छिंदजाने, भिदजाने, गिरजाने, पिसजाने, मसलजाने, घाव हो जाने, पिचजाने, टूटजाने, फटजाने, बिधजाने, अग्नि से जलजाने, हड्डियों के अपने स्थान से हटजाने, चिरजाने, चोट लगजाने, किसी अंग के टेढ़े हो जाने तथा मृग या बाघ आदि से घायल हो जाने पर तिल का तेल हितकर होता है, एवम्—बस्तिकर्म, पीने तथा अन्न के संस्कार करने (छौंकने) में और नस्य (नास) लेने तथा कान व आँख में डालने में एवम् सेंकने, मर्दन तथा अवगाहन करने में तिल का तेल उत्तम होता है। [२-७] तिल—इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के (पृष्ठ ८०४) पर किया गया है।
ननु बृंहणलेखनयोः कथं सामानाधिकरण्यमित्याह
रूक्षादिदुष्टः पवनः स्रोतः संकोचयेद् यदा। रसोऽसम्यग्वहन् कार्श्यं कुर्याद्रक्तान्यवर्द्धनम् ।।८।। तेषु प्रवेष्टुं सरतासौक्ष्म्यस्निग्धत्वमार्दवैः। तैलं क्षमं रसं नेतुं कृशानां तेन बृंहणम् ।।९।। व्यवायिसूक्ष्मतक्ष्णोष्णसरत्वैर्भेदसः क्षयम्। शनैः प्रकरुते तैलं तेन लेखनमीरितम् ।।१०।। द्रुतं पुरीषं बध्नाति स्खलितं पत्प्रवर्त्तयेत्। ग्राहकं सारकञ्चापि तेन तैलमुदीरितम् ।।११।।