भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 978

तैलवर्गः ९२७ यहाँ पर यह शङ्का होती है कि—परस्पर विरुद्ध धर्म वाले बृंहण तथा लेखन ये दोनों एक साथ तिल के तेल में कैसे रहते हैं ? इसी का उत्तर देते हुये कहते हैं कि—रूक्षादि पदार्थों के सेवन करने से जब वायु दुष्ट होकर स्रोतोमार्ग को संकुचित करता है तब रस भली-भाँति नहीं बहने पाता और उससे रक्त की भी वृद्धि नहीं होने पाती अतः उक्त रस शरीर में कृशता करने लगता है। ऐसी स्थिति में तिलतैल—उन संकुचित स्रोतों में अपने सरता, सूक्ष्मता, स्निग्धता तथा मृदुता इन सब गुणों के द्वारा प्रवेश करने के लिये तथा रसों को सर्वत्र यथास्थान पहुँचाने के लिये समर्थ होता है, इसी से कृश (दुर्बल) लोगों के लिये बृंहण (रस-रक्त-मांसादि का वर्धक) कहा गया है और व्यवायी, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, उष्ण तथा सर इन सब गुणों से युक्त होने से इनके द्वारा मेदा का धीरे-धीरे क्षय करता है, अतः तिल का तेल “लेखन” कहा गया है। और पतले मल को बाँधता है तथा जो मल अपने स्थान से हट चुका है उसकी प्रवृत्ति कराता है अतः क्रम से तेल ग्राहक तथा सारक दोनों कहा गया है। [८-११] अथ घृततैलयोः परिभाषामाह घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यं प्रजायते। तैलं पक्वमपक्वं वा चिरस्थायि गुणाधिकम् ।।१२।। घी तथा तेल की परिभाषा—एक वर्ष से अधिक पुराना होने पर पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है किन्तु तेल चाहे पकाया हुआ हो अथवा कच्चा ही हो जैसे-जैसे पुराना होता जाता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है। [१२] अथ सर्षपराजिका तैलयोगुणानाह दीपनं सार्षपं तैलं कटुपाकरसं लघु। लेखनं स्पर्शवीर्य्योष्णं तीक्ष्णं पित्तास्रदूषकम् ।।१३।। कफमेदोऽनिलार्शोघ्नं शिरःकर्णामयापहम्। कण्डूकुष्ठकृमिश्वित्रकोठदुष्टकृमिप्रणुत् ।।१४।। तद्वद्राजिकयोस्तैलं विशेषान्मूत्रकृच्छ्रकृत् ।।१५।। सरसों का तेल—अग्निदीपक, रस तथा विपाक में कटु रस युक्त, लघु, लेखन, स्पर्श तथा वीर्य में उष्ण, तीक्ष्ण, पित्त तथा रक्त को दूषित करने वाला एवम्-कफ, मेद, वायु, बवासीर, शिर तथा कान सम्बन्धी रोग, खुजली, कुष्ठ, कृमि, श्वेतकुष्ठ, कोठ तथा दुष्ट कृमि को नष्ट करने वाला होता है, इसी प्रकार से दोनों प्रकार के राई के तेल के भी गुण हैं—किन्तु विशेष कर उन दोनों के तेल मूत्रकृच्छ्र-कारक होते हैं। [१४-१५] ❖ राजिकयोः = कृष्णराजिकारक्तराजिकयोः ।।१५।। यहाँ पर मूल में “राजिकयोः” पद से “दोनों प्रकार की राई अर्थात् काली राई तथा लाल राई के” यह अर्थ समझना चाहिये। [१५] इनका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८२९ पर किया गया है। अथ तुवरीतैलगुणानाह तीक्ष्णोष्णं तुवरीतैलं लघु ग्राहि कफास्रजित्। वह्निकृद्विषहृत्कण्डूकुष्ठकोठकृमिप्रणुत् ।। मेदोदोषापहं चापि व्रणशोथहरं परम् ।।१६।। तुवरी का तेल—तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, ग्राही, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, अग्निकारक, विषनाशक एवम्-खुजली, कुष्ठ, कोठ, कृमि तथा मेद सम्बन्धी दोष को नष्ट करने वाला, एवम् व्रण तथा शोथ को अत्यन्त दूर करने वाला होता है। [१६] इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८०६ पर किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA