भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 979

९२८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथातसीतैलगुणानाह अतसीतैलमाग्नेयं स्निग्धोष्णं कफपित्तकृत्। कटुपाकमचक्षुष्यं बल्यं वातहरं गुरु ।।१७।। मलकृद्रसतः स्वादु ग्राहि त्वग्दोषहृद् घनम् ।।१८।। वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णस्य पूरणे। अनुपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ।।१९।। अलसी का तेल-आग्नेय (अग्नि के अधिक अंशों से युक्त), स्निग्ध उष्ण, कफ तथा पित्त कारक, विपाक में कटु रसयुक्त, नेत्रों के लिए अहितकर, बलकारक, वातनाशक, गुरु, मलकारक, मधुररसयुक्त, ग्राही, त्वचा गत दोष को दूर करने वाला और घन है और बस्तिकर्म पीने तथा मालिश करने में एवम् नस्य (नास) लेने तथा कान में डालने के लिये और वायु को शान्त करने के लिये अनुपान विधि में अलसी के तेल का प्रयोग करना चाहिये । [१७-१९] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२७ पर किया गया है । अथ कुसुम्भतैलगुणानाह कुसुम्भतैलमम्लं स्यादुष्णं गुरु विदाहि च। चक्षुर्भ्यामहितं बल्यं रक्तपित्तकफप्रदम् ।।२०।। कुसुम का तेल-अम्लरस युक्त, उष्ण, गुरु, विदाही, नेत्रों के लिये अहितकर, बलकारक एवम् रक्तपित्त तथा कफ कारक है । [२०] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२८ पर किया गया है । अथ खसबीज (पोस्त) तैलगुणानाह तैलं तु खसबीजानां बल्यं वृष्यं गुरु स्मृतम्। वातहृत्कफहृच्छीतं स्वादुपाकरसं च तत् ।।२१।। पोस्ता का तेल-बलकारक, वीर्यवर्धक, गुरु, वात तथा कफ नाशक, शीतल एवम् रस तथा विपाक में मधुर होता है । [२१] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ३३७ पर किया गया है । अथैरण्डतैलगुणानाह एरण्डतैलं तीक्ष्णोष्णं दीपनं पिच्छिलं गुरु। वृष्यं त्वच्यं वयःस्थापि मेधाकान्तिबलप्रदम् ।।२२।। कषायानुरसं सूक्ष्मं योनिशुक्रविशोधनम्। विस्रंस्वादु रसे पाके सतिक्तं कटुकं रसम् ।।२३।। विषमज्वरहृद्रोगपृष्ठगुह्यादिशूलनुत् । हन्ति वातोदरानाहगुल्माष्ठीलाकटिग्रहान् ।।२४।। वातशोणितविड्बन्धब्रध्नशोथामविद्रधीन् । आमवातगजेन्द्रस्य शरीरवनचारिणः ।। एक एव निहन्ताऽयमेरण्डस्नेहकेसरी ।।२५।। रेंड़ी का तेल-तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, पिच्छिल गुण युक्त, गुरु, वीर्यवर्धक, त्वचा के लिये हितकर, अवस्था को स्थिर रखने वाला, मेधा, कान्ति तथा बल को देने वाला, मधुर, तिक्त तथा कटुरस युक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतों में प्रवेश करने वाला), योनि तथा शुक्र का शोधन करने वाला, विस्र (दुर्गन्ध युक्त), सारक एवम्-विषमज्वर, हृद्रोग, पीठ तथा गुह्य (गुदा) आदि का शूल, वात, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा), गुल्म, अष्ठीला, कटिग्रह (कमर का अकड़जाना), वातरक्त, मलबन्ध, ब्रध्न, शोथ, आम और विद्रधि को दूर करने वाला होता है ।