भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 980, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंतैलवर्गः ९२९ शरीर रूपी जंगल के अन्दर विचरने वाले आमवात रूपी गजराज को अकेला ही नाश करने वाला यह रेड़ी का तेल रूपी सिंह है। [२२-२५] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ४७५ पर किया गया है। अथ सर्जरसतैलगुणानाह तैलं सर्जरसोद्भूतं विस्फोटव्रणनाशनम्। कुष्ठपामाकृमिहरं वातश्लेष्मामयापहम् ।। २६ ।। सर्जरस का तेल—विस्फोटक (फोड़ा), व्रण, कुष्ठ, खुजली, कृमि, वात तथा कफसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है। [२६] अथ सर्व तैलानां गुणानाह तैलं स्वयोनिगुणकृद्वाग्भटेनाखिलं मतम्। अतः शेषस्य तैलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिवत् ।। २७ ।। सभी प्रकार के तैलों के गुण—“वाग्भट” का यह मत है कि—सभी तेल अपने-अपने मूल द्रव्यों के अनुरूप गुणवाले होते हैं अर्थात् जिसका जो गुण होता है उसके तेल का भी वही गुण होता है। अतः अवशिष्ट तैलों के गुण उनके द्रव्यों के समान ही समझने चाहिये। [२७] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तैलवर्गः समाप्तः ।। २० ।। ६२ भाव.I