भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 981, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सन्धानवर्गः तत्र काञ्जिकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सन्धितं धान्यमण्डादि काञ्जिकं कथ्यते जनैः । काञ्जिकं भेदि तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनंलघु ।।१।। दाहज्वरहरं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् । माषादिवटकैर्यत्तु क्रियते तद् गुणाधिकम् ।।२।। लघु वातहरं तत्तु रोचनं पाचनं परम् । शूलाजीर्णविबन्ध्यामनाशनं वस्तिशोधनम् ।।३।। काञ्जी के लक्षण—जो धान्य और मण्डक आदि किसी पात्र में रख कर उसमें जल डाल कर उस पात्र का मुँह तीन दिन ढँक कर रखा रहता है उसी को कांजिक (कांजी) कहते हैं । कांजी—मल का भेदन करने वाली, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, स्पर्श (लगाने) से दाह तथा ज्वर को दूर करने वाली, पीने से वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है । और यही-कांजी—यदि उरद के बड़े आदि से तैयार की जाय तो अधिक गुणकारी होती है । अर्थात् यह—लघु, वातनाशक, रोचक तथा अत्यन्त पाचक, वस्तिशोधक एवम् शूल, अजीर्ण, विबन्ध तथा आम को नष्ट करने वाली होती है । [१-३] अथ काञ्जिकसेवनायोग्यजनानाह शोषमूर्च्छाभ्रमार्त्तानां मदकण्डूविशोषिणाम् । कुष्ठिनां रक्तपित्तिनां काञ्जिकं न प्रशस्यते ।।४।। पाण्डुरोगे यक्ष्मणि च तथा शोषातुरेषु च । क्षतक्षीणे तथा श्रान्ते मन्दज्वरनिपीडते ।। एतेषां न हितं प्रोक्तं काञ्जिकं दोषकारकम् ।।५।। काञ्जी सेवन के अयोग्य लोग—जो लोग-शोष, मूर्च्छा या भ्रम से आर्त हैं अथवा-मद तथा खुजली से सूखते जाते हैं, किंवा कुष्ठ तथा रक्तपित्त रोग वाले हैं, उन लोगों के लिये काञ्जी उत्तम (हितकर) नहीं होता है । एवम्-पाण्डुरोग, यक्ष्मा तथा शोष रोग से पीड़ित और क्षत से क्षीण, परिश्रम से थके हुए तथा मन्दज्वर से जो पीड़ित हैं उन लोगों के लिये भी काञ्जी हितकर नहीं होती प्रत्युत दोषों को उत्पन्न करने वाली ही होती है । [४-५] अथ तुषोदकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह तुषोदकं यवैरामैः सतुषैः शकलीकृतैः ।।६।। तुषोदक के लक्षण—कच्चे तथा भूसी के सहित जो टुकड़े-टुकड़े किये हुये जौ हैं उन्हें सन्धान की रीति से यदि रख दिया जाय तो जो जल भाग है उसी को "तुषोदक" कहते हैं । [६] ❖ यवैः = उदके संहितैः सन्धानवर्गोक्तत्वात् ।।६।। यहाँ पर "यवैः" पद से "सन्धानवर्ग" में कहे हुये होने से जल में सन्धान की रीति से रखे हुये जौ यह अर्थ समझना चाहिये ।।६।। तुषाम्बु दीपनं हृद्यं पाण्डुकृमिगदापहम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं पित्तरक्तकृद्वस्तिशूलनुत् ।।७।। तुषाम्बु अर्थात् तुषोदक—अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, तीक्ष्ण, उष्ण, पाचक एवम् पाण्डु तथा क्रिमिरोग नाशक, पित्त तथा रक्तविकार को उत्पन्न करने वाला और वस्तिशूल नाशक होता है । [७]