भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 982, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 982

सन्धानवर्गः ९३१ अथ सौवीरस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सौवीरं तु यवैरामैः पक्वैर्वा निस्तुषैः कृतम्। गोधूमैरपि सौवीरमाचार्याः केचिदूचिरे ।।८।। सौवीरं तु ग्रहण्यार्शःकफघ्नं भेदि दीपनम्। उदावर्त्ताङ्गमर्दास्थिशूलानाहेषु शस्यते ।।९।। सौवीर के लक्षण-कच्चे अथवा पके भूसी रहित जौ के टुकड़ों से उक्त संधान की रीति से जो जल तैयार होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-इसी भाँति जो गेहूँ के टुकड़ों से तैयार किया जाता है उसे "सौवीर" कहते हैं। सौवीर-मलभेदक, अग्निदीपक तथा ग्रहणी, अर्श और कफ नाशक एवम् उदावर्त्त, अंगमर्द (शरीर में दर्द) हड्डियों में शूल की भाँति दर्द तथा आनाह (अफरा) में उत्तम (हितकर) होता है। [८-९] अथारनालस्य लक्षणं गुणाँश्चाह आरनालं तु गोधूमैरामैः स्यान्निस्तुषीकृतैः। पक्वैर्वा सन्थितैस्तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः ।।१०।। आरनाल के लक्षण-कच्चे अथवा पके हुए भूसी रहित गेहूँ के टुकड़ों से सन्धान की रीति से तैयार किये हुए को "आरनाल" कहते हैं। आरनाल-गुणों में सौवीर की भाँति ही होता है। [१०] अथ धान्याम्लस्य लक्षणं गुणाँश्चाह धान्याम्लं शालिचूर्णं च कोद्रवादिकृतं भवेत्। धान्याम्लं धान्ययोनित्वाप्रीणनं लघु दीपनम्। अरुचौ वातरोगेषु सर्वेष्वास्थापने हितम् ।।११।। धान्याम्ल के लक्षण-शालि (जड़हन) चावलों के चूर्ण अथवा कोदो आदि के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "धान्याम्ल" कहते हैं। धान्याम्ल-इसका योनि (उपादान कारण) धान्य होने से यह- तृप्तिकारक, लघु, अग्निदीपक एवम् अरुचि, सभी प्रकार के वातरोग तथा आस्थापन वस्ति में हितकर होता है। [११] अथ शिण्डाक्या लक्षणं गुणाँश्चाह शिण्डाकी राजिकायुक्तैः स्यान्मूलकदलद्रवैः। सर्षपस्वरसैर्वाऽपि शालिपिष्टकसंयुतैः ।।१२।। शिण्डाकी के लक्षण-राई तथा मूली के पत्तों के रस अथवा सरसों के स्वरस और शालि (जड़हन) के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "शिण्डाकी" कहते हैं। [१२] ❖ सन्थितैरिति शेषः ।।१२।। यहाँ पर "सन्थितैः" यह विशेषण ऊपर से लगाना चाहिये जिससे "सन्धान की रीति से जो तैयार होता है" यह अर्थ निकले। [१२] शिण्डाकी रोचनी गुर्वी पित्तश्लेष्मकरी स्मृता ।।१३।। शिण्डाकी-रोचक, गुरु एवम् पित्त तथा कफ को उत्पन्न करने वाली होती है। [१३] अथ शुक्तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च। यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।।१४।। शुक्तं कफघ्नं तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनं लघु। पाण्डुकृमिहरं रूक्षं भेदनं रक्तपित्तकृत् ।।१५।। शुक्त के लक्षण-कन्द, मूल तथा फल आदि तेल तथा नमक के सहित जिस द्रव पदार्थ में डुबोये जाकर सन्धान की रीति से बनाये जाते हैं उसे शुक्त कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA