भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९३२ भावप्रकाशनिघण्टुः शुक्त-कफनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, रूक्ष, मलभेदक, रक्तपित्तकारक एवम् पाण्डु तथा कृमि को दूर करने वाला होता है। [१४-१५] अथासुतम् (संधान) । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलाढ्यं यत्तत्तु विज्ञेयमासुतम्। तद्रुच्यं पाचनं वातहरं लघु विशेषतः ।। १६ ।। कन्द, मूल तथा फल आदि से युक्त जो कांजी है उसे "आसुत" कहते हैं। आसुत-रुचिकारक, पाचक, वातनाशक तथा विशेष कर लघु होता है। [१६] अथ मद्यस्य नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह मद्यन्तु सीधुमैरेयमिरा च मदिरा सुरा। कादम्बरी वारुणी च हालाऽपि बलवल्लभा ।। १७ ।। पेयं यन्मादकं लोकैस्तन्मद्यमभिधीयते। यथाऽरिष्टं सुरा सीधुरासवाद्यमनेकधा ।। १८ ।। मद्यं सर्वं भवेदुष्णं पित्तकृद्वातनाशनम्। भेदनं शीघ्रपाकं च रूक्षं कफहरं परम् ।। १९ ।। अम्लं च दीपनं रुच्यं पाचनं चाशुकारि च। तीक्ष्णं सूक्ष्मं च विशदं व्यवायि च विकाशि च ।। २० ।। मद्य के संस्कृत नाम-मद्य, सीधु, मैरेय, हरा, मदिरा, सुरा, कादम्बरी, वारुणी, हाला तथा हलवल्लभा ये सब हैं। लक्षण-नशा लाने वाला, पीने योग्य जो द्रव्य है उसे लोग "मद्य" कहते हैं। भेद-मद्य के अरिष्ट, सुरा सीधु तथा आसव आदि अनेक प्रकार हैं। सभी प्रकार के मद्य-उष्ण, पित्तकारक, वातनाशक, मलभेदक, शीघ्र पचने वाले, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक, अम्ल रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, पाचक, एवम् शीघ्रकारिता, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, विशद, व्यवायि तथा विकाशि गुणों से युक्त होते हैं। [१७-२०] अथारिष्टस्य लक्षणं गुणाँश्चाह पक्वौषधाम्बुसिद्धं यन्मद्यं तत्स्यादरिष्टकम् ।। २१ ।। अरिष्ट के लक्षण-पकाई हुई औषध तथा जल से सिद्ध किया हुआ जो मद्य होता है उसे "अरिष्ट" कहते हैं। [२१] ❖ अरिष्टं = मद्यमिति लोके। यथा-द्राक्षारिष्टं, दशमूलारिष्टम्, बब्बूलारिष्ट-मिति ।। २१ ।। यहाँ पर "अरिष्ट" पद से लोक में प्रसिद्ध "मद्य" का ग्रहण करना चाहिये। जैसे- द्राक्षारिष्ट (दाख का अरिष्ट), दशमूलारिष्ट, बब्बूलारिष्ट इत्यादि। [२१] अरिष्ट लघुपाकेन सर्वतश्च गुणाधिकम्। अरिष्टसूरू गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २२ ।। अरिष्ट-पाक में लघु होता है एवम् सबसे अधिक गुणकारी होता है। और अरिष्ट के गुण जिन द्रव्यों का वह बनाया जाता है उसके समान होते हैं। [२२] अथ सुराया लक्षणं गुणाँश्चाह शालिषष्टिकपिष्टादिकृतं मद्यं सुरा स्मृता। सुरा गुर्वी बलस्तन्यपुष्टिमेदःकफप्रदा। ग्राहिणी शोथगुल्मार्शोग्रहणीमूत्रकृच्छ्रनुत् ।। २३ ।। सुरा के लक्षण-शालि (जड़हन) तथा साठी के चावलों के चूर्ण आदि से जो मद्य तैयार किया जाता है उसे "सुरा" कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA