भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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सन्धानवर्गः ९३३ सुरा-गुरु, ग्राही तथा बल, स्तनों में दूध की वृद्धि, शरीर की पुष्टि, मेद तथा कफ को करने वाला एवम् शोथ, गुल्म, अर्श (बवासीर), ग्रहणी तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करने वाला होता है। [२३] अथ सुराभेदस्य वारुण्या लक्षणगुणानाह पुनर्नवाशालिपिष्टिविहिता वारुणी स्मृता। संधितैस्तालखर्जूररसैर्या साऽपि वारुणी। सुरावद्वारुणी लघ्वी पीनसाध्मानशूलनुत् ।। २४ ।। सुरा का भेद वारुणी के लक्षण-पुनर्नवा तथा शालि के चावलों के चूर्ण से जो सुरा बनाई जाती है उसे "वारुणी" कहते हैं। और ताल तथा खजूर के रस को सन्धान की रीति से रखने पर जो तैयार होता है उसे भी "वारुणी" कहते हैं। वारुणी-गुणों में यद्यपि सुरा के समान ही होती है तथापि यह उसकी अपेक्षा लघु एवम् पीनस, आध्मान (अफरा) तथा शूल को दूर करने वाली होती है। [२४] त्तसुरातो भेदार्थं लघ्वीति ।। २४ ।। यहाँ पर "लघ्वी" इस पद से "सुरा" से इसका (वारुणी का) भेद दिखलाते हैं। अर्थात् "सुरा" गुरु होती है और "वारुणी" लघु होती है यह समझना चाहिये। [२४] अथ द्विविधसीधोर्लक्षणगुणानाह इक्षोः पकै रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च सः। आमैस्तैरेव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ।। २५ ।। सीधुः पक्वरसः श्रेष्ठः स्वराग्निबलवर्णकृत्। वातपित्तकरः सद्यः स्नेहनो रोचनो हरेत् ।। २६ ।। विबन्धमेदःशोफार्शःशोफोदरकफामयान् । तस्मादल्पगुणः शीतरसः संलेखनः स्मृतः ।। २७ ।। दो प्रकार के सीधु के लक्षण-ईख के पके हुये रस से जो मद्य तैयार होता है वह "पक्वरस सीधु" कहलाता है। और जो ईख के कच्चे रस से तैयार होता है वह "शीतरस सीधु" कहलाता है। पक्वरस सीधु-श्रेष्ठ, स्वर तथा वर्ण को उत्तम करने वाला, अग्नि तथा बलकारक, वात तथा पित्त को करने वाला, तत्काल स्नेहन करने वाला, रोचक एवं विबन्ध, मेद, शोथ, बवासीर, उदर का शोथ तथा कफ सम्बन्धी विकारों को नष्ट करने वाला होता है। शीतरस सीधु-यह पक्वरस सीधु की अपेक्षा अल्प गुणकारी तथा अधिक लेखन गुण विशिष्ट होता है। [२५-२७] अथासवस्य लक्षणं गुणाँश्चाह यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः ।। २८ ।। आसव के लक्षण-बिना पकाये हुये औषध तथा जल से जो मद्य बनाया जाता है वह "आसव" कहलाता है। [२८] ❖ यथा-लोहासवादिः ।। २८ ।। जैसे-"लोहासव" आदि बनता है इतना यहाँ पर और समझना चाहिये। [२८] आसवस्य गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २९ ।। आसव-इसके गुण बीजद्रव्यों (जिन द्रव्यों से आसव बनाया जाता है उसे "बीजद्रव्य" समझना चाहिये) के गुणों के समान होते हैं। [२९]