भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 985, कुल 1167 में से

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९३४ भावप्रकाशनिघण्टुः

अथ नवपुराणमदिरागुणानाह

मद्यं नवमभिष्यन्दि त्रिदोषजनकं सरम्। अहृद्यं बृंहणं दाहि दुर्गन्धं विशदं गुरु।।३०।। जीर्णं तदेव रोचिष्णु क्रिमिश्लेष्मानिलापहम्। हृद्यंसुगन्धिगुणवल्लघु स्रोतोविशोधनम्।।३१।। **नई मदिरा—**अभिष्यन्दी, त्रिदोषजनक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, बृंहण, दाह उत्पन्न करने वाली, दुर्गन्ध तथा विशद गुण युक्त एवम् गुरु होती है। **पुरानी मदिरा—**रुचि को उत्पन्न करने वाली, हृदय के लिये हितकर, सुगन्ध युक्त, गुणकारक, लघु, स्रोतोमार्ग का शोधन करने वाली एवम् क्रिमि, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है। [३०-३१]

अथ सात्त्विकादिमनुष्याणां मद्येन जाताश्चेष्टा आह

सात्त्विके गीतहास्यादि राजसे साहसादिकम्। तामसे निन्द्यकर्माणि निन्द्राञ्च मदिराऽऽचरेत् ।।३२।। सात्त्विकादि मनुष्यों की मद्य से उत्पन्न हुई चेष्टायें—मदिरा सात्त्विक (सत्त्वगुणी) मनुष्यों में पीने से गाना तथा हँसना आदि कार्यों को कराने लगती है—राजस (रजोगुणी) मनुष्यों में साहस आदि कार्यों को, तामस (तमोगुणी) मनुष्यों में निन्द्यकर्म तथा निद्रा को कराती है। [३२] ❖ आचरेत् = कुर्यात् ।।३२।। यहाँ पर "आचरेत्" पद से "कराने लगती है" यह भावार्थ समझना चाहिये। [३२]

अथ मद्यपानप्रकारमाह

विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम्। प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ।।३३।। किन्तु मद्यंस्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्। अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ।।३४।। **मद्य पीने का प्रकार—**जो मनुष्य प्रसन्न होता हुआ, हितकारक अन्नों के साथ, बलानुसार यथासमय, विधिपूर्वक, मात्रा के साथ मद्य पीता है, तो उसे वह (मद्य) अमृत के समान गुणकारी होता है। क्योंकि—मद्य का स्वभाव जिस प्रकार अन्न का है ठीक वैसा ही है, जैसे अन्न—अविधिपूर्वक सेवन करने से रोग उत्पन्न करने वाला होता है और विधिपूर्वक सेवन करने से अमृत के समान गुणकारी होता है वैसे ही मद्य को भी समझना चाहिये। [३३-३४]

अथ मद्यगन्धस्य दूरीकरणोपायमाह

मुस्तैलवालुगदजीरकधान्यकैला यश्चर्वयन्सदसि वाचमभिव्यनक्ति। स्वाभाविकं मुखजमुज्झति पूतिगन्धं—गन्धञ्च मद्यलशुनादि भवञ्च नूनम् ।।३५।। **मद्य के गन्ध को दूर करने का उपाय—**नागरमोथा, कूठ, एलवालु जीरा, धनिया और इलायची इन सबको चबाता हुआ जो मद्य पीने वाला मनुष्य सभा के मध्य में बातचीत करता है, उसके मुख की स्वाभाविक दुर्गन्ध तथा मद्य एवम् लहशुन आदि से उत्पन्न गन्ध निश्चय दूर हो जाती है। [३५] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे सन्धानवर्गः समाप्तः।

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