भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 969, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तक्रवर्गः तत्र तक्रस्य पृथक्पृथङ् नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह घोलं तु मथितं तक्रमुदश्विच्छच्छिकाऽपि च । ससरं निर्जलं घोलं मथितं त्वसरोदकम् ।।१।। तक्रं पादजलं प्रोक्तमुदश्वित्त्वर्द्धवारिकम् । च्छच्छिका सारहीना स्यात्स्वच्छा प्रचुरवारिका ।। घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् ।।२।। तक्र (मट्ठा) के भिन्न-भिन्न लक्षणों के अनुसार भिन्न-भिन्न संस्कृत नाम—घोल, मथित, तक्र, उदश्वित् और च्छच्छिका ये सब हैं। अर्थात् उक्त पाँच भेद तक्र के होते हैं। लक्षण-घोल—बिना जल मिलाये यदि मलाई के सहित दही को मथा जाय तो उसे “घोल” कहते हैं। मथित—यदि दही की मलाई अलग कर बिना जल मिलाये ही मथ दिया जाया तो उसे “मथित” कहते हैं। तक्र— जिस दही में चतुर्थांश जल मिला कर मथा जाय तो उसे तक्र कहते हैं। उदश्वित्—जिस दही में आधा जल मिलाकर मथा जाय उसे “उदश्वित्” कहते हैं। च्छच्छिका—जिस दही में से प्रथम मथ कर मक्खन निकाल लिया हो पुनः उसी में अधिक मात्रा में स्वच्छ जल डालकर फिर मथा जाय तो उसे “च्छच्छिका” कहते हैं। [१-२] ❖ मथितम् = 'महुया' वा 'मथुवा' इति लोके । च्छच्छिका "छाछ" = इति लोके ।।१-२।। यहाँ पर—"मथितम्" से लोकप्रसिद्ध "महुया" या "मथुवा" का तथा "च्छच्छिका" से लोकप्रसिद्ध "छाछ" का ग्रहण करना चाहिये। [१-२] घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् । वातपित्तहरं ह्लादि मथितं कफपित्तनुत् ।।३।। तक्रं ग्राहि कषायाम्लं स्वादुपाकरसं लघु । वीर्योष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् ।।४।। ग्रहण्यादिमतां पथ्यं भवेत्संग्राहि लाघवात् । किञ्च स्वादुविपाकित्वान्न च पित्तप्रकोपणम् ।।५।। अम्लोष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् । कषायोष्णविकाशित्वाद्रौक्ष्याच्चापि कफापहम् ।।६।। न तक्रसेवी व्यथते कदाचिन्न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः । यथा सुराणाममृत सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः ।।७।। उदश्वित् कफकृद् बल्यमामघ्नं परमं मतम् । च्छच्छिका शीतला लघ्वी पित्तश्रमतृषाहरी ।। वातनुत् कफकृत् सा तु दीपनी लवणाम्विता ।।८।। घोल—घोल में यदि शक्कर मिला हुआ हो तो वह गुणों में रसाल (सिखरन) के समान होता है एवम् वात तथा पित्तनाशक और आह्लादजनक होता है। मथित—यह कफ तथा पित्तनाशक होता है। तक्र—यह कषाय तथा मधुर रस युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, ग्राही, लघु, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक तथा वातनाशक होता है। ग्रहणी आदि के रोगियों को तक्र हितकर होता है क्योंकि यह लघु होने से मल का संग्राहक होता है और विपाक में मधुर रस युक्त होने से पित्त को प्रकुपित भी नहीं करता है एवम् अम्लरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmı. Digitized by S3 Foundation USA