भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतक्रवर्गः ९१९ तथा तृप्तिकारक होने से यह वातनाशक होता है और कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, विकाशी तथा रूक्ष होने से यह कफनाशक होता है। तक्र का सेवन करने वाला व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं पड़ता है और तक्र के प्रभाव से नष्ट हुये रोग पुनः कभी उत्पन्न नहीं हो सकते, अस्तु जिस प्रकार से देवताओं के लिये सुखकारी अमृत है उसी भाँति पृथ्वी तल में मनुष्यों के लिये तक्र सुखकारी, ऋषियों ने बताया है। उदश्वित्—कफकारक, बलवर्धक तथा अत्यन्त आमनाशक होता है। छाछ—शीतल, लघु एवम् पित्त, श्रम तथा तृषा को दूर करने वाला, वातनाशक तथा कफ कारक होता है यदि इसमें सेंधा नमक मिला हो तो अग्निदीपक होता है। [३-८] अथोद्धृतस्तोकोद्धृताननुद्धृतघृतानां तक्राणां गुणानाह समुद्धृतघृतं तक्रं पथ्यं लघु विशेषतः ॥९॥ स्तोकोद्धृतघृतं तस्माद् गुरु वृष्य कफापहम्। अनुद्धृतघृतं सान्द्रं गुरु पुष्टिकफप्रदम् ॥१०॥ घी निकाला हुआ तक्र—पथ्य (रोगियों के लिये हितकर) तथा लघु होता है। यदि कुछ घी निकाल लिया गया हो और कुछ अंश घी का रह गया हो तो ऐसा तक्र—उपर्युक्त तक्र (घी निकाले हुये तक्र) की अपेक्षा गुरु, वीर्यवर्धक तथा कफनाशक होता है और यदि घी न निकाला हुआ हो तथा गाढ़ा हो तो ऐसा तक्र-गुरु एवम् पुष्टिकारक तथा कफजनक होता है। [९-१०] अथ दोषविशेषे व्याधिविशेषे च तक्रविशेषानाह वातेऽम्लं शस्यते तक्रं शुण्ठीसैन्धवसंयुक्तम्। पित्ते स्वादु सितायुक्तं व्योषक्षारयुक्तं कफे ॥११॥ हिङ्गूजीरयुतं घोलं सैन्धवेन च संयुतम्। भवेदतीव वातघ्नमर्शोऽतीसारहृत्परम् ॥१२॥ रुचिदं पुष्टिदं बल्यं वस्तिशूलविनाशनम्। मूत्रकृच्छ्रे तु सगुडं पाण्डुरोगे सचित्रकम् ॥१३॥ दोषविशेष में तथा रोगविशेष में विशेष दो तक्रों का प्रयोग—वातदोष की अधिकता में—अम्लरसयुक्त एवम् सोंठ तथा सेन्धा नमक मिला हुआ तक्र उत्तम अर्थात् हितकारी होता है। पित्त की अधिकता में—मधुर रसयुक्त तथा चीनी मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। कफ की अधिकता में—सोंठ, मिरच तथा पीपर मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। हींग, जीरा (ये दोनों भुने हुये हों) तथा सेंधा नमक से युक्त घोल—अत्यन्त वातनाशक, अर्श तथा अतिसार को अत्यन्त दूर करने वाला, रुचिजनक, पुष्टिकारक, बलदायक एवं बस्तिशूल नाशक होता है। गुड़युक्त घोल—मूत्रकृच्छ्र में एवम् चित्रक (चीता) मिश्रित घोल—पाण्डुरोग में देना हितकर है। अथ पक्वापक्वतक्रयोर्गुणानाह तक्रमामं कफं कोष्ठे हन्ति कण्ठे करोति च। पीनसश्वासकासादौ पक्वमेव प्रयुज्यते ॥१४॥ कच्चा (बिना पकाया हुआ) तक्र-कोष्ठ स्थित कफ को नष्ट करता है तथा कण्ठ में कफ करने वाला होता है। अतः पकाये हुए तक्र का ही—पीनस, श्वास तथा कास आदि में प्रयोग करना उचित है क्योंकि हितकर होता है। [१४] अथ तक्रसेवनविषयानाह शीतकालेऽग्निमान्द्ये च तथा वातामयेषु च। अरुचौ स्रोतसां रोधे तक्रं स्यादमृतोपमम् ॥ तत्तु हन्ति गरच्छर्दिप्रसेकविषमज्वरान्। पाण्डुमेदोग्रहण्यर्शोर्मूत्रग्रहभगन्दरान् ॥१५॥ मेहं गुल्ममतीसारं शूलप्लीहोदरारुचीः। श्वित्रकोष्ठगतव्याधीन् कुष्ठशोथतृषाकृमीन् ॥१६॥