भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२० भावप्रकाशनिघण्टुः **तक्र सेवन करने के विषय-**शीतकाल में तथा अग्नि की मन्दता, वातरोग, अरुचि तथा नाड़ियों के अवरोध में तक्र अमृत के समान गुणकारी होता है। और यह—गर (संयोगज विष), वमन, प्रसेक (कफजन्य लार आदि गिरना), विषमज्वर, पाण्डुरोग, मेदरोग, ग्रहणी, अर्श (बवासीर), मूत्रग्रह (मूत्र का बन्द होना), भगन्दर, प्रमेह, गुल्म, अतीसार, शूल, प्लीहा, उदररोग, अरुचि, श्वित्र (श्वेतकुष्ठ), कोष्ठगत रोग, कुष्ठ, शोथ, तृषा तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। [१४-१६]
अथ तक्रस्य निषेधविषयानाह
नैव तक्रं क्षये$^१$ दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले। न मूर्च्छाभ्रमदाहेषु न रोगे रक्तपित्तजे ॥१७॥ **तक्र निषेध के विषय—**तक्र—क्षय रोग में तथा ग्रीष्म ऋतु में एवम् दुर्बल व्यक्ति तथा मूर्च्छा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग युक्त व्यक्ति को नहीं देना चाहिये। अर्थात् देना अहितकर होता है। [१७]
अथ गव्यादीनां विशिष्टतक्राणां गुणानाह
यान्युक्तानि दधीन्यष्टौ तद्गुणं तक्रमादिशेत् ॥१८॥ **गाय आदि के दूध के दही से बने हुये तक्र के गुण—**जो पूर्व में (दधिवर्ग में) गाय आदि के दूध के बने हुए आठ प्रकार के दहियों के गुण कह आये हैं वे ही सब गुण उन दहियों से बने हुये तक्र के भी होते हैं, ऐसा समझना चाहिये। [१८] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तक्रवर्गः समाप्तः। ❖|||❖ १. श्वास इति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA