भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदधिवर्गः ९१७
बिना विधि के दही सेवन करने के दुर्गुण—जो दही का प्रेमी व्यक्ति विधि को छोड़ कर अर्थात् जब जिस भाँति दही खाने की विधि है उसके विरुद्ध सदा दही खाता रहता है तो उसे ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पाण्डु तथा भ्रम रोग एवम् प्रचण्ड रूप से कामला रोग उत्पन्न हो जाता है। अतः विधिपूर्वक दही खाना चाहिये। [१९] अथ दध्नः सरमस्तुनोर्लक्षणं गुणाँश्चाह दध्नस्तूपरि यो भागो घनः स्नेहसमन्वितः । स लोके सर इत्युक्तो दध्नो मण्डस्तु मस्त्विति ॥२०॥ सरः स्वादुर्गुरुर्वृष्यो वातवह्निप्रणाशनः । सोऽम्लो वस्तिप्रशमनः पित्तश्लेष्मविवर्द्धनः ॥२१॥ मस्तु क्लमहरं बल्यं लघु भक्ताभिलाषकृत् ॥२२॥ स्रोतोविशोधनं हृदि कफतृष्णानिलापहम् । अवृष्यं प्रीणनं शीघ्र भिनत्ति मलसञ्चयम् ॥२३॥ सर के लक्षण—दही के ऊपर जो गाढ़ा तथा स्नेह (घी) से युक्त भाग होता है उसे लोक में सर (साढ़ी) कहते हैं। मस्तु के लक्षण—और दही के मांड (पानी) को मस्तु (दही का तोड़) कहते हैं। सर—जो सर स्वादिष्ट होता है वह गुरु, वीर्य वर्धक, वात तथा जठराग्नि नाशक होता है और यदि वह (सर) अम्ल रस युक्त होता है, तो बस्ति के रोगों का प्रशमन करता है एवम्–पित्त तथा कफ को बढ़ाता है। मस्तु (दही का तोड़)—क्लान्ति को दूर करने वाला, बलदायक, लघु, अन्न खाने की अभिलाषा को उत्पन्न करने वाला, स्रोतोमार्ग (नाड़ियों के मार्ग) को शुद्ध करने वाला, आह्लादजनक एवम् कफ, तृषा तथा वायु को नष्ट करने वाला, अवृष्य (किञ्चित् वीर्यवर्धक) तथा शीघ्र संचित मल का भेदन करने वाला होता है। [२०-२३] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे दधिवर्गः समाप्तः ।