भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदधिवर्ग: १९५
स्वाद्वम्लसंज्ञक दही-गुणों में साधारण दही के समान होता है ऐसा विद्वानों का मत है । अम्लसंज्ञक दही के लक्षण-जिस दही में मधुर रस छिपा हुआ हो और अम्ल रस प्रकट हो रहा हो उसे "अम्ल" संज्ञक दही समझना चाहिये । अम्लसंज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् पित्त, रक्तविकार तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । अत्यम्ल संज्ञक दही के लक्षण-जिस दही के खाने से दाँत हर्षित हो जायँ तथा रोंगटे खड़े हो जायँ और कण्ठ आदि में दाह होने लगे उसे "अत्यम्ल" संज्ञक दही जानना चाहिये । अत्यम्ल संज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् रक्तविकार, वात तथा पित्त को अत्यन्त उत्पन्न करने वाला होता है । [४-९] अथ गोदधिगुणानाह गव्यं दधि विशेषेण स्वाद्वम्लं च रुचिप्रदम् । पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृत्पवनापहम् । उक्तं दध्नामशेषाणां मध्ये गव्यं गुणाधिकम् ।।१०।। गाय का दही-विशेष रूप से मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रुचि उत्पन्न करने वाला, पवित्र, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, पुष्टिकारक तथा वातनाशक होता है और सम्पूर्ण दहियों के बीच में गाय का ही दही अधिक गुण करने वाला कहा हुआ है । [१०] अथ माहिषदधिगुणानाह माहिषं दधि सुस्निग्धं श्लेष्मलं वातपित्तनुत् । स्वादुपाकमभिष्यन्दि वृष्यं गुर्वस्रदूषकम् ।।११।। भैंस का दही-अत्यन्त स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्त नाशक, विपाक में मधुररसयुक्त, अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, गुरु तथा रक्त को दूषित करने वाला होता है । [११] अथाजदधिगुणानाह आजं दध्युत्तमं ग्राहि लघु दोषत्रयापहम् । शस्यते श्वासकासार्शःक्षयकार्श्येषु दीपनम् ।।१२।। बकरी का दही-उत्तम, ग्राही, लघु, त्रिदोषनाशक, अग्निदीपक एवम्-श्वास, खाँसी, अर्श, क्षय तथा कृशता में हितकर होता है । [१२] अथ पक्वदुग्धजातस्य दध्नो गुणानाह पक्वदुग्धभवं रुच्यं दधि स्निग्धं गुणोत्तमम् । पित्तानिलापहं सर्वधात्वग्निबलवर्द्धनम् ।।१३।। पकाये हुये दूध से तैयार किया हुआ दही-रुचिकारक, स्निग्ध, उत्तम गुणवाला, पित्त तथा वात को दूर करने वाला एवम्-सम्पूर्ण धातु, अग्नि तथा बल को बढ़ाने वाला होता है । [१३] अथ निःसारदुग्धजनितदध्नो गुणानाह असारं दधि सङ्ग्राहि शीतलं वातलं लघु । विष्टम्भि दीपनं रुच्यं ग्रहणीरोगनाशनम् ।।१४।। निःसार दूध का दही-संग्राही, शीतल, वातजनक, लघु, विष्टम्भकारक, अग्निदीपक, रुचिकारक एवम्- ग्रहणीरोग को नष्ट करने वाला होता है । [१४] अथ गालितदध्नो गुणानाह गालितं दधि सुस्निग्धं वातघ्नं कफकृद् गुरु । बलपुष्टिकरं रुच्यं मधुरं नातिपित्तकृत् ।।१५।।