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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

दधिवर्ग: १९५

स्वाद्वम्लसंज्ञक दही-गुणों में साधारण दही के समान होता है ऐसा विद्वानों का मत है । अम्लसंज्ञक दही के लक्षण-जिस दही में मधुर रस छिपा हुआ हो और अम्ल रस प्रकट हो रहा हो उसे "अम्ल" संज्ञक दही समझना चाहिये । अम्लसंज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् पित्त, रक्तविकार तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । अत्यम्ल संज्ञक दही के लक्षण-जिस दही के खाने से दाँत हर्षित हो जायँ तथा रोंगटे खड़े हो जायँ और कण्ठ आदि में दाह होने लगे उसे "अत्यम्ल" संज्ञक दही जानना चाहिये । अत्यम्ल संज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् रक्तविकार, वात तथा पित्त को अत्यन्त उत्पन्न करने वाला होता है । [४-९] अथ गोदधिगुणानाह गव्यं दधि विशेषेण स्वाद्वम्लं च रुचिप्रदम् । पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृत्पवनापहम् । उक्तं दध्नामशेषाणां मध्ये गव्यं गुणाधिकम् ।।१०।। गाय का दही-विशेष रूप से मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रुचि उत्पन्न करने वाला, पवित्र, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, पुष्टिकारक तथा वातनाशक होता है और सम्पूर्ण दहियों के बीच में गाय का ही दही अधिक गुण करने वाला कहा हुआ है । [१०] अथ माहिषदधिगुणानाह माहिषं दधि सुस्निग्धं श्लेष्मलं वातपित्तनुत् । स्वादुपाकमभिष्यन्दि वृष्यं गुर्वस्रदूषकम् ।।११।। भैंस का दही-अत्यन्त स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्त नाशक, विपाक में मधुररसयुक्त, अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, गुरु तथा रक्त को दूषित करने वाला होता है । [११] अथाजदधिगुणानाह आजं दध्युत्तमं ग्राहि लघु दोषत्रयापहम् । शस्यते श्वासकासार्शःक्षयकार्श्येषु दीपनम् ।।१२।। बकरी का दही-उत्तम, ग्राही, लघु, त्रिदोषनाशक, अग्निदीपक एवम्-श्वास, खाँसी, अर्श, क्षय तथा कृशता में हितकर होता है । [१२] अथ पक्वदुग्धजातस्य दध्नो गुणानाह पक्वदुग्धभवं रुच्यं दधि स्निग्धं गुणोत्तमम् । पित्तानिलापहं सर्वधात्वग्निबलवर्द्धनम् ।।१३।। पकाये हुये दूध से तैयार किया हुआ दही-रुचिकारक, स्निग्ध, उत्तम गुणवाला, पित्त तथा वात को दूर करने वाला एवम्-सम्पूर्ण धातु, अग्नि तथा बल को बढ़ाने वाला होता है । [१३] अथ निःसारदुग्धजनितदध्नो गुणानाह असारं दधि सङ्ग्राहि शीतलं वातलं लघु । विष्टम्भि दीपनं रुच्यं ग्रहणीरोगनाशनम् ।।१४।। निःसार दूध का दही-संग्राही, शीतल, वातजनक, लघु, विष्टम्भकारक, अग्निदीपक, रुचिकारक एवम्- ग्रहणीरोग को नष्ट करने वाला होता है । [१४] अथ गालितदध्नो गुणानाह गालितं दधि सुस्निग्धं वातघ्नं कफकृद् गुरु । बलपुष्टिकरं रुच्यं मधुरं नातिपित्तकृत् ।।१५।।

  • ९१६ भावप्रकाशनिघण्टुः गालित (वस्त्र से छाने हुये) दही-अति स्निग्ध, वातनाशक, कफकारक, गुरु, बल तथा पुष्टि को करने वाला, रुचिकारक, मधुररसयुक्त तथा अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है अर्थात् किञ्चित्त पित्त करने वाला होता है। [१५] अथ शर्कराऽदिसहितस्य दध्नो गुणानाह सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्रदाहजित्। सगुडं वातनुद् वृष्यं बृंहणं तर्पणं गुरु ।।१६।। शक्कर मिला हुआ दही-श्रेष्ठ होता है एवम् तृष्णा (प्यास), पित्त, रक्तविकार तथा दाह को नष्ट करने वाला होता है। गुड़ मिला हुआ दही-वातनाशक, वीर्यवर्धक, बृंहण (रस रक्तादिवर्धक), तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। [१६] अथ रात्रौ दधिभक्षणस्य निषेधमाह न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम्। नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना ।।१७।। रात्रि में दही खाने का निषेध-रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये और बिना घी तथा शक्कर के या बिना मूँग की दाल के वा बिना मधु के गरम किंवा बिना आँवला के दही नहीं खाना चाहिये। [१७] ❖ अयमर्थः रात्रौ दधि न भुञ्जीत, चेत्तदा-अघृतशर्करममुद्गसूपमक्षौद्रमुष्णं विनाऽऽमलकञ्च दधि न भुञ्जीत। तेन घृतशर्कराऽऽदियुक्तं दधि रात्रावपि भुञ्जीतेत्यर्थः । यहाँ पर उपर्युक्त श्लोक का वास्तविक अर्थ यह समझना चाहिये कि-रात्रि में दही कभी नहीं खाना चाहिये, यदि खाना ही हो तो घी, शक्कर या मूँग की दाल वा शहद किंवा आँवला के बिना अथवा गरम न खाय, इससे यह सिद्ध हुआ कि-घी, शक्कर आदि से युक्त दही रात्रि में भी खायें। ❖ तथा चं शस्यते दधि नो रात्रौ शस्तं चाम्बुघृतान्वितम्। रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेषु तु नैव तत् ।।१।। तथा इसी विषय में और भी कहा है कि-रात्रि में दही खाना उचित नहीं है किन्तु यदि जल तथा घी मिला हुआ हो तो खाना उचित है। किन्तु रक्त, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों में वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला हुआ भी दही खाना उचित नहीं होता है अर्थात् अहितकर होता है। [१] तद् = अम्बुघृतान्वितमपि (।।१।।) ।।१७।। यहाँ पर “तत्” पद का “वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला भी “दही” यह अर्थ समझना चाहिये (।।१।।) । [१७] अथ ऋतुविशेषेण दध्नो विधिनिषेधावाह हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते। शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ।।१८।। ऋतु विशेष में दही खाने की विधि तथा निषेध-हेमन्त (अगहन-पूस), शिशिर (माघ-फागुन) तथा वर्षा (सावन-भादो) ऋतु में दही खाना उत्तम है। शरद् (क्वार-कार्तिक), ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) तथा (चैत-वैशाख) ऋतु में दही खाना प्रायः करके निन्दित है अर्थात् निषिद्ध है। [१८] अथ विधिमन्तरेण दधिसेवने दुर्गुणानाह ज्वरासृक्पित्त वीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान्। प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ।।१९।।

दधिवर्गः ९१७

बिना विधि के दही सेवन करने के दुर्गुण—जो दही का प्रेमी व्यक्ति विधि को छोड़ कर अर्थात् जब जिस भाँति दही खाने की विधि है उसके विरुद्ध सदा दही खाता रहता है तो उसे ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पाण्डु तथा भ्रम रोग एवम् प्रचण्ड रूप से कामला रोग उत्पन्न हो जाता है। अतः विधिपूर्वक दही खाना चाहिये। [१९] अथ दध्नः सरमस्तुनोर्लक्षणं गुणाँश्चाह दध्नस्तूपरि यो भागो घनः स्नेहसमन्वितः । स लोके सर इत्युक्तो दध्नो मण्डस्तु मस्त्विति ॥२०॥ सरः स्वादुर्गुरुर्वृष्यो वातवह्निप्रणाशनः । सोऽम्लो वस्तिप्रशमनः पित्तश्लेष्मविवर्द्धनः ॥२१॥ मस्तु क्लमहरं बल्यं लघु भक्ताभिलाषकृत् ॥२२॥ स्रोतोविशोधनं हृदि कफतृष्णानिलापहम् । अवृष्यं प्रीणनं शीघ्र भिनत्ति मलसञ्चयम् ॥२३॥ सर के लक्षण—दही के ऊपर जो गाढ़ा तथा स्नेह (घी) से युक्त भाग होता है उसे लोक में सर (साढ़ी) कहते हैं। मस्तु के लक्षण—और दही के मांड (पानी) को मस्तु (दही का तोड़) कहते हैं। सर—जो सर स्वादिष्ट होता है वह गुरु, वीर्य वर्धक, वात तथा जठराग्नि नाशक होता है और यदि वह (सर) अम्ल रस युक्त होता है, तो बस्ति के रोगों का प्रशमन करता है एवम्–पित्त तथा कफ को बढ़ाता है। मस्तु (दही का तोड़)—क्लान्ति को दूर करने वाला, बलदायक, लघु, अन्न खाने की अभिलाषा को उत्पन्न करने वाला, स्रोतोमार्ग (नाड़ियों के मार्ग) को शुद्ध करने वाला, आह्लादजनक एवम् कफ, तृषा तथा वायु को नष्ट करने वाला, अवृष्य (किञ्चित् वीर्यवर्धक) तथा शीघ्र संचित मल का भेदन करने वाला होता है। [२०-२३] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे दधिवर्गः समाप्तः ।

अथ तक्रवर्गः तत्र तक्रस्य पृथक्पृथङ् नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह घोलं तु मथितं तक्रमुदश्विच्छच्छिकाऽपि च । ससरं निर्जलं घोलं मथितं त्वसरोदकम् ।।१।। तक्रं पादजलं प्रोक्तमुदश्वित्त्वर्द्धवारिकम् । च्छच्छिका सारहीना स्यात्स्वच्छा प्रचुरवारिका ।। घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् ।।२।। तक्र (मट्ठा) के भिन्न-भिन्न लक्षणों के अनुसार भिन्न-भिन्न संस्कृत नाम—घोल, मथित, तक्र, उदश्वित् और च्छच्छिका ये सब हैं। अर्थात् उक्त पाँच भेद तक्र के होते हैं। लक्षण-घोल—बिना जल मिलाये यदि मलाई के सहित दही को मथा जाय तो उसे “घोल” कहते हैं। मथित—यदि दही की मलाई अलग कर बिना जल मिलाये ही मथ दिया जाया तो उसे “मथित” कहते हैं। तक्र— जिस दही में चतुर्थांश जल मिला कर मथा जाय तो उसे तक्र कहते हैं। उदश्वित्—जिस दही में आधा जल मिलाकर मथा जाय उसे “उदश्वित्” कहते हैं। च्छच्छिका—जिस दही में से प्रथम मथ कर मक्खन निकाल लिया हो पुनः उसी में अधिक मात्रा में स्वच्छ जल डालकर फिर मथा जाय तो उसे “च्छच्छिका” कहते हैं। [१-२] ❖ मथितम् = 'महुया' वा 'मथुवा' इति लोके । च्छच्छिका "छाछ" = इति लोके ।।१-२।। यहाँ पर—"मथितम्" से लोकप्रसिद्ध "महुया" या "मथुवा" का तथा "च्छच्छिका" से लोकप्रसिद्ध "छाछ" का ग्रहण करना चाहिये। [१-२] घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् । वातपित्तहरं ह्लादि मथितं कफपित्तनुत् ।।३।। तक्रं ग्राहि कषायाम्लं स्वादुपाकरसं लघु । वीर्योष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् ।।४।। ग्रहण्यादिमतां पथ्यं भवेत्संग्राहि लाघवात् । किञ्च स्वादुविपाकित्वान्न च पित्तप्रकोपणम् ।।५।। अम्लोष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् । कषायोष्णविकाशित्वाद्रौक्ष्याच्चापि कफापहम् ।।६।। न तक्रसेवी व्यथते कदाचिन्न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः । यथा सुराणाममृत सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः ।।७।। उदश्वित् कफकृद् बल्यमामघ्नं परमं मतम् । च्छच्छिका शीतला लघ्वी पित्तश्रमतृषाहरी ।। वातनुत् कफकृत् सा तु दीपनी लवणाम्विता ।।८।। घोल—घोल में यदि शक्कर मिला हुआ हो तो वह गुणों में रसाल (सिखरन) के समान होता है एवम् वात तथा पित्तनाशक और आह्लादजनक होता है। मथित—यह कफ तथा पित्तनाशक होता है। तक्र—यह कषाय तथा मधुर रस युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, ग्राही, लघु, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक तथा वातनाशक होता है। ग्रहणी आदि के रोगियों को तक्र हितकर होता है क्योंकि यह लघु होने से मल का संग्राहक होता है और विपाक में मधुर रस युक्त होने से पित्त को प्रकुपित भी नहीं करता है एवम् अम्लरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmı. Digitized by S3 Foundation USA

तक्रवर्गः ९१९ तथा तृप्तिकारक होने से यह वातनाशक होता है और कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, विकाशी तथा रूक्ष होने से यह कफनाशक होता है। तक्र का सेवन करने वाला व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं पड़ता है और तक्र के प्रभाव से नष्ट हुये रोग पुनः कभी उत्पन्न नहीं हो सकते, अस्तु जिस प्रकार से देवताओं के लिये सुखकारी अमृत है उसी भाँति पृथ्वी तल में मनुष्यों के लिये तक्र सुखकारी, ऋषियों ने बताया है। उदश्वित्—कफकारक, बलवर्धक तथा अत्यन्त आमनाशक होता है। छाछ—शीतल, लघु एवम् पित्त, श्रम तथा तृषा को दूर करने वाला, वातनाशक तथा कफ कारक होता है यदि इसमें सेंधा नमक मिला हो तो अग्निदीपक होता है। [३-८] अथोद्धृतस्तोकोद्धृताननुद्धृतघृतानां तक्राणां गुणानाह समुद्धृतघृतं तक्रं पथ्यं लघु विशेषतः ॥९॥ स्तोकोद्धृतघृतं तस्माद् गुरु वृष्य कफापहम्। अनुद्धृतघृतं सान्द्रं गुरु पुष्टिकफप्रदम् ॥१०॥ घी निकाला हुआ तक्र—पथ्य (रोगियों के लिये हितकर) तथा लघु होता है। यदि कुछ घी निकाल लिया गया हो और कुछ अंश घी का रह गया हो तो ऐसा तक्र—उपर्युक्त तक्र (घी निकाले हुये तक्र) की अपेक्षा गुरु, वीर्यवर्धक तथा कफनाशक होता है और यदि घी न निकाला हुआ हो तथा गाढ़ा हो तो ऐसा तक्र-गुरु एवम् पुष्टिकारक तथा कफजनक होता है। [९-१०] अथ दोषविशेषे व्याधिविशेषे च तक्रविशेषानाह वातेऽम्लं शस्यते तक्रं शुण्ठीसैन्धवसंयुक्तम्। पित्ते स्वादु सितायुक्तं व्योषक्षारयुक्तं कफे ॥११॥ हिङ्गूजीरयुतं घोलं सैन्धवेन च संयुतम्। भवेदतीव वातघ्नमर्शोऽतीसारहृत्परम् ॥१२॥ रुचिदं पुष्टिदं बल्यं वस्तिशूलविनाशनम्। मूत्रकृच्छ्रे तु सगुडं पाण्डुरोगे सचित्रकम् ॥१३॥ दोषविशेष में तथा रोगविशेष में विशेष दो तक्रों का प्रयोग—वातदोष की अधिकता में—अम्लरसयुक्त एवम् सोंठ तथा सेन्धा नमक मिला हुआ तक्र उत्तम अर्थात् हितकारी होता है। पित्त की अधिकता में—मधुर रसयुक्त तथा चीनी मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। कफ की अधिकता में—सोंठ, मिरच तथा पीपर मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। हींग, जीरा (ये दोनों भुने हुये हों) तथा सेंधा नमक से युक्त घोल—अत्यन्त वातनाशक, अर्श तथा अतिसार को अत्यन्त दूर करने वाला, रुचिजनक, पुष्टिकारक, बलदायक एवं बस्तिशूल नाशक होता है। गुड़युक्त घोल—मूत्रकृच्छ्र में एवम् चित्रक (चीता) मिश्रित घोल—पाण्डुरोग में देना हितकर है। अथ पक्वापक्वतक्रयोर्गुणानाह तक्रमामं कफं कोष्ठे हन्ति कण्ठे करोति च। पीनसश्वासकासादौ पक्वमेव प्रयुज्यते ॥१४॥ कच्चा (बिना पकाया हुआ) तक्र-कोष्ठ स्थित कफ को नष्ट करता है तथा कण्ठ में कफ करने वाला होता है। अतः पकाये हुए तक्र का ही—पीनस, श्वास तथा कास आदि में प्रयोग करना उचित है क्योंकि हितकर होता है। [१४] अथ तक्रसेवनविषयानाह शीतकालेऽग्निमान्द्ये च तथा वातामयेषु च। अरुचौ स्रोतसां रोधे तक्रं स्यादमृतोपमम् ॥ तत्तु हन्ति गरच्छर्दिप्रसेकविषमज्वरान्। पाण्डुमेदोग्रहण्यर्शोर्मूत्रग्रहभगन्दरान् ॥१५॥ मेहं गुल्ममतीसारं शूलप्लीहोदरारुचीः। श्वित्रकोष्ठगतव्याधीन् कुष्ठशोथतृषाकृमीन् ॥१६॥

९२० भावप्रकाशनिघण्टुः **तक्र सेवन करने के विषय-**शीतकाल में तथा अग्नि की मन्दता, वातरोग, अरुचि तथा नाड़ियों के अवरोध में तक्र अमृत के समान गुणकारी होता है। और यह—गर (संयोगज विष), वमन, प्रसेक (कफजन्य लार आदि गिरना), विषमज्वर, पाण्डुरोग, मेदरोग, ग्रहणी, अर्श (बवासीर), मूत्रग्रह (मूत्र का बन्द होना), भगन्दर, प्रमेह, गुल्म, अतीसार, शूल, प्लीहा, उदररोग, अरुचि, श्वित्र (श्वेतकुष्ठ), कोष्ठगत रोग, कुष्ठ, शोथ, तृषा तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। [१४-१६]

अथ तक्रस्य निषेधविषयानाह

नैव तक्रं क्षये$^१$ दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले। न मूर्च्छाभ्रमदाहेषु न रोगे रक्तपित्तजे ॥१७॥ **तक्र निषेध के विषय—**तक्र—क्षय रोग में तथा ग्रीष्म ऋतु में एवम् दुर्बल व्यक्ति तथा मूर्च्छा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग युक्त व्यक्ति को नहीं देना चाहिये। अर्थात् देना अहितकर होता है। [१७]

अथ गव्यादीनां विशिष्टतक्राणां गुणानाह

यान्युक्तानि दधीन्यष्टौ तद्गुणं तक्रमादिशेत् ॥१८॥ **गाय आदि के दूध के दही से बने हुये तक्र के गुण—**जो पूर्व में (दधिवर्ग में) गाय आदि के दूध के बने हुए आठ प्रकार के दहियों के गुण कह आये हैं वे ही सब गुण उन दहियों से बने हुये तक्र के भी होते हैं, ऐसा समझना चाहिये। [१८] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तक्रवर्गः समाप्तः। ❖|||❖ १. श्वास इति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ नवनीतवर्गः तत्र नवनीतस्य नामगुणानाह म्रक्षणं सरजं हैयङ्गवीनं नवनीतकम्। नवनीतं हितं गव्यं वृष्यं वर्णबलाग्निकृत् ।।१।। संग्राहि वातपित्तासृक्क्षयार्शोऽर्दितकासहृत्। तद्धितं बालके वृद्धे विशेषादमृतं शिशोः ।।२।। मक्खन के संस्कृत नाम-म्रक्षण, सरज, हैयङ्गवीन तथा नवनीतक ये सब हैं। गाय का मक्खन-हितकर, वीर्यवर्धक, वर्ण को उत्तम करने वाला, बल तथा अग्नि को बढ़ाने वाला, मलसंग्राही, एवम् वात, पित्त, रक्तविकार, क्षय, अर्श, अर्दित वात तथा कास को दूर करने वाला होता है। तथा यह-बालक और वृद्ध के लिये हितकर एवम् विशेषकर के शिशु (अत्यन्त छोटे बच्चों) के लिये अमृत के समान गुणकारी होता है। [१-२] अथ माहिषनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं महिष्यास्तु वातश्लेष्मकरं गुरु। दाहपित्तश्रमहरं मेदःशुक्रविवर्द्धनम् ।।३।। भैंस का मक्खन-वात तथा कफ कारक, गुरु एवम् दाह, पित्त तथा श्रम को दूर करने वाला और मेद तथा शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है। [३] अथ दुग्धोत्थनवनीतस्य गुणानाह दुग्धोत्थं नवनीतं तु चक्षुष्यं रक्तपित्तनुत्। वृष्यं बल्यमतिस्निग्धं मधुरं ग्राहि शीतलम् ।।४।। दूध से निकला हुआ मक्खन-नेत्रों के लिये हितकर, रक्तपित्तनाशक, वीर्यवर्धक, बलकारक, अत्यन्त स्निग्ध, मधुर रसयुक्त, ग्राही तथा शीतल होता है। [४] अथ सद्योनिःसारितनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं तु सद्यस्कं स्वादु ग्राहि हिमं लघु। मेध्यं किञ्चित्कषायाम्लमीषत्तक्रांशसङ्क्रमात् ।।५।। तत्काल का निकाला हुआ मक्खन-स्वादिष्ट, ग्राही, शीतल, लघु, मेधा के लिये हितकर एवम् किञ्चित् तक्र का अंश मिला रहने से किञ्चित् कषाय तथा अम्ल रस से युक्त भी होता है। [५] अथ चिरन्तननवनीतस्य गुणानाह सक्षारकटुकाम्लत्वाच्छर्द्यर्शःकुष्ठकारकम् । श्लेष्मलं गुरु मेदस्यं नवनीतं चिरन्तनम् ।।६।। पुराना मक्खन-क्षार, कटु तथा अम्ल रस युक्त होने से वमन, अर्श तथा कुष्ठ को उत्पन्न करने वाला होता है एवम् कफजनक, गुरु तथा मेद को बढ़ाने वाला होता है। [६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे नवनीतवर्गः समाप्तः।

अथ घृतवर्गः तत्र घृतस्य नामगुणानाह घृतमाज्यं हविः सर्पिः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । घृतं रसायनं स्वादु चक्षुष्यं वह्निदीपनम् ।।१।। शीतवीर्यं विषालक्ष्मीपापपित्तानिलापहम् । अल्पाभिष्यन्दि कान्त्योजस्तेजोलावण्यवृद्धिकृत् ।।२।। स्वरस्मृतिकरं मेध्यमायुष्यं बलकृद्गुरु । उदावर्त्तज्वरोन्मादशूलानाहव्रणान् हरेत् । स्निग्धं कफकरं रक्षःक्षयवीसर्परक्तनुत् ।।३।। घी के संस्कृत नाम-घृत, आज्य, हविस् तथा सर्पिस् ये सब हैं। घी-रसायन, स्वादिष्ट, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, शीतवीर्य, किंचित् अभिष्यन्दौ, क्रान्ति, ओज, तेज और लावण्य की वृद्धि करने वाला, स्वर को स्वच्छ करने वाला तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकर, आयु को बढ़ाने वाला, बलकारक, गुरु, स्निग्ध, कफकारक, एवम् विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), पाप, पित्त, वायु, उदावर्त्त, ज्वर, उन्माद, शूल, आनाह (अफारा), व्रण, रक्षोग्रह, क्षय, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१-३] अथ गव्यघृतस्य गुणानाह गव्यं घृतं विशेषेण चक्षुष्यं वृष्यमग्निकृत् । स्वादुपाककरं शीतं वातपित्तकफापहम् ।।४।। मेधालावण्यकान्त्योजस्तेजोवृद्धिकरं परम् । अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं वयसः स्थापकं गुरु ।।५।। बल्यं पवित्रमायुष्यं सुमङ्गल्यं रसायनम् । सुगन्धि रोचनं चारु सर्वाज्येषु गुणाधिकम् ।।६।। गाय का घी-विशेष करके नेत्रों के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, अग्निवर्धक, विपाक में मधुररसयुक्त, शीतल, वात पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाला एवम् मेधाशक्ति, लावण्य, कान्ति, ओज तथा तेज की अत्यन्त वृद्धि करने वाला, अलक्ष्मी, पाप तथा रक्षोग्रह को दूर करने वाला, अवस्था को स्थिर रखने वाला, गुरु, बलकारक, पवित्र, आयु को बढ़ाने वाला, मङ्गलदायक, रसायन, सुगन्धयुक्त, रोचक एवम् सम्पूर्ण घृतों में उत्तम तथा अधिक गुणकारी होता है। [४-६] अथ माहिषघृतस्य गुणानाह माहिषन्तु घृतं स्वादु पित्तरक्तानिलापहम् । शीतलं श्लेष्मलं वृष्यं गुरु स्वादु विपच्यते ।।७।। भैंस का घी-स्वादिष्ट, शीतल, कफजनक, वीर्यवर्धक, गुरु, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम् पित्त और रक्त विकार तथा वात को नष्ट करने वाला होता है। [७] अथाजघृतस्य गुणानाह आजमाज्यं करोत्यग्निं चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् । कासे श्वासे क्षये चापि हितं पाके भवेत् कटु ।।८।। बकरी का घी-जठराग्निकारक, नेत्रों के लिये हितकर, बलवर्धक, कास, श्वास तथा क्षय रोग में हितकर एवम् विपाक में कटुरसयुक्त होता है। [८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

घृतवर्गः ९२३ अथौष्ट्रघृतस्य गुणानाह औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषक्रिमिविषापहम्। दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम्।।९।। ऊँटिनी का घी—विपाक में कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, कफ-वात नाशक एवम् शोष, क्रिमि, विष, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग को नष्ट करने वाला होता है। [९] अथाविकघृतस्य गुणानाह पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविनाशनम् ।।१०।। वृद्धिं करोति चास्थ्नां वा अश्मरीशर्कराऽपहम्। चक्षुष्यमग्निसंधुक्ष्यं वातदोषनिवारणम् ।।११।। भेंड़ी का घी—पाक में लघु, सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, हड्डियों की वृद्धि करने वाला, नेत्रों के लिए हितकर, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला एवम् पथरी, शर्करा तथा वात सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाला होता है। [१०-११] अथ नारीघृतस्य गुणानाह कफेऽनिले योनिदोषे पित्ते रक्ते च तद्धितम्। चक्षुष्यमाज्यं स्त्रीणां वा सर्पिः स्यादाभृतोपमम् ।।१२।। स्त्री का घी—अमृत के समान होता है तथा यह नेत्रों के लिये हितकर, एवम् कफ, वात, योनिदोष, पित्त तथा रक्तविकार में भी हितकर होता है। [१२] अथ वडवाघृतस्य गुणानाह वृद्धि करोति देहाग्नेर्लघु पाके विषापहम्। तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुद् वडवाघृतम् ।।१३।। घोड़ी का घी—देह तथा अग्नि की वृद्धि करने वाला, पाक में लघु, विषनाशक, तृप्तिकारक, नेत्ररोगनाशक तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [१३] अथ दुग्धनिःसृतघृतस्य गुणानाह घृतं दुग्धभवं ग्राहि शीतलं नेत्ररोगहृत्। निहन्ति पित्तदाहास्रमदमूर्च्छाभ्रमानिलान् ।।१४।। दूध से निकाला हुआ घी—ग्राही, शीतल, नेत्ररोगनाशक एवम्—पित्त, दाह, रक्तविकार, मद, मूर्च्छा, भ्रम तथा वात को दूर करने वाला होता है। [१४] अथ ह्यस्तनदुग्धोत्थघृतस्य गुणानाह हविर्ह्यस्तनदुग्धोत्थं तत्स्याद्धैयङ्गवीनकम्। हैयङ्गवीनं चक्षुष्यं दीपनं रुचिकृत्परम्। बलकृद् बृंहणं वृष्यं विशेषाज्ज्वरनाशनम् ।।१५।। एक दिन के पहले के दूध से निकाले हुए घी को संस्कृत में "हैयङ्गवीन" कहते हैं। हैयङ्गवीन—यह नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, अत्यन्त रुचिकारक, बलवर्धक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक तथा विशेष करके ज्वरनाशक होता है। [१५] अथ पुराणघृतस्य गुणानाह वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रिदोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ।।१६।। यथा यथाऽखिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत्तत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ।।१७।।

९२४ भावप्रकाशनिघण्टुः पुराना घी—एक वर्ष से ऊपर का रक्खा हुआ घी पुराना कहलाता है । पुराना घी—त्रिदोषनाशक एवम्, मूर्च्छा, कुष्ठ, विष, उन्माद, मिर्गी तथा तिमिर रोग को दूर करने वाला होता है । पूर्वोक्त सभी घृत—जैसे-जैसे अधिक पुराने होते जायेंगे वैसे-वैसे अपने-अपने गुणों को अधिक करते जायेंगे अर्थात् उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होते जायेंगे । [१६-१७] अथ नवीनघृतस्य विषयानाह योजयेन्नवमे वाज्यं भोजने तर्पणे श्रमे । बलक्षये पाण्डुरोगे कामलानेत्ररोगयोः ।। १८ ।। नवीन घी के प्रयोग करने के विषय—भोजन, तर्पण, परिश्रम, बल का क्षय, पाण्डु, कामला तथा नेत्ररोग इन सबों में नवीन घृत का ही प्रयोग करना चाहिये । [१८] अथ घृतप्रयोगस्याविषयानाह राजयक्ष्मणि बाले च वृद्धे श्लेष्मकृते गदे ।। १९ ।। रोगे सोमे विषूच्याञ्च विबन्धे च मदात्यये । ज्वरे च दहने मन्दे न सर्पिर्बहु मन्यते ।। २० ।। घी प्रयोग करने के अविषय—बालक तथा वृद्ध लोगों के लिये, एवम् राजयक्ष्मा, कफजन्यरोग, आमयुक्त रोग, विषूचिका (हैजा), मलबन्ध, मदात्ययं, ज्वर तथा अग्नि की मन्दता इन सबों में घी देना अत्यन्त प्रशस्त नहीं है। [१९-२०] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे घृतवर्गः समाप्तः ।।

अथ मूत्रवर्गः तत्र गोमूत्रगुणानाह गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं क्षारं तिक्तकषायकम्। लघ्वग्निदीपनं मेध्यं पित्तकृत्कफवातहृत् ।।१।। शूलगुल्मोदरानाहकण्ड्वक्षिमुखरोगजित् । किलासगदवातामवस्तिरुक्कुष्ठनाशनम् ।। कासवासापहं शोथकामलापाण्डुरोगहृत् ।।२।। कण्डूकिलासगदशूलमुखाक्षिरोगान्गुल्मातिसारमरुदामयमूत्ररोधान् । कासं सकुष्ठजठरक्रिमिपाण्डुरोगानगोमूत्रमेकमपि पीतमपाकरोति ।।३।। सर्वेष्वपि च मूत्रेष्ु गोमूत्रं गुणतोऽधिकम् । अतोऽविशेषात्कथने मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ।।४।। प्लीहोदरश्वासकासशोथवर्चोग्रहापहम् ।।५।। शूलगुल्मरुजाऽऽनाहकामलापाण्डुरोगहृत् । कषायं तिक्ततीक्ष्णं च पूरणात्कर्णशूलहृत् ।।६।। गोमूत्र-कटु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, क्षार, लघु, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पित्तकारक, कफ तथा वातनाशक एवम् शूल, गुल्म, उदररोग, आनाह (अफारा), खुजली, नेत्र तथा मुखसम्बन्धी रोग, किलास रोग (कुष्ठभेद), वात, आम, बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, कास, श्वास, शोथ, कामला तथा पाण्डुरोग को नष्ट करने वाला होता है। और केवल एक गोमूत्र पान करने से खुजली, किलास रोग, शूल, मुख तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, गुल्म, अतिसार, वातरोग, मूत्ररोध, कास, कुष्ठ, उदररोग, क्रिमि तथा पाण्डुरोग ये सब दूर हो जाते हैं। और सम्पूर्ण मूत्रों में गोमूत्र ही सबसे अधिक गुणकारी होता है, अतः जहाँ पर सामान्य रूप से केवल "मूत्र" शब्द का प्रयोग आवे वहाँ पर "गोमूत्र" का ही बोध करना चाहिये। गोमूत्र-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, तीक्ष्ण गुण युक्त, कान में डालने से कर्णशूलनाशक एवम्-प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, शोथ, मलरोध, शूल, गुल्म, आनाह (अफारा), कामला तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला होता है। [१-६] अथ मनुष्यमूत्रगुणानाह नरमूत्रं गरं हन्ति सेवितं तद्रसायनम् । रक्तपामाहरं तीक्ष्णं सक्षारलवणं स्मृतम् ।।७।। मनुष्य का मूत्र-तीक्ष्ण, क्षार तथा लवण रसयुक्त, गरसंज्ञक विष, रक्तविकार तथा पामारोग नाशक होता है एवम् यह सेवन करने से रसायन है। [७] अथ मूत्रस्य सामान्यपरिभाषामाह गोऽजाऽविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रे भनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम् ।।९।। मूत्रविषयक सामान्य परिभाषा-गाय, बकरी तथा भैंस इनमें स्त्री जाति का मूत्र उत्तम होता है तथा गदहा, ऊँट, हाथी, मनुष्य तथा घोड़ा इनमें पुरुष जाति का मूत्र हितकारक होता है अर्थात् जहाँ पर प्रयोग करना हो तो वहाँ पर उक्त मूत्रों का ही ग्रहण करना चाहिये। [९] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मूत्रवर्गः समाप्तः ।।१८।।

अथ तैलवर्गः

तत्र तैलस्य स्वरूपं गुणं चाह

तिलादिस्निग्धवस्तूनां स्नेहस्तैलमुदाहृतम्। तत्तु वातहरं सर्वं विशेषात्तिलसम्भवम् ।।१।। तेल का स्वरूप—तिल आदि स्निग्ध (स्नेहयुक्त) वस्तुओं के स्नेह भाग को मुनि लोग “तैल” कहते हैं। तेल—सभी प्रकार के तेल यद्यपि वातनाशक होते हैं तथापि तिल का तेल विशेष रूप से वात को नष्ट करने वाला होता है। [१]

अथ तिलतैलगुणानाह

तिलतैलं गुरु स्थैर्यबलवर्णकरं सरम्। वृष्यं विकाशि विशदं मधुरं रसपाकयोः ।।२।। सूक्ष्मं कषायानुरसं तिक्तं वातकफापहम्। वीर्येणोष्णं हिमं स्पर्शे बृंहणं रक्तपित्तकृत् ।।३।। लेखनं बद्धविण्मूत्रं गर्भाशयविशोधनम्। दीपनं बुद्धिदं मेध्यं व्यवायि व्रणमेहनुत् ।।४।। श्रोत्रयोनिशिरःशूलनाशनं लघुताकरम्। त्वच्यं केश्यं च चक्षुष्यमभ्यङ्गे भोजनेऽन्यथा ।।५।। छिन्नभिन्नच्युतोत्पिष्टमथितक्षतपिच्चिते । भग्नस्फुटितविद्धाग्निदग्धविश्लिष्टदारिते ।।६।। तथाऽभिहतनिर्भुग्नमृगव्याघ्रादिविक्षते । वस्तौ पानेऽन्नसंस्कारे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।। सेकाभ्यङ्गावगाहेषु तिलतैलं प्रशस्यते ।।७।। तिल का तेल—गुरु, स्थिरता तथा बल कारक, वर्ण को उत्तम करने वाला, सारक, वृष्य (वीर्यवर्धक), विकाशी, विशद, रस तथा पाक में मधुर, सूक्ष्म गुण युक्त, आरम्भ में तिक्तरसयुक्त पश्चात् कषाय रस युक्त, वात तथा कफ नाशक, उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), रक्तपित्तकारक, लेखन, मल तथा मूत्र को बाँधने वाला, गर्भाशय का शोधन करने वाला, अग्निदीपक, बुद्धिदायक, मेधा के लिये हितकर, व्यवायि गुण युक्त, व्रण तथा मेह को दूर करने वाला, कान, योनि तथा शिर सम्बन्धी शूल नाशक, शरीर में लघुता करने वाला, अभ्यङ्ग (शरीर में मालिश) करने से त्वचा, केश तथा नेत्रों के लिये हितकर, किन्तु भोजन करने से अन्यथा होता है अर्थात् त्वचा, केश तथा नेत्र के लिये अहितकर होता है। एवम्—छिंदजाने, भिदजाने, गिरजाने, पिसजाने, मसलजाने, घाव हो जाने, पिचजाने, टूटजाने, फटजाने, बिधजाने, अग्नि से जलजाने, हड्डियों के अपने स्थान से हटजाने, चिरजाने, चोट लगजाने, किसी अंग के टेढ़े हो जाने तथा मृग या बाघ आदि से घायल हो जाने पर तिल का तेल हितकर होता है, एवम्—बस्तिकर्म, पीने तथा अन्न के संस्कार करने (छौंकने) में और नस्य (नास) लेने तथा कान व आँख में डालने में एवम् सेंकने, मर्दन तथा अवगाहन करने में तिल का तेल उत्तम होता है। [२-७] तिल—इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के (पृष्ठ ८०४) पर किया गया है।

ननु बृंहणलेखनयोः कथं सामानाधिकरण्यमित्याह

रूक्षादिदुष्टः पवनः स्रोतः संकोचयेद् यदा। रसोऽसम्यग्वहन् कार्श्यं कुर्याद्रक्तान्यवर्द्धनम् ।।८।। तेषु प्रवेष्टुं सरतासौक्ष्म्यस्निग्धत्वमार्दवैः। तैलं क्षमं रसं नेतुं कृशानां तेन बृंहणम् ।।९।। व्यवायिसूक्ष्मतक्ष्णोष्णसरत्वैर्भेदसः क्षयम्। शनैः प्रकरुते तैलं तेन लेखनमीरितम् ।।१०।। द्रुतं पुरीषं बध्नाति स्खलितं पत्प्रवर्त्तयेत्। ग्राहकं सारकञ्चापि तेन तैलमुदीरितम् ।।११।।

तैलवर्गः ९२७ यहाँ पर यह शङ्का होती है कि—परस्पर विरुद्ध धर्म वाले बृंहण तथा लेखन ये दोनों एक साथ तिल के तेल में कैसे रहते हैं ? इसी का उत्तर देते हुये कहते हैं कि—रूक्षादि पदार्थों के सेवन करने से जब वायु दुष्ट होकर स्रोतोमार्ग को संकुचित करता है तब रस भली-भाँति नहीं बहने पाता और उससे रक्त की भी वृद्धि नहीं होने पाती अतः उक्त रस शरीर में कृशता करने लगता है। ऐसी स्थिति में तिलतैल—उन संकुचित स्रोतों में अपने सरता, सूक्ष्मता, स्निग्धता तथा मृदुता इन सब गुणों के द्वारा प्रवेश करने के लिये तथा रसों को सर्वत्र यथास्थान पहुँचाने के लिये समर्थ होता है, इसी से कृश (दुर्बल) लोगों के लिये बृंहण (रस-रक्त-मांसादि का वर्धक) कहा गया है और व्यवायी, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, उष्ण तथा सर इन सब गुणों से युक्त होने से इनके द्वारा मेदा का धीरे-धीरे क्षय करता है, अतः तिल का तेल “लेखन” कहा गया है। और पतले मल को बाँधता है तथा जो मल अपने स्थान से हट चुका है उसकी प्रवृत्ति कराता है अतः क्रम से तेल ग्राहक तथा सारक दोनों कहा गया है। [८-११] अथ घृततैलयोः परिभाषामाह घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यं प्रजायते। तैलं पक्वमपक्वं वा चिरस्थायि गुणाधिकम् ।।१२।। घी तथा तेल की परिभाषा—एक वर्ष से अधिक पुराना होने पर पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है किन्तु तेल चाहे पकाया हुआ हो अथवा कच्चा ही हो जैसे-जैसे पुराना होता जाता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है। [१२] अथ सर्षपराजिका तैलयोगुणानाह दीपनं सार्षपं तैलं कटुपाकरसं लघु। लेखनं स्पर्शवीर्य्योष्णं तीक्ष्णं पित्तास्रदूषकम् ।।१३।। कफमेदोऽनिलार्शोघ्नं शिरःकर्णामयापहम्। कण्डूकुष्ठकृमिश्वित्रकोठदुष्टकृमिप्रणुत् ।।१४।। तद्वद्राजिकयोस्तैलं विशेषान्मूत्रकृच्छ्रकृत् ।।१५।। सरसों का तेल—अग्निदीपक, रस तथा विपाक में कटु रस युक्त, लघु, लेखन, स्पर्श तथा वीर्य में उष्ण, तीक्ष्ण, पित्त तथा रक्त को दूषित करने वाला एवम्-कफ, मेद, वायु, बवासीर, शिर तथा कान सम्बन्धी रोग, खुजली, कुष्ठ, कृमि, श्वेतकुष्ठ, कोठ तथा दुष्ट कृमि को नष्ट करने वाला होता है, इसी प्रकार से दोनों प्रकार के राई के तेल के भी गुण हैं—किन्तु विशेष कर उन दोनों के तेल मूत्रकृच्छ्र-कारक होते हैं। [१४-१५] ❖ राजिकयोः = कृष्णराजिकारक्तराजिकयोः ।।१५।। यहाँ पर मूल में “राजिकयोः” पद से “दोनों प्रकार की राई अर्थात् काली राई तथा लाल राई के” यह अर्थ समझना चाहिये। [१५] इनका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८२९ पर किया गया है। अथ तुवरीतैलगुणानाह तीक्ष्णोष्णं तुवरीतैलं लघु ग्राहि कफास्रजित्। वह्निकृद्विषहृत्कण्डूकुष्ठकोठकृमिप्रणुत् ।। मेदोदोषापहं चापि व्रणशोथहरं परम् ।।१६।। तुवरी का तेल—तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, ग्राही, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, अग्निकारक, विषनाशक एवम्-खुजली, कुष्ठ, कोठ, कृमि तथा मेद सम्बन्धी दोष को नष्ट करने वाला, एवम् व्रण तथा शोथ को अत्यन्त दूर करने वाला होता है। [१६] इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८०६ पर किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९२८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथातसीतैलगुणानाह अतसीतैलमाग्नेयं स्निग्धोष्णं कफपित्तकृत्। कटुपाकमचक्षुष्यं बल्यं वातहरं गुरु ।।१७।। मलकृद्रसतः स्वादु ग्राहि त्वग्दोषहृद् घनम् ।।१८।। वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णस्य पूरणे। अनुपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ।।१९।। अलसी का तेल-आग्नेय (अग्नि के अधिक अंशों से युक्त), स्निग्ध उष्ण, कफ तथा पित्त कारक, विपाक में कटु रसयुक्त, नेत्रों के लिए अहितकर, बलकारक, वातनाशक, गुरु, मलकारक, मधुररसयुक्त, ग्राही, त्वचा गत दोष को दूर करने वाला और घन है और बस्तिकर्म पीने तथा मालिश करने में एवम् नस्य (नास) लेने तथा कान में डालने के लिये और वायु को शान्त करने के लिये अनुपान विधि में अलसी के तेल का प्रयोग करना चाहिये । [१७-१९] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२७ पर किया गया है । अथ कुसुम्भतैलगुणानाह कुसुम्भतैलमम्लं स्यादुष्णं गुरु विदाहि च। चक्षुर्भ्यामहितं बल्यं रक्तपित्तकफप्रदम् ।।२०।। कुसुम का तेल-अम्लरस युक्त, उष्ण, गुरु, विदाही, नेत्रों के लिये अहितकर, बलकारक एवम् रक्तपित्त तथा कफ कारक है । [२०] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२८ पर किया गया है । अथ खसबीज (पोस्त) तैलगुणानाह तैलं तु खसबीजानां बल्यं वृष्यं गुरु स्मृतम्। वातहृत्कफहृच्छीतं स्वादुपाकरसं च तत् ।।२१।। पोस्ता का तेल-बलकारक, वीर्यवर्धक, गुरु, वात तथा कफ नाशक, शीतल एवम् रस तथा विपाक में मधुर होता है । [२१] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ३३७ पर किया गया है । अथैरण्डतैलगुणानाह एरण्डतैलं तीक्ष्णोष्णं दीपनं पिच्छिलं गुरु। वृष्यं त्वच्यं वयःस्थापि मेधाकान्तिबलप्रदम् ।।२२।। कषायानुरसं सूक्ष्मं योनिशुक्रविशोधनम्। विस्रंस्वादु रसे पाके सतिक्तं कटुकं रसम् ।।२३।। विषमज्वरहृद्रोगपृष्ठगुह्यादिशूलनुत् । हन्ति वातोदरानाहगुल्माष्ठीलाकटिग्रहान् ।।२४।। वातशोणितविड्बन्धब्रध्नशोथामविद्रधीन् । आमवातगजेन्द्रस्य शरीरवनचारिणः ।। एक एव निहन्ताऽयमेरण्डस्नेहकेसरी ।।२५।। रेंड़ी का तेल-तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, पिच्छिल गुण युक्त, गुरु, वीर्यवर्धक, त्वचा के लिये हितकर, अवस्था को स्थिर रखने वाला, मेधा, कान्ति तथा बल को देने वाला, मधुर, तिक्त तथा कटुरस युक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतों में प्रवेश करने वाला), योनि तथा शुक्र का शोधन करने वाला, विस्र (दुर्गन्ध युक्त), सारक एवम्-विषमज्वर, हृद्रोग, पीठ तथा गुह्य (गुदा) आदि का शूल, वात, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा), गुल्म, अष्ठीला, कटिग्रह (कमर का अकड़जाना), वातरक्त, मलबन्ध, ब्रध्न, शोथ, आम और विद्रधि को दूर करने वाला होता है ।

तैलवर्गः ९२९ शरीर रूपी जंगल के अन्दर विचरने वाले आमवात रूपी गजराज को अकेला ही नाश करने वाला यह रेड़ी का तेल रूपी सिंह है। [२२-२५] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ४७५ पर किया गया है। अथ सर्जरसतैलगुणानाह तैलं सर्जरसोद्भूतं विस्फोटव्रणनाशनम्। कुष्ठपामाकृमिहरं वातश्लेष्मामयापहम् ।। २६ ।। सर्जरस का तेल—विस्फोटक (फोड़ा), व्रण, कुष्ठ, खुजली, कृमि, वात तथा कफसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है। [२६] अथ सर्व तैलानां गुणानाह तैलं स्वयोनिगुणकृद्वाग्भटेनाखिलं मतम्। अतः शेषस्य तैलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिवत् ।। २७ ।। सभी प्रकार के तैलों के गुण—“वाग्भट” का यह मत है कि—सभी तेल अपने-अपने मूल द्रव्यों के अनुरूप गुणवाले होते हैं अर्थात् जिसका जो गुण होता है उसके तेल का भी वही गुण होता है। अतः अवशिष्ट तैलों के गुण उनके द्रव्यों के समान ही समझने चाहिये। [२७] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तैलवर्गः समाप्तः ।। २० ।। ६२ भाव.I

अथ सन्धानवर्गः तत्र काञ्जिकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सन्धितं धान्यमण्डादि काञ्जिकं कथ्यते जनैः । काञ्जिकं भेदि तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनंलघु ।।१।। दाहज्वरहरं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् । माषादिवटकैर्यत्तु क्रियते तद् गुणाधिकम् ।।२।। लघु वातहरं तत्तु रोचनं पाचनं परम् । शूलाजीर्णविबन्ध्यामनाशनं वस्तिशोधनम् ।।३।। काञ्जी के लक्षण—जो धान्य और मण्डक आदि किसी पात्र में रख कर उसमें जल डाल कर उस पात्र का मुँह तीन दिन ढँक कर रखा रहता है उसी को कांजिक (कांजी) कहते हैं । कांजी—मल का भेदन करने वाली, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, स्पर्श (लगाने) से दाह तथा ज्वर को दूर करने वाली, पीने से वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है । और यही-कांजी—यदि उरद के बड़े आदि से तैयार की जाय तो अधिक गुणकारी होती है । अर्थात् यह—लघु, वातनाशक, रोचक तथा अत्यन्त पाचक, वस्तिशोधक एवम् शूल, अजीर्ण, विबन्ध तथा आम को नष्ट करने वाली होती है । [१-३] अथ काञ्जिकसेवनायोग्यजनानाह शोषमूर्च्छाभ्रमार्त्तानां मदकण्डूविशोषिणाम् । कुष्ठिनां रक्तपित्तिनां काञ्जिकं न प्रशस्यते ।।४।। पाण्डुरोगे यक्ष्मणि च तथा शोषातुरेषु च । क्षतक्षीणे तथा श्रान्ते मन्दज्वरनिपीडते ।। एतेषां न हितं प्रोक्तं काञ्जिकं दोषकारकम् ।।५।। काञ्जी सेवन के अयोग्य लोग—जो लोग-शोष, मूर्च्छा या भ्रम से आर्त हैं अथवा-मद तथा खुजली से सूखते जाते हैं, किंवा कुष्ठ तथा रक्तपित्त रोग वाले हैं, उन लोगों के लिये काञ्जी उत्तम (हितकर) नहीं होता है । एवम्-पाण्डुरोग, यक्ष्मा तथा शोष रोग से पीड़ित और क्षत से क्षीण, परिश्रम से थके हुए तथा मन्दज्वर से जो पीड़ित हैं उन लोगों के लिये भी काञ्जी हितकर नहीं होती प्रत्युत दोषों को उत्पन्न करने वाली ही होती है । [४-५] अथ तुषोदकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह तुषोदकं यवैरामैः सतुषैः शकलीकृतैः ।।६।। तुषोदक के लक्षण—कच्चे तथा भूसी के सहित जो टुकड़े-टुकड़े किये हुये जौ हैं उन्हें सन्धान की रीति से यदि रख दिया जाय तो जो जल भाग है उसी को "तुषोदक" कहते हैं । [६] ❖ यवैः = उदके संहितैः सन्धानवर्गोक्तत्वात् ।।६।। यहाँ पर "यवैः" पद से "सन्धानवर्ग" में कहे हुये होने से जल में सन्धान की रीति से रखे हुये जौ यह अर्थ समझना चाहिये ।।६।। तुषाम्बु दीपनं हृद्यं पाण्डुकृमिगदापहम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं पित्तरक्तकृद्वस्तिशूलनुत् ।।७।। तुषाम्बु अर्थात् तुषोदक—अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, तीक्ष्ण, उष्ण, पाचक एवम् पाण्डु तथा क्रिमिरोग नाशक, पित्त तथा रक्तविकार को उत्पन्न करने वाला और वस्तिशूल नाशक होता है । [७]

सन्धानवर्गः ९३१ अथ सौवीरस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सौवीरं तु यवैरामैः पक्वैर्वा निस्तुषैः कृतम्। गोधूमैरपि सौवीरमाचार्याः केचिदूचिरे ।।८।। सौवीरं तु ग्रहण्यार्शःकफघ्नं भेदि दीपनम्। उदावर्त्ताङ्गमर्दास्थिशूलानाहेषु शस्यते ।।९।। सौवीर के लक्षण-कच्चे अथवा पके भूसी रहित जौ के टुकड़ों से उक्त संधान की रीति से जो जल तैयार होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-इसी भाँति जो गेहूँ के टुकड़ों से तैयार किया जाता है उसे "सौवीर" कहते हैं। सौवीर-मलभेदक, अग्निदीपक तथा ग्रहणी, अर्श और कफ नाशक एवम् उदावर्त्त, अंगमर्द (शरीर में दर्द) हड्डियों में शूल की भाँति दर्द तथा आनाह (अफरा) में उत्तम (हितकर) होता है। [८-९] अथारनालस्य लक्षणं गुणाँश्चाह आरनालं तु गोधूमैरामैः स्यान्निस्तुषीकृतैः। पक्वैर्वा सन्थितैस्तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः ।।१०।। आरनाल के लक्षण-कच्चे अथवा पके हुए भूसी रहित गेहूँ के टुकड़ों से सन्धान की रीति से तैयार किये हुए को "आरनाल" कहते हैं। आरनाल-गुणों में सौवीर की भाँति ही होता है। [१०] अथ धान्याम्लस्य लक्षणं गुणाँश्चाह धान्याम्लं शालिचूर्णं च कोद्रवादिकृतं भवेत्। धान्याम्लं धान्ययोनित्वाप्रीणनं लघु दीपनम्। अरुचौ वातरोगेषु सर्वेष्वास्थापने हितम् ।।११।। धान्याम्ल के लक्षण-शालि (जड़हन) चावलों के चूर्ण अथवा कोदो आदि के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "धान्याम्ल" कहते हैं। धान्याम्ल-इसका योनि (उपादान कारण) धान्य होने से यह- तृप्तिकारक, लघु, अग्निदीपक एवम् अरुचि, सभी प्रकार के वातरोग तथा आस्थापन वस्ति में हितकर होता है। [११] अथ शिण्डाक्या लक्षणं गुणाँश्चाह शिण्डाकी राजिकायुक्तैः स्यान्मूलकदलद्रवैः। सर्षपस्वरसैर्वाऽपि शालिपिष्टकसंयुतैः ।।१२।। शिण्डाकी के लक्षण-राई तथा मूली के पत्तों के रस अथवा सरसों के स्वरस और शालि (जड़हन) के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "शिण्डाकी" कहते हैं। [१२] ❖ सन्थितैरिति शेषः ।।१२।। यहाँ पर "सन्थितैः" यह विशेषण ऊपर से लगाना चाहिये जिससे "सन्धान की रीति से जो तैयार होता है" यह अर्थ निकले। [१२] शिण्डाकी रोचनी गुर्वी पित्तश्लेष्मकरी स्मृता ।।१३।। शिण्डाकी-रोचक, गुरु एवम् पित्त तथा कफ को उत्पन्न करने वाली होती है। [१३] अथ शुक्तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च। यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।।१४।। शुक्तं कफघ्नं तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनं लघु। पाण्डुकृमिहरं रूक्षं भेदनं रक्तपित्तकृत् ।।१५।। शुक्त के लक्षण-कन्द, मूल तथा फल आदि तेल तथा नमक के सहित जिस द्रव पदार्थ में डुबोये जाकर सन्धान की रीति से बनाये जाते हैं उसे शुक्त कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

९३२ भावप्रकाशनिघण्टुः शुक्त-कफनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, रूक्ष, मलभेदक, रक्तपित्तकारक एवम् पाण्डु तथा कृमि को दूर करने वाला होता है। [१४-१५] अथासुतम् (संधान) । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलाढ्यं यत्तत्तु विज्ञेयमासुतम्। तद्रुच्यं पाचनं वातहरं लघु विशेषतः ।। १६ ।। कन्द, मूल तथा फल आदि से युक्त जो कांजी है उसे "आसुत" कहते हैं। आसुत-रुचिकारक, पाचक, वातनाशक तथा विशेष कर लघु होता है। [१६] अथ मद्यस्य नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह मद्यन्तु सीधुमैरेयमिरा च मदिरा सुरा। कादम्बरी वारुणी च हालाऽपि बलवल्लभा ।। १७ ।। पेयं यन्मादकं लोकैस्तन्मद्यमभिधीयते। यथाऽरिष्टं सुरा सीधुरासवाद्यमनेकधा ।। १८ ।। मद्यं सर्वं भवेदुष्णं पित्तकृद्वातनाशनम्। भेदनं शीघ्रपाकं च रूक्षं कफहरं परम् ।। १९ ।। अम्लं च दीपनं रुच्यं पाचनं चाशुकारि च। तीक्ष्णं सूक्ष्मं च विशदं व्यवायि च विकाशि च ।। २० ।। मद्य के संस्कृत नाम-मद्य, सीधु, मैरेय, हरा, मदिरा, सुरा, कादम्बरी, वारुणी, हाला तथा हलवल्लभा ये सब हैं। लक्षण-नशा लाने वाला, पीने योग्य जो द्रव्य है उसे लोग "मद्य" कहते हैं। भेद-मद्य के अरिष्ट, सुरा सीधु तथा आसव आदि अनेक प्रकार हैं। सभी प्रकार के मद्य-उष्ण, पित्तकारक, वातनाशक, मलभेदक, शीघ्र पचने वाले, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक, अम्ल रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, पाचक, एवम् शीघ्रकारिता, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, विशद, व्यवायि तथा विकाशि गुणों से युक्त होते हैं। [१७-२०] अथारिष्टस्य लक्षणं गुणाँश्चाह पक्वौषधाम्बुसिद्धं यन्मद्यं तत्स्यादरिष्टकम् ।। २१ ।। अरिष्ट के लक्षण-पकाई हुई औषध तथा जल से सिद्ध किया हुआ जो मद्य होता है उसे "अरिष्ट" कहते हैं। [२१] ❖ अरिष्टं = मद्यमिति लोके। यथा-द्राक्षारिष्टं, दशमूलारिष्टम्, बब्बूलारिष्ट-मिति ।। २१ ।। यहाँ पर "अरिष्ट" पद से लोक में प्रसिद्ध "मद्य" का ग्रहण करना चाहिये। जैसे- द्राक्षारिष्ट (दाख का अरिष्ट), दशमूलारिष्ट, बब्बूलारिष्ट इत्यादि। [२१] अरिष्ट लघुपाकेन सर्वतश्च गुणाधिकम्। अरिष्टसूरू गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २२ ।। अरिष्ट-पाक में लघु होता है एवम् सबसे अधिक गुणकारी होता है। और अरिष्ट के गुण जिन द्रव्यों का वह बनाया जाता है उसके समान होते हैं। [२२] अथ सुराया लक्षणं गुणाँश्चाह शालिषष्टिकपिष्टादिकृतं मद्यं सुरा स्मृता। सुरा गुर्वी बलस्तन्यपुष्टिमेदःकफप्रदा। ग्राहिणी शोथगुल्मार्शोग्रहणीमूत्रकृच्छ्रनुत् ।। २३ ।। सुरा के लक्षण-शालि (जड़हन) तथा साठी के चावलों के चूर्ण आदि से जो मद्य तैयार किया जाता है उसे "सुरा" कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

सन्धानवर्गः ९३३ सुरा-गुरु, ग्राही तथा बल, स्तनों में दूध की वृद्धि, शरीर की पुष्टि, मेद तथा कफ को करने वाला एवम् शोथ, गुल्म, अर्श (बवासीर), ग्रहणी तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करने वाला होता है। [२३] अथ सुराभेदस्य वारुण्या लक्षणगुणानाह पुनर्नवाशालिपिष्टिविहिता वारुणी स्मृता। संधितैस्तालखर्जूररसैर्या साऽपि वारुणी। सुरावद्वारुणी लघ्वी पीनसाध्मानशूलनुत् ।। २४ ।। सुरा का भेद वारुणी के लक्षण-पुनर्नवा तथा शालि के चावलों के चूर्ण से जो सुरा बनाई जाती है उसे "वारुणी" कहते हैं। और ताल तथा खजूर के रस को सन्धान की रीति से रखने पर जो तैयार होता है उसे भी "वारुणी" कहते हैं। वारुणी-गुणों में यद्यपि सुरा के समान ही होती है तथापि यह उसकी अपेक्षा लघु एवम् पीनस, आध्मान (अफरा) तथा शूल को दूर करने वाली होती है। [२४] त्तसुरातो भेदार्थं लघ्वीति ।। २४ ।। यहाँ पर "लघ्वी" इस पद से "सुरा" से इसका (वारुणी का) भेद दिखलाते हैं। अर्थात् "सुरा" गुरु होती है और "वारुणी" लघु होती है यह समझना चाहिये। [२४] अथ द्विविधसीधोर्लक्षणगुणानाह इक्षोः पकै रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च सः। आमैस्तैरेव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ।। २५ ।। सीधुः पक्वरसः श्रेष्ठः स्वराग्निबलवर्णकृत्। वातपित्तकरः सद्यः स्नेहनो रोचनो हरेत् ।। २६ ।। विबन्धमेदःशोफार्शःशोफोदरकफामयान् । तस्मादल्पगुणः शीतरसः संलेखनः स्मृतः ।। २७ ।। दो प्रकार के सीधु के लक्षण-ईख के पके हुये रस से जो मद्य तैयार होता है वह "पक्वरस सीधु" कहलाता है। और जो ईख के कच्चे रस से तैयार होता है वह "शीतरस सीधु" कहलाता है। पक्वरस सीधु-श्रेष्ठ, स्वर तथा वर्ण को उत्तम करने वाला, अग्नि तथा बलकारक, वात तथा पित्त को करने वाला, तत्काल स्नेहन करने वाला, रोचक एवं विबन्ध, मेद, शोथ, बवासीर, उदर का शोथ तथा कफ सम्बन्धी विकारों को नष्ट करने वाला होता है। शीतरस सीधु-यह पक्वरस सीधु की अपेक्षा अल्प गुणकारी तथा अधिक लेखन गुण विशिष्ट होता है। [२५-२७] अथासवस्य लक्षणं गुणाँश्चाह यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः ।। २८ ।। आसव के लक्षण-बिना पकाये हुये औषध तथा जल से जो मद्य बनाया जाता है वह "आसव" कहलाता है। [२८] ❖ यथा-लोहासवादिः ।। २८ ।। जैसे-"लोहासव" आदि बनता है इतना यहाँ पर और समझना चाहिये। [२८] आसवस्य गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २९ ।। आसव-इसके गुण बीजद्रव्यों (जिन द्रव्यों से आसव बनाया जाता है उसे "बीजद्रव्य" समझना चाहिये) के गुणों के समान होते हैं। [२९]

९३४ भावप्रकाशनिघण्टुः

अथ नवपुराणमदिरागुणानाह

मद्यं नवमभिष्यन्दि त्रिदोषजनकं सरम्। अहृद्यं बृंहणं दाहि दुर्गन्धं विशदं गुरु।।३०।। जीर्णं तदेव रोचिष्णु क्रिमिश्लेष्मानिलापहम्। हृद्यंसुगन्धिगुणवल्लघु स्रोतोविशोधनम्।।३१।। **नई मदिरा—**अभिष्यन्दी, त्रिदोषजनक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, बृंहण, दाह उत्पन्न करने वाली, दुर्गन्ध तथा विशद गुण युक्त एवम् गुरु होती है। **पुरानी मदिरा—**रुचि को उत्पन्न करने वाली, हृदय के लिये हितकर, सुगन्ध युक्त, गुणकारक, लघु, स्रोतोमार्ग का शोधन करने वाली एवम् क्रिमि, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है। [३०-३१]

अथ सात्त्विकादिमनुष्याणां मद्येन जाताश्चेष्टा आह

सात्त्विके गीतहास्यादि राजसे साहसादिकम्। तामसे निन्द्यकर्माणि निन्द्राञ्च मदिराऽऽचरेत् ।।३२।। सात्त्विकादि मनुष्यों की मद्य से उत्पन्न हुई चेष्टायें—मदिरा सात्त्विक (सत्त्वगुणी) मनुष्यों में पीने से गाना तथा हँसना आदि कार्यों को कराने लगती है—राजस (रजोगुणी) मनुष्यों में साहस आदि कार्यों को, तामस (तमोगुणी) मनुष्यों में निन्द्यकर्म तथा निद्रा को कराती है। [३२] ❖ आचरेत् = कुर्यात् ।।३२।। यहाँ पर "आचरेत्" पद से "कराने लगती है" यह भावार्थ समझना चाहिये। [३२]

अथ मद्यपानप्रकारमाह

विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम्। प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ।।३३।। किन्तु मद्यंस्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्। अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ।।३४।। **मद्य पीने का प्रकार—**जो मनुष्य प्रसन्न होता हुआ, हितकारक अन्नों के साथ, बलानुसार यथासमय, विधिपूर्वक, मात्रा के साथ मद्य पीता है, तो उसे वह (मद्य) अमृत के समान गुणकारी होता है। क्योंकि—मद्य का स्वभाव जिस प्रकार अन्न का है ठीक वैसा ही है, जैसे अन्न—अविधिपूर्वक सेवन करने से रोग उत्पन्न करने वाला होता है और विधिपूर्वक सेवन करने से अमृत के समान गुणकारी होता है वैसे ही मद्य को भी समझना चाहिये। [३३-३४]

अथ मद्यगन्धस्य दूरीकरणोपायमाह

मुस्तैलवालुगदजीरकधान्यकैला यश्चर्वयन्सदसि वाचमभिव्यनक्ति। स्वाभाविकं मुखजमुज्झति पूतिगन्धं—गन्धञ्च मद्यलशुनादि भवञ्च नूनम् ।।३५।। **मद्य के गन्ध को दूर करने का उपाय—**नागरमोथा, कूठ, एलवालु जीरा, धनिया और इलायची इन सबको चबाता हुआ जो मद्य पीने वाला मनुष्य सभा के मध्य में बातचीत करता है, उसके मुख की स्वाभाविक दुर्गन्ध तथा मद्य एवम् लहशुन आदि से उत्पन्न गन्ध निश्चय दूर हो जाती है। [३५] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे सन्धानवर्गः समाप्तः।