भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 953

९०२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कैदारजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह केदारः क्षेत्रमुद्दिष्टं कैदारं तज्जलं स्मृतम्। कैदारं वार्यभिष्यन्दि मधुरं गुरु दोषकृत् ।।५७।। कैदार जल के लक्षण-केदार-यह शब्द क्षेत्र (खेत) का पर्यायवाची है, अतः इसके जल को कैदार जल कहते हैं। कैदार जल-अभिष्यन्दी, मधुर रस युक्त, गुरु तथा वातादिदोष कारक होता है। [५७] अथ वृष्टिजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह वार्षिकं तदहर्वृष्टं भूमिस्थमहितं जलम्। त्रिरात्रमुषितं तत्तु प्रसन्नममृतोपमम् ।।५८।। वृष्टि जल (वर्षा के जल) के लक्षण-तत्काल वर्षा होकर जो जल पृथ्वी पर जमा रहता है उसे वार्षिक जल (वृष्टि का जल) कहते हैं, यह अहितकारक होता है। किन्तु यही ३ रात्रि के बाद मिट्टी बैठ जाने से यदि स्वच्छ हो तो अमृत के समान गुणकारी होता है। [५८] अथ हेमन्तादिकालविशेषे विहितं जलविशेषमाह हेमन्ते सारसं तोयं ताडागं वा हितं स्मृतम्। हेमन्ते विहितं तोयं शिशिरेऽपि प्रशस्यते ।।५९।। वसन्तग्रीष्मयोः कौपं वाप्यं वा नैर्झरं जलम्। नादेयं वारि नादेयं वसन्तग्रीष्मयोर्बुधैः ।।६०।। विषवद्गङ्गनवृक्षाणां पत्राद्यैर्दूषितं यतः। औद्भिदं वाऽऽन्तरिक्षं वा कौपं वा प्रावृषि स्मृतम्। शस्तं शरदि नादेयं नीरमंशूदकं परम् ।।६१।। हेमन्तादि काल विशेष में जलविशेष का विधान-हेमन्त (अगहन-पूस) ऋतु में सरोवर या तालाब का जल विशेष हितकर होता है और जो जल हेमन्त में हितकर कहा गया है वही (सरोवर या तालाब का जल) शिशिर (माघ- फाल्गुन) में भी उत्तम होता है। वसन्त (चैत-वैशाख) तथा ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) ऋतु में कूँआँ, बावड़ी या झरना का जल उत्तम होता है। वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में नदी का जल पीने के लिये बुद्धिमान् व्यक्ति को कभी नहीं लेना चाहिये, क्योंकि उस समय वह (नदी का जल) जंगली वृक्षों के पत्ते के पड़ने से दूषित होकर विषैला हो जाता है। औद्भिद, आकाश से उत्तम भूमि पर गिरा हुआ या कूँएँ का जल वर्षा ऋतु में उत्तम होता है। शरद (क्वार-कार्तिक) ऋतु में नदी का अथवा अंशूदक संज्ञक जल अति हितकर होता है। [५९-६१] अथांशूदकजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह दिवा रविकरैर्जुष्टं निशि शीतकरांशुभिः। ज्ञेयमंशूदकं नाम स्निग्धं दोषत्रयापहम् ।।६२।। अनभिष्यन्दि निर्दोषमान्तरिक्षजलोपमम्। बल्यं रसायनं मेध्यं शीतं लघु सुधासमम् ।।६३।। अंशूदक जल के लक्षण-जिस जल के ऊपर दिन में सूर्य की किरणें और रात में चन्द्रमा की किरणें पड़ी हों उसे "अंशूदक" कहते हैं। अंशूदक-स्निग्ध गुणयुक्त, त्रिदोषनाशक, अनभिष्यन्दी (अभिष्यन्दी नहीं), निर्दोष, आंतरिक्ष जल के समान, बलकारक, रसायन, मेधा के लिये हितकर, शीतल, लघु तथा अमृत के समान होता है। [६२-६३] ❖ रविकरैर्जुष्टमित्युक्ते दिवापदं समस्तदिवसप्राप्त्यर्थं, शीतकरांशुभिर्जुष्टमित्युक्ते निशीतिपदं समस्तरात्रिप्राप्त्यर्थम् ।।६२।। यहां पर "रविकरैर्जुष्टम्" ऐसा कहने पर पुनः "दिवा" पद का उल्लेख करने से "सारा दिन सूर्य की किरणें पड़ी हों" तथा "शीतकरांशुभिर्जुष्टम्" ऐसा कहने पर पुनः "निशा" पद का उल्लेख करने से "सारी रात चन्द्रमा की किरणें पड़ी हों" ऐसा अर्थ समझना चाहिए। [६२-६३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA