भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवारिवर्गः ९०१ कौप जल के लक्षण—जो गड्डा थोड़े विस्तार का अर्थात् कम चौड़ा मण्डलाकार (गोलाकार मुँह वाला), गहरा होता है एवम् वह चाहे ईंटे आदि से बँधा हो या न बँधा हो तो उसे कूप अर्थात् कूआँ कहते हैं। और उसी के जल को “कौप जल” कहते हैं। कौपजल (कूयें का जल)—यदि स्वादिष्ट हो तो त्रिदोषनाशक, हितकारी तथा लघु होता है और यदि खारा हो तो कफ तथा वात नाशक, अग्निदीपक और अत्यन्त पित्तकारक होता है। [४८-४९] अथ चौञ्ज्यजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह शिलाकीर्णं स्वयं श्वभ्रं नीलाञ्जनसमोदकम्। लतावितानसंच्छन्नं चौञ्ज्यमित्यभिधीयते ।।५०।। अश्मादिभिरबद्धं यत्तच्चौञ्ज्यमिति वा परे। यत्रत्यमुदकं चौञ्ज्यं मुनिभिस्तदुदाहृतम् ।।५१।। चौञ्ज्यं वह्निकरं नीरं रूक्षं कफहरं लघु। मधुरं पित्तनुद्रुच्यं पाचनं विशदं स्मृतम् ।।५२।। चौञ्ज्य जल के लक्षण—जो गड्डा अपने आप हो गया हो और जिसमें पत्थर के टुकड़े हों एवं जल नीले अञ्जन के समान हो तथा लताओं के विस्तार से ढका हो तो उसे संस्कृत में चौञ्ज्य (चोंड़ा) कहते हैं। अन्य आचार्यों का मत है कि जो गड्डा पत्थर आदि से न बाँधा हुआ हो उसे चौञ्ज्य कहते हैं। और इसके जल को मुनि लोग “चौञ्ज्य जल” कहते हैं। चौञ्ज्यजल—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक, लघु, मधुर रस युक्त, पित्तनाशक, रोचक, पाचक तथा विशद गुण युक्त होता है। [५०-५२] अथ पाल्वलजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अल्पं सरः पल्वलं स्याद्यत्र चन्द्रर्क्षगे रवौ ।।५३।। न तिष्ठति जलं किञ्चित्तत्रत्यं वारि पाल्वलम्। पाल्वलं वार्यभिष्यन्दि गुरु स्वादु त्रिदोषकृत् ।।५४।। पाल्वलं जल के लक्षण—सूर्य जब चन्द्रमा के नक्षत्र पर हों तब जिसमें कुछ भी जल न रहता हो ऐसे छोटे- छोटे तलैया को पल्वल कहते हैं और इसके जल को पाल्वल जल कहते हैं। पाल्वल जल—अभिष्यन्दी, गुरु, स्वादिष्ट तथा त्रिदोषकारक होता है। [५३-५४] ❖ रवौ = सूर्ये, चन्द्रर्क्षगे = कर्कटराशिस्थे, श्रावणे मासीति यावत्। अत्र चन्द्रर्क्षं मृगशिरस्तत्रग इति मुख्यार्थः ।।५३-५४।। यहाँ पर “रवि” से सूर्य, तथा “चन्द्रर्क्षग” पद से—“चन्द्र की राशि कर्क में स्थित अर्थात् श्रावण मास में—” यह अर्थ समझना चाहिये, किन्तु वस्तुतः यह अर्थ नहीं हो सकता क्योंकि श्रावण वर्षा ऋतु में सर्वत्र वर्षा का जल रहता ही है। अतः उक्त पद का चन्द्र नक्षत्र मृगशिर पर स्थित अर्थात् वृष राशि पर स्थित अर्थ समझना चाहिये जो ज्येष्ठ मास में पड़ता है—उस समय जिसमें जल न ठहरता हो यह अर्थ युक्तियुक्त है। [५३-५४] अथ विकिरजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्यादिनिकटे भूमियां भवेद्वालुकामयी। उद्भाव्यते ततो यत्तु तज्जलं विकिरं विदुः ।।५५।। विकिरं शीतलं स्वच्छं निर्दोषं लघु च स्मृतम्। तुवरं स्वादु पित्तघ्नं क्षारं तत्पित्तलं मनाक् ।।५६।। विकिर जल के लक्षण—नदी आदि के निकट जो बालुकामय भूमि हो वहाँ पर जो जल खन कर निकाला जाता है उसे विकिर-जल कहते हैं। विकिर जल—शीतल, स्वच्छ, निर्दोष, लघु, कषाय तथा मधुररसयुक्त एवम् पित्तनाशक होता है। यदि वही जल खारा हो तो किञ्चित् पित्तकारक होता है। [५५-५६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA