भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० भावप्रकाशनिघण्टुः औद्भिद जल-पित्तनाशक, अविदाही, अतिशीतल, तृप्तिकारक, मधुररसयुक्त, बलकारक, एवम् किञ्चित् वातकारक तथा लघु होता है। [३८-३९] अथ नैर्झरजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह शैलसानुस्रवद्वारिप्रवाहो निर्झरो झरः। स तु प्रस्रवणश्चापि तत्रत्यं नैर्झरं जलम् ।।४०।। नैर्झरं रुचिकृत्तीव्रं कफघ्नं दीपनं लघु। मधुरं कटुपाकं च वातलं स्यादपित्तलम् ।।४१।। नैर्झर जल के लक्षण-पर्वत के शिखर से गिरते हुये जल के प्रवाह को संस्कृत में निर्झर, झर तथा प्रस्रवण (हिन्दी में झरना) कहते हैं। एवम् उसी के जल को नैर्झर जल (झरने का जल) कहते हैं। नैर्झर जल-रुचिकारक, कफनाशक, अग्निदीपक, लघु, मधुर रसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, वातकारक तथा ईषत् पित्तकारक (पाठान्तर में पित्तकारक) होता है। [४०-४१] अथ सारसजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्याः शैलादिरुद्धाया यत्र संस्रुत्य तिष्ठति। तत्सरो जलजच्छन्नं तदम्भः सारसं स्मृतम् ।।४२।। सारसं सलिलं बल्यं तृष्णाघ्नं मधुरं लघु। रोचनं तुवरं रूक्षं बद्धमूत्रमलं स्मृतम् ।।४३।। सारस जल के लक्षण-नदी का जल जहाँ पर पर्वत आदि से रोके जाने पर झर-झर के संचित होता जाता है और कमल के पत्तों से जहाँ पर ढका रहता है उस संचित जल युक्त प्रदेश को सर कहते हैं तथा उसके जल को सारस जल कहते हैं। सारस जल-बलकारक, प्यास को शान्त करने वाला, मधुर तथा कषाय रस युक्त, लघु, रोचक, रूक्ष, मूत्र तथा मल का विबन्ध करने वाला होता है। [४२-४३] अथ ताडागजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह प्रशस्तभूमिभागस्थो बहुसंवत्सरोषितः। जलाशयस्तडागः स्यात्ताडागं तज्जलं स्मृतम् ।।४४।। ताडागमुदकं स्वादु कषायं कटुपाकि च। वातलं बद्धविण्मूत्रमसृक्पित्तकफापहम् ।।४५।। ताडाग जल के लक्षण-प्रशस्त (उत्तम) भूमि का जो भाग है उस पर स्थित अनेक वर्षों का पुराना जो जलाशय है उसे "तड़ाग" कहते हैं। और तत्सम्बन्धी जल को "ताडाग जल" कहते हैं। ताडाग जल (तालाब का जल)-स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, वात-जनक, मल मूत्र का विबन्ध करने वाला एवम् रक्तपित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [४४-४५] अथ वाप्य जलस्य लक्षणं क्षारमिष्टयोस्तयोर्गुणाँश्चाह पाषाणैरिष्टकाभिर्वा बद्धः कूपो बृहत्तरः। ससोपानो भवेद्वापी तज्जलं वाप्यमुच्यते ।।४६।। वाप्यं वारि यदि क्षारं पित्तकृत्कफवातहृत्। तदेव मिष्टं कफकृद्वातपित्तहरं भवेत् ।।४७।। वाप्य जल के लक्षण-जो कूआँ पत्थर तथा ईंटों से बँधा हुआ हो तथा बहुत बड़ा हो और जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हों तो उसे वापी (बावड़ी) कहते हैं और उसके जल को "वाप्य जल" कहते हैं। वाप्य जल (बावड़ी का जल)-यदि खारा हो तो पित्तकारक एवम् कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है और यदि वही (जल) मीठा हो तो कफकारक एवम् वात तथा पित्त नाशक होता है। [४६-४७] अथ कौपजलस्य लक्षणं स्वादुक्षारयोस्तयोर्गुणाँश्चाह भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः सकूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ।।४८।। कौपं पयो यदि स्वादु त्रिदोषघ्नं हितं लघु। तत्क्षारं कफवातघ्नं दीपनं पित्तकृत्परम् ।।४९।।