भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवारिवर्गः ८९९ जांगल जल-रूक्ष, लवणरसयुक्त, लघु, पित्तनाशक, अग्निवर्धक, कफनाशक, पथ्य एवम् अनेक प्रकार के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। आनूप जल-रूक्ष, लवणरसयुक्त, लघु, पित्तनाशक, अग्निवर्धक, कफनाशक, पथ्य एवम् अनेक प्रकार के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। साधारण जल-मधुररसयुक्त, अग्निदीपक, शीतल, लघु, तृप्तिकारक, रोचक एवम् प्यास, दाह तथा त्रिदोष को दूर करने वाला होता है। [२६-३१] अथ भौमानामेव नादेयादीनां लक्षणानि गुणांश्च। तत्र नादेयस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्या नदस्य वा नीरं नादेयमिति कीर्त्तितम् ।।३२।। नादेयमुदकं रूक्षं वातलं लघु दीपनम्। अनभिष्यन्दि विशदं कटुकं कफपित्तनुत् ।।३३।। भौम जल के अन्य प्रकार से नादेयादि भेदों के लक्षण तथा गुण क्रम से ये हैं। नादेय के लक्षण-नदी या नद के जल को "नादेय" कहते हैं। नादेय जल-रूक्ष, वातजनक, लघु, अग्निदीपक, ईषत् अभिष्यन्दी, विशद गुण युक्त, कटु रस युक्त एवम्-कफ तथा पित्त को दूर करने वाला होता है। [३२-३३] अथ शीघ्रवहत्वादिविभेदेन च नादेयजलानां गुणभेदानाह नद्यः शीघ्रवहा लघ्व्यः सर्वा याश्चामलोदकाः । गुर्व्यः शैवलसंछन्ना मन्दगाः कलुषाश्च याः ।।३४।। हिमवत्प्रभवाः पथ्या नद्योऽश्माहतपाथसः । गङ्गाशतद्रूसरयूयमुनाऽऽद्या गुणोत्तमाः ।।३५।। सह्यशैलभवा नद्यो वेणागोदावरीमुखाः । कुर्वन्ति प्रायशः कुष्ठमीषद्वातकफावहाः ।।३६।। शीघ्र तथा मन्द गति से बहने के भेद से एवम्-देश भेद से नदियों के जलों में जो गुणभेद होते हैं वे ये हैं- शीघ्रगति से बहने वाली-ऐसी जितनी नदियाँ होती हैं उन सबों का जल लघु तथा स्वच्छ होता है। मन्द गति से बहने वाली या सेवार से ढके हुए जल वाली किंवा मलिन जल वाली-ऐसी जो नदियाँ हैं उन सबों का जल गुरू होता है। हिमालय से निकल कर बहने वाली या पत्थरों से टक्कर खानेवाली-ऐसी जो गङ्गा, शतद्रू (सतलज), सरयू तथा यमुना आदि नदियाँ हैं उनका जल पथ्य एवम् गुणों में उत्तम होता है। सह्यपर्वत से निकल कर बहने वाली-ऐसी जो वेणा तथा गोदावरी आदि नदियाँ हैं उन सबों का जल प्रायः करके कुष्ठ रोग उत्पन्न करने वाला एवम् किञ्चित् वात तथा कफ कारक होता है। [३४-३६] परिभाषा नदीसरस्तडागस्थे कूपप्रस्रवणादिजे । उदके देशभेदेन गुणान्दोषांश्च लक्षयेत् ।।३७।। परिभाषा-नदी, सरोवर, तालाब, कुआँ तथा झरना आदि ये सब जैसे जांगल आदि देशों में स्थित हों उनके अनुसार इनके जलों के गुण तथा दोष समझने चाहिये। [३७] अथौद्भिदजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह विदार्य भूमिं निम्नां यन्महत्या धारया स्रावेत् । तत्तोयमौद्भिदं नाम वदन्तीति महर्षयः ।।३८।। औद्भिदं वारि पित्तघ्नमविदाह्यतिशीतलम् । प्रीणनं मधुरं बल्यमीषद्वातकरं लघु ।।३९।। औद्भिद जल के लक्षण-नीची जमीन को फोड़कर जो बड़ी धारा से निकल कर बहे उस जल को महर्षि लोग औद्भिदसंज्ञक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA