भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 949

८९८ भावप्रकाशनिघण्टुः हैम (हिम सम्बन्धी) जल के लक्षण—हिमालय के शिखर आदि स्थानों से द्रवीभूत होकर (पिघल कर) जो हिम (बर्फ) बरसता है अर्थात् आकाश से वायु द्वारा उड़-उड़ कर इधर-उधर गिरता है उसी को हिम कहते हैं और उसके सम्बन्धी जल को पण्डित लोग संस्कृत में “हैमजल” कहते हैं। हिम सम्बन्धी जल—शीतल, पित्तनाशक, गुरु एवम् वायु को बढ़ाने वाला होता है। [२२] हैमं जलम् = कुहेसजलम् ।।२२।। यहाँ पर “हैम जल” से लोक प्रसिद्ध “कुहेसा का जल” यह अर्थ समझना चाहिये। [२२] अन्ये तु और्वानलधूमेरितमम्बु समुद्रस्य यद्धनीभूतम् । पवनानीतमुदीच्यां तद्धिममिति कथ्यते सद्भिः ।।२३।। अन्य आचार्य लोग तो यह कहते है कि—वडवानल के धूयें से प्रेरित होकर जो समुद्र का जल वायु द्वारा उत्तर दिशा में पहुँचाये जाने पर घनभाव को प्राप्त हो जाता है उसे पण्डित लोग हिम कहते हैं। [२३] ❖ हिमं = “कुहेसा” इति लोके ।।२३।। यहाँ पर मूल में “हिम” पद का लोक प्रसिद्ध “कुहेसा” अर्थ समझना चाहिये। [२३] हिमन्तु शीतलं रूक्षं दारुणं सूक्ष्ममित्यपि । न तद् दूषयते वातं न च पित्तं न वा कफम् ।।२४।। हिम—शीतल तथा रूक्ष होता है एवम् दारुण (कठिन) तथा सूक्ष्म भी होता है और यह न तो पित्त न वात और न कफ किसी को भी दूषित करता है। [२४] अथ भौमजलस्य भेदानाह भौममम्भो निगदितं प्रथमं त्रिविधं बुधैः । जाङ्गलं परमानूपं ततः साधारणं क्रमात् ।।२५।। भौम (भूमि सम्बन्धी) जल के भेद—विद्वानों ने भौम जल को प्रथम-जाङ्गल, आनूप और साधारण इन भेदों से तीन प्रकार का माना है। इनके लक्षण तथा गुण क्रम से आगे कहते हैं। [२५] अथ भौमभेदस्य जाङ्गलादिजलत्रयस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अल्पोदकोऽल्पवृक्षश्च पित्तरक्तामयान्वितः । ज्ञातव्यो जाङ्गलो देशस्तत्रत्यं जाङ्गलं जलम् ।।२६।। वह्वम्बुर्बहुवृक्षश्च वातश्लेष्मामयान्वितः । देशोऽनूप इति ख्यात आनूपं तद्भवं जलम् ।।२७।। मिश्रचिह्नस्तु यो देशः सहि साधारणः स्मृतः । तस्मिन्देशे यदुदकं तत्तु साधारणं स्मृतम् ।।२८।। जाङ्गलं सलिलं रूक्षं लवणं लघु पित्तनुत् । वह्निकृत्कफहत्पथ्यं विकारान्हर्ते बहून ।।२९।। आनूपं वार्यभिष्यन्दि स्वादु स्निग्धं घनं गुरु । वह्निहृत्कफकृद्दह्यं विकारान्कुरुते बहून ।।३०।। साधारणं तु मधुरं दीपनं शीतलं लघु । तर्पणं रोचनं तृष्णादाहदोषत्रयप्रणुत् ।।३१।। भौम जल के भेदों में जो जाङ्गल आदि जल के तीन भेद हैं उनके क्रम से प्रथम केवल लक्षण तत्पश्चात् क्रम से गुण ये हैं—जाङ्गल जल के लक्षण—जहाँ पर थोड़े जल तथा थोड़े वृक्ष होते हों और पित्त तथा रक्त सम्बन्धी विकार अधिक उत्पन्न होते हों उसे जाङ्गल देश तथा वहाँ के जल को जाङ्गल जल समझना चाहिये। आनूप जल के लक्षण—जहाँ पर अधिक रूप से जल तथा वृक्ष होते हों और वात तथा कफ सम्बन्धी रोग भी अधिक रूप से होते हों उसे अनूप देश तथा वहाँ के जल को आनूप जल समझना चाहिये । साधारण जल के लक्षण—जहाँ पर जांगल तथा अनूप दोनों देशों के चिह्न मिले हुये मिलते हों तो उसे साधारण देश तथा वहाँ के जल को साधारण जल समझना चाहिये।