भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ धाराजलस्य भेदानाह धाराजलं च द्विविधं गाङ्गसामुद्रभेदतः ॥९॥ धाराजल के भेद—गाङ्ग तथा सामुद्र इन भेदों से धाराजल दो प्रकार का होता है । [९] अथ गाङ्गसामुद्रयोर्जलयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह आकाशगङ्गासम्बन्धिजलमादाय दिग्गजाः । मेघैरन्तरिता वृष्टिं कुर्वन्तीति वचः सताम् ॥१०॥ गाङ्गमाश्वयुजे मासि प्रायो वर्षति वारिदः । सर्वथा तज्जलं ज्ञेयं तथव चरके वचः ॥११॥ स्थापिते हेमजे पात्रे राजते मृण्मयेऽपि वा । शाल्यन्नं येन संसिक्तं भवेदक्लेदि वर्णवत् ॥१२॥ तद्गाङ्गं सर्वदोषघ्नं ज्ञेयं सामुद्रमन्यथा । तत्तु सक्षारलवणं शुक्रदृष्टिवलापहम् ॥१३॥ विस्रञ्च दोषलं तीक्ष्णं सर्वकर्मसु नो हितम् । सामुद्रं त्वाश्विने मासि गुणैर्गाङ्गवदादिशेत् ॥१४॥ गाङ्गजल के लक्षण—सत्पुरुषों का यह कथन है कि—दिग्गज लोग आकाश गङ्गा का जल लेकर मेघों के द्वारा छिपे हुये होकर बरसाते हैं । प्रायः करके मेघ आश्विन (क्वार) मास में जो जल बरसाता है उसे सर्वथा (निश्चित रूप से) उक्त गाङ्गाजल ही समझना चाहिये । चरक में भी इसके विषय में वचन मिलता है कि—सोना-चाँदी अथवा मिट्टी के बर्तन में रखते हुए जिस धारा जल में भिगोया हुआ शालि धान्य का चावल क्लिन्न तथा विवर्ण न हो जाय अर्थात् जैसा का तैसा बना रह जाय तो उसे सम्पूर्ण दोषों को नष्ट करने वाला गाङ्गसंज्ञक धाराजल समझना चाहिये । सामुद्रसंज्ञक धाराजल के लक्षण—यदि उक्त क्रम से भिगोया हुआ चावल अन्यथा अर्थात् क्लिन्न तथा विवर्ण हो जाय (फूल जाने से रंग बदल जाय) तो उसे सामुद्र (धाराजल) समझना चाहिये । सामुद्र संज्ञक धाराजल—क्षार तथा लवण रस युक्त, शुक्र तथा दृष्टिशक्ति (या दृष्टि शक्ति और बल) नाशक, विस्र (दुर्गन्ध युक्त), दोषकारक तथा तीक्ष्ण होता है । एवम् यह सम्पूर्ण कार्यों में अहितकर होता है अर्थात् किसी भी कार्य में हितकर नहीं होता है । किन्तु यदि यही सामुद्रसंज्ञक धाराजल आश्विन मास का बरसा हुआ संगृहीत हो तो गुणों में गाङ्गाजल के तुल्य ही हितकर होता है ऐसा समझना चाहिये । [१०-१४] अथ शरदि वर्षासु च जलस्य निर्विषत्वे च हेतुमाह यतोऽगस्त्यस्य दिव्यर्षेरुदयात्सकलं जलम् । निर्मलं निर्विषं स्वादु शुक्रलं स्याददोषलम् ॥१५॥ शरत् तथा वर्षा ऋतु में क्रम से जल के निर्विष तथा सविष होने का कारण यह है कि—उस समय (आश्विन मास शरद् ऋतु में) आकाश में अगस्त्य नामक तारा के उदय होने से सम्पूर्ण जल निर्मल, निर्विष, स्वादिष्ट तथा शुक्रजनक होता है, एवम् दोषजनक भी नहीं होता है । [१५] अत एवाह फूत्कारविषवातेन नागानां व्योमचारिणाम् । वर्षासु सविषं तोयं दिव्यमप्याश्विनं विना ॥१६॥ अतएव शास्त्र में कहा है कि—वर्षा ऋतु में आकाशचारी नागों (दिव्य-सर्पों) के फूत्कार (फुफकार) सम्बन्धी विषयुक्त वायु से दूषित हो जाने से दिव्य (आकाश-सम्बन्धी) जल विषयुक्त हो जाता है । किन्तु वही (दिव्यजल) आश्विन में विषयुक्त नहीं होता है । अतः आश्विन का जल सर्वोत्तम तथा ग्राह्य होता है । [१६] अथानार्त्तवजलस्य लक्षणं गुणानाह अनार्त्तवं प्रमुञ्चन्ति वारि वारिधरास्तु यत् । तत्रिदोषाय सर्वेषां देहिनां परिकीर्त्तितम् ॥१७॥