भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 987

९३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भ्रामरस्य लक्षणगुणानाह किञ्चित्सूक्ष्मैः प्रसिद्धेभ्यः षट्पदेभ्योऽलिभिश्चितं । निर्मलं स्फटिकाभं यत्तन्मधु भ्रामरं स्मृतं ।।९।। भ्रामरं रक्तपित्तघ्नं मूत्रजाड्यकरं गुरु । स्वादुपाकमभिष्यन्दि विशेषात्पिच्छिलं हिमम् ।।१०।। भ्रामरजातीय मधु के लक्षण-प्रसिद्ध, छ पैरों वाले भौंरों से कुछ छोटे भ्रमरों (भौरों) से संगृहीत, स्फटिक के समान निर्मल, जो मधु होता है उसे "भ्रामर" कहते हैं । भ्रामरजातीय मधु-रक्तपित्तनाशक, मूत्र में जड़ता उत्पन्न करने वाला, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त, अभिष्यन्दी, विशेष रूप से पिच्छिल और शीतवीर्य होता है । [९-१०] अथ क्षौद्रस्य लक्षणगुणानाह माक्षिकाः कपिलाः सूक्ष्माः क्षुद्राऽऽख्यास्तत्कृतं मधु । मुनिभिः क्षौद्रमित्युक्तंतद्वर्णात्कपिलं भवेत् ।। गुणैर्माक्षिकवत्क्षौद्रं विशेषान्मेहनाशनम् ।।११।। क्षौद्रजातीय मधु के लक्षण-कपिल वर्ग की सूक्ष्म जो "क्षुद्रा" नामक मधुमक्खियाँ होती हैं उनके द्वारा बनाये गये कपिल वर्ण के मधु को मुनियों ने "क्षौद्र" कहा है । क्षौद्रजातीय मधु-गुणों में पूर्वोक्त माक्षिक जातीय मधु के सदृश होता है और विशेष रूप से प्रमेहनाशक होता है।।[११] अथ पौत्तिकमधुनो लक्षणगुणानाह कृष्णा या मशकोपमा लघुतराः प्रायो महापीड़िका वृक्षाणां पृथुकोटरान्तरगताः पुष्पासव कुर्वते । तास्तज्ज्ञैरिह पुत्तिका निगदितास्ताभिः कृतं सर्पिषा तुल्यं यन्मधु तद्वनेचरजनैः संकीर्तितं पौत्तिकम् ।।१२।। पौत्तिकं मधु रूक्षोष्णं पित्तदाहास्त्रवातकृत् । विदाहि मेहकृच्छ्रघ्नं ग्रन्थ्यादिक्षतशोषि च ।।१३।। पौत्तिकजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके मच्छरों के समान अत्यन्त छोटी-छोटी काले रंग की, काटने से अत्यन्त पीड़ा पहुँचाने वाली, वृक्षों के कोटरों (खोढ़रों) में रहने वाली जो मधुमक्खियाँ होती है, जिन्हें उनके जानने वाले लोग "पुत्तिका" कहते हैं उनके द्वारा संगृहीत, घी के समान जो मधु होता है उसे जंगली कोल, भिल्लादि लोग "पौत्तिक" कहते हैं । पौत्तिकजातीय मधु-रूक्ष, उष्ण, पित्त-दाह-रक्तविकार तथा वात कारक, विदाही, प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करने वाला, एवम्-गाँठ आदि तथा क्षत (घाव) को सुखाने वाला होता है । [१२-१३] अथ छात्रमधुनो लक्षणं गुणाँश्चाह वरटाः कपिलाः पीताः प्रायो हिमवतो वने ।।१४।। कुर्वन्ति छत्रत्राकाकारं तज्जं छात्रं मधु स्मृतम् । छात्रं कपिलपीतं स्यात्पिच्छिलं शीतलं गुरु ।।१५।। स्वादुपाकं कृमिश्वित्ररक्तपित्तप्रमेहजित् । भ्रमतृण्मोहविषहत्तर्पणञ्च गुणाधिकम् ।।१६।। छात्रजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके हिमालय पर्वत के जंगलों में कपिल तथा पीत वर्ण की मधुमक्खियाँ छत्ते के आकार का घर बनाती हैं, अतएव उस छत्र से उत्पन्न हुये मधु को "छात्र" कहते हैं । छात्रजातीय मधु-कपिल तथा पीत वर्ण युक्त, पिच्छिल, शीतल, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त, तृप्तिदायक, अधिक गुणकारी एवम्-कृमि, श्वेत, कुष्ठ, रक्तपित्त, प्रमेह, भ्रम, तृषा, मोह तथा विष को दूर करने वाला होता । [१४-१६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA