भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 988, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंमधुवर्गः ९३७ अथार्घ्यस्य लक्षणगुणानाह मधूकवृक्षनिर्यासं जरत्कार्वाश्रमोद्भवम्। स्रवत्यार्घ्यं तदाख्यातं श्वेतकं मालवे पुनः ॥१७॥ तीक्ष्णतुण्डास्तु याः पीता मक्षिकाः षट्पदोपमाः । अध्यस्तास्तत्कृतं यत्तदार्घ्यमित्य परे जगुः ॥१८॥ आर्घ्यं मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम्। कषायं कटुकं पाके तिक्तञ्च बलपुष्टिकृत् ॥१९॥ आर्घ्यजातीय मधु के लक्षण– “जरत्कारु” ऋषि के आश्रम में उत्पन्न हुये, महुये के वृक्ष से जो गोंद स्रवता है, उसे “आर्घ्य” कहते हैं तथा मालवा देश में उसी को “श्वेतक” कहते हैं। किन्तु अन्य कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि—भौरों के समान आकारवाली, पीले रंग की तथा तीक्ष्ण मुखवाली जो मधुमक्खियाँ होती हैं, उन्हें “अर्घ्या” कहते हैं और उनसे संगृहीत मधु को “आर्घ्य” कहते हैं। आर्घ्यजातीय मधु–नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर और विशेष रूप से कफ तथा पित्त को दूर करने वाला, कषाय तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त एवम्-बल तथा पुष्टिकारक होता है। [१७-१९] अथौद्दालकमधुनो लक्षणगुणानाह प्रायो वल्मीकमध्यस्थाः कपिलाः स्वल्पकीटकाः । कुर्वन्ति कपिलं स्वल्पं तत्स्यादौद्दालकं मधु ॥२०॥ औद्दालकं रुचिकरं स्वर्यं कुष्ठविषापहम्। कषायमुष्णमम्लञ्च कटुपाकञ्च पित्तकृत् ॥२१॥ औद्दालकजातीय मधु के लक्षण–प्रायः करके वल्मीक (विमवट) के अन्दर रहने वाले, कपिल वर्ण के छोटे- छोटे कीड़े, जो कपिल वर्ण का थोड़ी मात्रा में मधु बनाते हैं उसी को “औद्दालक” कहते हैं। औद्दालकजातीय मधु–रुचिकारक, स्वर को उत्तम बनाने वाला, कषाय तथा अम्ल रस युक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त एवम् पित्तकारक होता है। [२०-२१] अथ दालमधुनो लक्षणगुणानाह संस्रुत्य पतितं पुष्पाद्यत्तु पत्रोपरि स्थितम्। मधुराम्लकषायञ्च तद्दालं मधु कीर्त्तितम् ॥२२॥ दालं मधु लघु प्रोक्तं दीपनीयं कफापहम्। कषायानुरसं रूक्षं रुच्यं छर्दिप्रमेहजित् ॥२३॥ अधिकं मधुरं स्निग्धं बृंहणं गुरु भारिकम् ॥२४॥ दालजातीय मधु के लक्षण–फूलों से टपक करके जो पुष्परस (मधु) पत्तों पर गिरता है और जो मधुर, अम्ल तथा कषाय रसयुक्त होता है उसे “दाल” कहते हैं। दालजातीय मधु–(पाक में) लघु, अग्निदीपक, कफनाशक, अधिक मधुररसयुक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, रूक्ष, रुचिकारक, स्निग्ध गुण युक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), तौल में गुरु एवम् वमन तथा प्रमेह को दूर करने वाला होता है। [२२-२४] ❖ लघु पाके । गुरु भारिकं, तुलितम् ॥ २२-२४॥ यहाँ पर मूल में “लघु” पद का “विपाक में लघु” ऐसा अर्थ समझना चाहिये। और “गुरु भारिकम्” इस पद का “तौल में गुरु” (भारी) यह अर्थ समझना चाहिये। अथ नवपुराणमधुगुणानाह नवं मधु भवेत्पुष्ट्यै नातिश्लेष्महरं सरम्। पुराणं ग्राहकं रूक्षं मेदोघ्नमतिलेखनम् ॥२५॥ नया मधु–पुष्टिकारक, कफ को अत्यन्त दूर करने वाला नहीं (किञ्चित् कफनाशक) तथा सारक होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA