भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 989, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें९३८ भावप्रकाशनिघण्टुः पुराना मधु-ग्राही, रूक्ष, अत्यन्त लेखन गुण विशिष्ट एवम् मेद को दूर करने वाला होता है। [२५] अथ परिभाषामाह मधुनः शर्करायाश्च गुडस्यापि विशेषतः। एकसंवत्सरे वृत्ते पुराणत्वं स्मृतं बुधैः ।।२६।। परिभाषा-मधु, शक्कर (चीनी) तथा गुड़ इन सबों को एक वर्ष बीत जाने पर पण्डित लोग पुराना कहते हैं। अर्थात्-एक वर्ष के अन्दर के ये सब नये और बाद एक वर्ष के पुराने कहलाते हैं। [२६] अथ शीतलोष्णमधुनोर्गुणदोषानाह विषपुष्पादपि रसं सविषा भ्रमरादयः। गृहीत्वा मधु कुर्वन्ति तच्छीतं गुणवन्मधु ।।२७।। विषान्वयात्तदुष्णान्तु द्रव्येणोष्णेन वा सह। उष्णार्त्तस्योष्णकाले च स्मृतं विषसमं मधु ।।२८।। शीतल तथा उष्ण मधु की क्रम से गुणकारिता और दोषकारिता-विषैले भौंरे आदि विष के फूलों से भी रस लेकर मधु बनाते हैं, अतएव शीतल मधु ही गुणकारी होता है। और विष के फूलों का सम्बन्ध होने से मधु यदि उष्ण या उष्ण द्रव्यों के साथ वा उष्ण काल में वा गर्मी से दुःखी रोगियों के लिये प्रयोग किया जाता हो तो विष के समान होता है। [२७-२८] अथ मधूच्छिष्टम् (मोम) तस्य नामगुणानाह मयनं तु मधूच्छिष्टं मधुशेषं च सिक्थकम्। मध्वाधारो मदनकं मधूषितमति स्मृतम् ।।२९।। मदनं मृदु सुस्निग्धं भूतघ्नं व्रणरोपणम्। भग्नसन्धानकृद्वातकुष्ठवीसर्परक्तजित् ।।३०।। मोम के संस्कृत नाम-मयन, मधूच्छिष्ट, मधुशेष, सिक्थक, मध्वाधार, मदनक तथा मधूषित ये सब हैं। मोम-मृदु गुण युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, भूतग्रहनाशक, व्रण का रोपण करने वाला, टूटे हुये अस्थियों को जोड़ने वाला एवम्-वात, कुष्ठ, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [२९-३०] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मधुवर्गः समाप्तः।