भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ इक्षुवर्गः तत्रादाविक्षोर्नामगुणानाह इक्षुर्दीर्घच्छदः प्रोक्तस्तथा भूरिरसोऽपि च। गुडमूलोऽसिपत्रश्च तथा मधुतृणः स्मृतः ॥१॥ ऊख के संस्कृत नाम—इक्षु, दीर्घच्छद, भूरिरस, गूढमूल, असिपत्र तथा मधुतृण ये सब हैं। सभी प्रकार की ईख—रक्तपित्तनाशक, बलकारक, वीर्यवर्धक, कफजनक, रस तथा विपाक में मधुर, स्निग्ध, गुरु, मूत्रकारक, एवम् शीतवीर्य होती हैं। [१-२] हिं०-ईख, गन्ना। अं०-Sugar Cane (सुगर केन)। ले०-Sacharum officinarium (सेक्केरम् ऑफिसिनेरम्) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) । इसकी खेती भारतवर्ष के सभी उष्ण प्रदेशों में की जाती है। भावप्रकाशकार इसके १३ भेदों का उल्लेख करते हैं। आजकल भी इसके अनेक कृषित प्रकार पाये जाते हैं। इसके काण्ड स्वरस, मूल स्वरस तथा शर्करा, राव आदि इक्षुविकारों का उपयोग किया जाता है। अनेक योगों को टिकाऊ बनाने के लिए शर्करा आदि का उपयोग करते हैं। इसमें शर्करा आदि के अतिरिक्त कैल्शियम ऑक्जेलेट भी पाया जाता है। यह मधुर, शीतल, मूत्रल, सारक, बल्य, कण्ठ्य, श्रमहर, शुक्रशोधक तथा वात एवं कफवर्धक है। इसका मूल शीतल, मूत्रल एवं वृष्य है। यह मधुर होते हुये भी शीतवीर्य होने से वातवर्धक होता है (सुश्रुत)। इसको मूत्रजनन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना गया है (चरक)। इसका उपयोग रक्तपित्त, गुल्म, उदर, कामला एवं पांडु आदि में भी किया जाता है। इसका बाह्य प्रयोग पित्ताभिष्यन्द में किया गया है। अथेक्षुभेदानाह पौण्ड्रको भीरुकश्चापि वंशकः शतपोरकः। कान्तारतापसेक्षुश्च काण्डेक्षुः सूचिपत्रकः।।३।। नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत्। मनोगुप्ता च इत्येता जातयस्तत्र कीर्तिताः ।।४।। ऊख के भेद—पौण्ड्रक, भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेक्षु, काण्डेक्षु, सूचिपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र, नीलपोर, कोशकृत् तथा मनोगुप्ता ये सब ऊखकी जातियाँ मानी गई है। [३-४] अथ श्वेतपौण्ड्रक-भीरुकेक्षुगुणानाह वातपित्तप्रशमनो मधुरो रसपाकयोः। सुशीतो बृंहणो बल्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ।।५।। पौण्ड्रक तथा भीरुक ये दोनों ईख—वात तथा पित्त को शमन करने वाला, रस तथा विपाक में मधुर, अत्यन्त शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) एवम् बलकारक होती हैं। [५] अथ कोशकारेक्षुः । तस्य गुणानाह कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ।।६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA