भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 991

९४० भावप्रकाशनिघण्टुः कोशकार नामक ईख—गुरु, शीतल एवम् रक्तपित्त तथा क्षय को नष्ट करने वाली होती है । [६] अथ कान्तारेक्षुगुणानाह कान्तारेक्षुर्गुरुर्वृष्यः श्लेष्मलो बृंहणः सरः ।।७।। कान्तार संज्ञक ईख—गुरु, वीर्यवर्धक, कफजनक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक) तथा सारक होती है । [७] अथ वंशकेक्षुगुणानाह दीर्घपोरः सुकठिनः सक्षारो वंशकः स्मृतः ।।८।। वंशक नामक ईख—लम्बे-लम्बे पोरों वाली, अत्यन्त कठिन तथा क्षारयुक्त होती है । [८] अथ शतपोरकेक्षुगुणानाह शतपर्वा भवेत्किञ्चित्कोशकारगुणान्वितः । विशेषात्किञ्चिदुष्णश्च सक्षारः पवनापहः ।।९।। शतपोरक संज्ञक ईख—औरों की अपेक्षा अधिक पोरोंवाली, किंचित् कोशकार संज्ञक ऊख के गुणों से युक्त, विशेष करके किंचित् उष्ण, क्षारयुक्त तथा वातनाशक होती है । [९] अथ तापसेक्षुगुणानाह तापसेक्षुर्भवेन्मृद्वी मधुरा श्लेष्मकोपनी । तर्पणी रुचिकृच्चापि वृष्या च बलकारिणी ।।१०।। तापसेक्षु संज्ञक ईख—कोमल, मधुर रसयुक्त, कफ को कुपित करने वाली, तृप्तिकारक, रुचि को उत्पन्न करने वाली, वीर्यवर्धक तथा बलकारक होती है । [१०] अथ काण्डेक्षुगुणानाह एवं गुणैस्तु काण्डेक्षुः स तु वातप्रकोपणः ।।११।। काण्डेक्षु नामक ईख—गुणों में यद्यपि "तापसेक्षु" के समान ही होती है तथापि यह वात को विशेष रूप से कुपित करने वाली होती है । [११] अथ सूचीपत्र-नीलपोर-नैपाल-दीर्घपत्राणां गुणानाह सूचीपत्रो नीलपोरो नैपालो दीर्घपत्रकः । वातलाः कफपित्तघ्नाः सकषाया विदाहिनः ।।१२।। सूचीपत्र, नीलपोर, नैपाल तथा दीर्घपत्रक संज्ञक ईख—वातजनक, कफ तथा पित्त नाशक, कषाय रसयुक्त तथा विदाही होती है । [१२] अथ मनोगुप्तेक्षुगुणानाह मनोगुप्ता वातहरी तृष्णाऽऽमयविनाशिनी । सुशीता मधुराऽतीव रक्तपित्तप्रणाशिनी ।।१३।। मनोगुप्ता संज्ञक ईख—वातनाशक, तृषा रोग को दूर करने वाली, अति शीतल, अत्यन्त मधुर एवम् रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है । [१३] अथ बाल-तरुण-वृद्धेक्षुगुणानाह बाल इक्षुः कफं कुर्य्यान्मेदोमेहकरश्च सः । युवा तु वातहृत् स्वादुरीषत्तीक्ष्णश्च पित्तनुत् ।। रक्तपित्तहरो वृद्धः क्षतहृद् बलवीर्यकृत् ।।१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA