भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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इक्षुवर्गः ९४१ बाल (कच्ची) अर्थात् थोड़े दिनों की ईख-कफकारक एवम् मेद तथा प्रमेह रोग को उत्पन्न करने वाली होती है। युवा (अधपकी) ईख-वातनाशक, स्वादिष्ट, किंचित् तीक्ष्ण एवम् पित्तनाशक होती है। वृद्ध (पकी) ईख-रक्तपित्त को दूर करने वाली, क्षतनाशक एवम् बल तथा वीर्य उत्पन्न करने वाली होती है।[१४] अथेक्षोरङ्गभेदेन गुणभेदानाह मूले तु मधुरोऽत्यर्थं मध्येऽपि मधुरः स्मृतः । अग्रे ग्रन्थिषु विज्ञेय इक्षुः पटुरसोजनैः ।।१५।। ईख के अङ्गभेद से गुणभेद-जड़ भाग में अत्यन्त मधुर रसयुक्त, मध्यभाग में मधुर रसयुक्त और अग्रभाग तथा गांठों में लवण रस युक्त ईख होता है, ऐसा लोगों को जानना चाहिये। [१५] अथ चूषितेक्षुगुणानाह दन्तनिष्पीडितस्येक्षो रसः पित्तास्रनाशनः । शर्करासमवीर्य स्यादविदाही कफप्रदः ।।१६।। दाँतों से चूसे हुये ईख का रस-पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, शक्कर के समान वीर्यवाला, अविदाही (किंचित् दाह करने वाला) एवं कफ उत्पन्न करने वाला होता है। [१६] अथ यान्त्रिकेक्षुरसगुणानाह मूलाग्रजन्तुग्रन्थादिपीडनान्मलसङ्गराद् । किञ्चित्कालविधृत्या च विकृतिं याति यान्त्रिकः ।। तस्माद्विदाही विष्टम्भी गुरुः स्याद्यान्त्रिको रसः ।।१७। कोल्हू में पिरे हुये ईख का रस-ईख का यह मूल, अग्रभाग, जन्तु एवम् गाँठ आदि के कोल्हू में पिरे जाने से तथा मैल के मिल जाने से और कुछ काल तक रखे रहने से विकृत (खराब) हो जाता है, अतएव वह विदाही, विष्टम्भजनक तथा गुरु होता है। [१७] अथ पर्युषितेक्षुरसगुणानाह रसः पर्युषितो नेष्टो ह्यम्लो वातापहो गुरुः । कफपित्तकरः शोषी भेदनश्चातिमूत्रलः ।।१८।। बासी ईख का रस-हितकर नहीं होता है और यह अम्ल रस युक्त, वातनाशक, गुरु, कफ तथा पित्त कारक, शोष उत्पन्न करने वाला, मलभेदक एवम् अत्यन्त मूत्रजनक होता है। [१८] अथ पक्वेक्षुरसगुणानाह पक्वो रसो गुरुः स्निग्धः सुतीक्ष्णः कफवातनुत् । गुल्मानाहप्रशमनः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ।।१९।। पकाया हुआ ईख का रस-रूक्ष, स्निग्ध, अत्यन्त तीक्ष्ण, कफ तथा वात नाशक, किंचित् पित्तकारक एवम् गुल्म तथा आनाह (अफारा) को दूर करने वाला होता है। [१९] अथेक्षुरसनिर्मितपदार्थगुणानाह इक्षोर्विकारास्तृड्दाहमूर्च्छापित्तास्रनाशनाः । गुरवो मधुरा बल्याः स्निग्धा वातहराः सराः ।। वृष्या मोहहराः शीता बृंहणा विषहारिणः ।।२०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA