भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ इक्षुवर्गः तत्रादाविक्षोर्नामगुणानाह इक्षुर्दीर्घच्छदः प्रोक्तस्तथा भूरिरसोऽपि च। गुडमूलोऽसिपत्रश्च तथा मधुतृणः स्मृतः ॥१॥ ऊख के संस्कृत नाम—इक्षु, दीर्घच्छद, भूरिरस, गूढमूल, असिपत्र तथा मधुतृण ये सब हैं। सभी प्रकार की ईख—रक्तपित्तनाशक, बलकारक, वीर्यवर्धक, कफजनक, रस तथा विपाक में मधुर, स्निग्ध, गुरु, मूत्रकारक, एवम् शीतवीर्य होती हैं। [१-२] हिं०-ईख, गन्ना। अं०-Sugar Cane (सुगर केन)। ले०-Sacharum officinarium (सेक्केरम् ऑफिसिनेरम्) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) । इसकी खेती भारतवर्ष के सभी उष्ण प्रदेशों में की जाती है। भावप्रकाशकार इसके १३ भेदों का उल्लेख करते हैं। आजकल भी इसके अनेक कृषित प्रकार पाये जाते हैं। इसके काण्ड स्वरस, मूल स्वरस तथा शर्करा, राव आदि इक्षुविकारों का उपयोग किया जाता है। अनेक योगों को टिकाऊ बनाने के लिए शर्करा आदि का उपयोग करते हैं। इसमें शर्करा आदि के अतिरिक्त कैल्शियम ऑक्जेलेट भी पाया जाता है। यह मधुर, शीतल, मूत्रल, सारक, बल्य, कण्ठ्य, श्रमहर, शुक्रशोधक तथा वात एवं कफवर्धक है। इसका मूल शीतल, मूत्रल एवं वृष्य है। यह मधुर होते हुये भी शीतवीर्य होने से वातवर्धक होता है (सुश्रुत)। इसको मूत्रजनन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना गया है (चरक)। इसका उपयोग रक्तपित्त, गुल्म, उदर, कामला एवं पांडु आदि में भी किया जाता है। इसका बाह्य प्रयोग पित्ताभिष्यन्द में किया गया है। अथेक्षुभेदानाह पौण्ड्रको भीरुकश्चापि वंशकः शतपोरकः। कान्तारतापसेक्षुश्च काण्डेक्षुः सूचिपत्रकः।।३।। नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत्। मनोगुप्ता च इत्येता जातयस्तत्र कीर्तिताः ।।४।। ऊख के भेद—पौण्ड्रक, भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेक्षु, काण्डेक्षु, सूचिपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र, नीलपोर, कोशकृत् तथा मनोगुप्ता ये सब ऊखकी जातियाँ मानी गई है। [३-४] अथ श्वेतपौण्ड्रक-भीरुकेक्षुगुणानाह वातपित्तप्रशमनो मधुरो रसपाकयोः। सुशीतो बृंहणो बल्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ।।५।। पौण्ड्रक तथा भीरुक ये दोनों ईख—वात तथा पित्त को शमन करने वाला, रस तथा विपाक में मधुर, अत्यन्त शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) एवम् बलकारक होती हैं। [५] अथ कोशकारेक्षुः । तस्य गुणानाह कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ।।६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA
९४० भावप्रकाशनिघण्टुः कोशकार नामक ईख—गुरु, शीतल एवम् रक्तपित्त तथा क्षय को नष्ट करने वाली होती है । [६] अथ कान्तारेक्षुगुणानाह कान्तारेक्षुर्गुरुर्वृष्यः श्लेष्मलो बृंहणः सरः ।।७।। कान्तार संज्ञक ईख—गुरु, वीर्यवर्धक, कफजनक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक) तथा सारक होती है । [७] अथ वंशकेक्षुगुणानाह दीर्घपोरः सुकठिनः सक्षारो वंशकः स्मृतः ।।८।। वंशक नामक ईख—लम्बे-लम्बे पोरों वाली, अत्यन्त कठिन तथा क्षारयुक्त होती है । [८] अथ शतपोरकेक्षुगुणानाह शतपर्वा भवेत्किञ्चित्कोशकारगुणान्वितः । विशेषात्किञ्चिदुष्णश्च सक्षारः पवनापहः ।।९।। शतपोरक संज्ञक ईख—औरों की अपेक्षा अधिक पोरोंवाली, किंचित् कोशकार संज्ञक ऊख के गुणों से युक्त, विशेष करके किंचित् उष्ण, क्षारयुक्त तथा वातनाशक होती है । [९] अथ तापसेक्षुगुणानाह तापसेक्षुर्भवेन्मृद्वी मधुरा श्लेष्मकोपनी । तर्पणी रुचिकृच्चापि वृष्या च बलकारिणी ।।१०।। तापसेक्षु संज्ञक ईख—कोमल, मधुर रसयुक्त, कफ को कुपित करने वाली, तृप्तिकारक, रुचि को उत्पन्न करने वाली, वीर्यवर्धक तथा बलकारक होती है । [१०] अथ काण्डेक्षुगुणानाह एवं गुणैस्तु काण्डेक्षुः स तु वातप्रकोपणः ।।११।। काण्डेक्षु नामक ईख—गुणों में यद्यपि "तापसेक्षु" के समान ही होती है तथापि यह वात को विशेष रूप से कुपित करने वाली होती है । [११] अथ सूचीपत्र-नीलपोर-नैपाल-दीर्घपत्राणां गुणानाह सूचीपत्रो नीलपोरो नैपालो दीर्घपत्रकः । वातलाः कफपित्तघ्नाः सकषाया विदाहिनः ।।१२।। सूचीपत्र, नीलपोर, नैपाल तथा दीर्घपत्रक संज्ञक ईख—वातजनक, कफ तथा पित्त नाशक, कषाय रसयुक्त तथा विदाही होती है । [१२] अथ मनोगुप्तेक्षुगुणानाह मनोगुप्ता वातहरी तृष्णाऽऽमयविनाशिनी । सुशीता मधुराऽतीव रक्तपित्तप्रणाशिनी ।।१३।। मनोगुप्ता संज्ञक ईख—वातनाशक, तृषा रोग को दूर करने वाली, अति शीतल, अत्यन्त मधुर एवम् रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है । [१३] अथ बाल-तरुण-वृद्धेक्षुगुणानाह बाल इक्षुः कफं कुर्य्यान्मेदोमेहकरश्च सः । युवा तु वातहृत् स्वादुरीषत्तीक्ष्णश्च पित्तनुत् ।। रक्तपित्तहरो वृद्धः क्षतहृद् बलवीर्यकृत् ।।१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
इक्षुवर्गः ९४१ बाल (कच्ची) अर्थात् थोड़े दिनों की ईख-कफकारक एवम् मेद तथा प्रमेह रोग को उत्पन्न करने वाली होती है। युवा (अधपकी) ईख-वातनाशक, स्वादिष्ट, किंचित् तीक्ष्ण एवम् पित्तनाशक होती है। वृद्ध (पकी) ईख-रक्तपित्त को दूर करने वाली, क्षतनाशक एवम् बल तथा वीर्य उत्पन्न करने वाली होती है।[१४] अथेक्षोरङ्गभेदेन गुणभेदानाह मूले तु मधुरोऽत्यर्थं मध्येऽपि मधुरः स्मृतः । अग्रे ग्रन्थिषु विज्ञेय इक्षुः पटुरसोजनैः ।।१५।। ईख के अङ्गभेद से गुणभेद-जड़ भाग में अत्यन्त मधुर रसयुक्त, मध्यभाग में मधुर रसयुक्त और अग्रभाग तथा गांठों में लवण रस युक्त ईख होता है, ऐसा लोगों को जानना चाहिये। [१५] अथ चूषितेक्षुगुणानाह दन्तनिष्पीडितस्येक्षो रसः पित्तास्रनाशनः । शर्करासमवीर्य स्यादविदाही कफप्रदः ।।१६।। दाँतों से चूसे हुये ईख का रस-पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, शक्कर के समान वीर्यवाला, अविदाही (किंचित् दाह करने वाला) एवं कफ उत्पन्न करने वाला होता है। [१६] अथ यान्त्रिकेक्षुरसगुणानाह मूलाग्रजन्तुग्रन्थादिपीडनान्मलसङ्गराद् । किञ्चित्कालविधृत्या च विकृतिं याति यान्त्रिकः ।। तस्माद्विदाही विष्टम्भी गुरुः स्याद्यान्त्रिको रसः ।।१७। कोल्हू में पिरे हुये ईख का रस-ईख का यह मूल, अग्रभाग, जन्तु एवम् गाँठ आदि के कोल्हू में पिरे जाने से तथा मैल के मिल जाने से और कुछ काल तक रखे रहने से विकृत (खराब) हो जाता है, अतएव वह विदाही, विष्टम्भजनक तथा गुरु होता है। [१७] अथ पर्युषितेक्षुरसगुणानाह रसः पर्युषितो नेष्टो ह्यम्लो वातापहो गुरुः । कफपित्तकरः शोषी भेदनश्चातिमूत्रलः ।।१८।। बासी ईख का रस-हितकर नहीं होता है और यह अम्ल रस युक्त, वातनाशक, गुरु, कफ तथा पित्त कारक, शोष उत्पन्न करने वाला, मलभेदक एवम् अत्यन्त मूत्रजनक होता है। [१८] अथ पक्वेक्षुरसगुणानाह पक्वो रसो गुरुः स्निग्धः सुतीक्ष्णः कफवातनुत् । गुल्मानाहप्रशमनः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ।।१९।। पकाया हुआ ईख का रस-रूक्ष, स्निग्ध, अत्यन्त तीक्ष्ण, कफ तथा वात नाशक, किंचित् पित्तकारक एवम् गुल्म तथा आनाह (अफारा) को दूर करने वाला होता है। [१९] अथेक्षुरसनिर्मितपदार्थगुणानाह इक्षोर्विकारास्तृड्दाहमूर्च्छापित्तास्रनाशनाः । गुरवो मधुरा बल्याः स्निग्धा वातहराः सराः ।। वृष्या मोहहराः शीता बृंहणा विषहारिणः ।।२०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ईख के रस में बने हुए पदार्थ-तृषा, दाह, मूर्च्छा, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाले, गुरु, मधुर रसयुक्त, बलकारक, स्निग्ध, वातनाशक, सारक, वीर्यवर्धक, मोह को दूर करने वाले, शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) तथा विषनाशक होते हैं । [२०] अथ फाणितम् ("चरका, राब, छोवा" इति लोके) । तस्य लक्षणगुणानाह इक्षो रसस्तु यः पक्वः किञ्चिद्गाढो बहुद्रवः । स एवेक्षुविकारेषु ख्यातः फाणितसंज्ञया ।। फाणितं गुर्वभिष्यन्दि बृंहणं कफशुक्रकृत् । वातपित्तश्रमान्हन्ति मूत्रवस्तिविशोधनम् ।। २१ ।। फाणित (चरका, राब, छोवा इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—ईख का जो पकाया हुआ रस कुछ गाढ़ा अंश तथा अधिक द्रव भाग से युक्त होता है वही ईख के रस से बने हुए पदार्थों में फाणित (राब) नाम से विख्यात है। फाणित (राब)—गुरु, अभिष्यन्दी, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), कफ तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला, वात, पित्त तथा श्रम को दूर करने वाला एवम् मूत्र तथा वस्ति का अधिक शोधन करने वाला होता है। [२१] अथ मत्स्यण्डी ("राबकाकव, खण्डराब" इति लोके) । तस्य लक्षणगुणानाह इक्षो रसो यः सम्पक्वो घनः किञ्चिद्द्रवान्वितः ।। २२ ।। मंदं यत्स्यन्दते तस्मात्तन्मत्स्यण्डी निगद्यते । मत्स्यण्डी भेदिनी बल्या लघ्वी पित्तानिलापहा ।। मधुरा बृंहणी वृष्या रक्तदोषापहा स्मृता ।। २३ ।। मत्स्यण्डी ("राब काकव, खण्डराब" इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—ईख का जो पकाया हुआ रस अधिक घन भाग तथा स्वल्प द्रव भाग से युक्त होता है उसे मत्स्यण्डी कहते हैं और इससे मन्द-मन्द रस झरता है इस कारण से इसका "मत्स्यण्डी" नाम रखा गया है। मत्स्यण्डी—मलभेदक, बलकारक, लघु, पित्त तथा वात को दूर करने वाली, मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस- रक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक एवम् रक्तसंबन्धी दोष को नष्ट करने वाली होती है। [२२-२३] अथ गुडस्य लक्षणं गुणाँश्चाह इक्षो रसो यः सम्पक्वो जायते लोष्टवद् दृढः ।। २४ ।। स गुडो गौडदेशे तु मत्स्यण्ड्येव गुडो मतः । गुडो वृष्यो गुरुः स्निग्धो वातघ्नो मूत्रशोधनः । नातिपित्तहरो मेदःकफक्रिमिबलप्रदः ।। २५ ।। गुड़ क लक्षण—ईख का जो रस पकाते-पकाते गाढ़ा होने पर ढेले के समान बाँधने से दृढ़ हो जाता है उसे "गुड़" कहते हैं। किन्तु "गौड़" देश में "मत्स्यण्डी" को ही "गुड़" मानते हैं। गुड़—वीर्यवर्धक, गुरु, स्निग्ध, वातनाशक, मूत्र शोधन करने वाला, अत्यन्त पित्तनाशक नहीं (किञ्चित् पित्तनाशक) एवम्—मेद, कफ, क्रिमि तथा बल को उत्पन्न करने वाला होता है। [२४-२५] अथ पुराणगुडस्य गुणानाह गुडो जीर्णो लघुः पथ्योऽनभिष्यन्द्यग्निपुष्टिकृत् । पित्तघ्नो मधुरो वृष्यो वातघ्नोऽसृक्प्रसादनः ।। २६ ।। पुराना गुड़—लघु, पथ्य, अनभिष्यंदी (किञ्चित् अभिष्यन्दी), अग्निजनक तथा पुष्टिवर्धक, पित्तनाशक, मधुर, वीर्यवर्धक, वातनाशक, एवम् रक्त को स्वच्छ (दोषरहित) करने वाला होता है। [२६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
इक्षुवर्गः ९४३ अथ नवीनगुडस्य गुणानाह गुडो नवः कफश्वासकासकृमिकरोऽग्निकृत् ।।२७।। नवीन गुड़—कफ, श्वास, कास तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला एवम् जठराग्नि की वृद्धि करने वाला होता है। [२७] अथानुपानभेदेन गुडस्य गुणानाह श्लेष्माणमाशु विनिहन्ति सहार्द्रकेण पित्तं निहन्ति च तदेव हरीतकीभिः । शुण्ठ्या समं हरति वातमशेषमित्थं दोषत्रयक्षयकराय नमो गुडाय ।।२८।। अनुपान भेद से गुड़ के गुण—गुड़ यदि अदरख के साथ सेवन किया जाय तो कफ को शीघ्र नष्ट करता है। और हरीतकी (हर्रे) के साथ सेवन करने से पित्त को दूर करता है। एवम् सोंठ के साथ गुड़ का सेवन करने से समस्त वातसम्बन्धी विकारों को दूर करता हैं। इस प्रकार से तीनों दोषों को दूर करने वाले गुड़ के लिये नमस्कार है अर्थात् तीनों दोषों को दूर करने से गुड़ ओषधियों में सर्वोत्तम है। [२८] अथ खण्डस्य गुणानाह खण्डन्तु मधुरं वृष्यं चक्षुष्यं बृंहणं हिमम् । वातपित्तहरं स्निग्धं बल्यं वान्तिहरं परम् ।।२९।। खण्ड—मधुर रसयुक्त, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), शीतवीर्य, वात तथा पित्त नाशक, स्निग्ध, बलकारक एवम् अत्यन्त वमन को दूर करने वाला होता है। [२९] खण्डमिति प्रसिद्धं (खांड) ।।२९।। यहाँ पर "खण्ड" इस पद से लोक प्रसिद्ध "खांड" का ग्रहण करना चाहिये। [२९] अथ शर्करा (‘‘चीनी’’ इति लोके) । तस्या लक्षणगुणानाह खण्डन्तु सिकतारूपं सुश्वेतं शर्करा सिता । सिता सुमधुरा रुच्या वातपित्तास्रदाहहृत् । मूर्च्छार्च्छदिज्वरान्हन्ति सुशीता शुक्रकारिणी ।।३०।। शर्करा (‘‘चीनी’’ इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—जो खाँड बालू के समान तथा श्वेत हो उसे ‘‘शर्करा’’ अथवा ‘‘सिता’’ कहते हैं। चीनी—अति मधुर, रुचिकारक, वात, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाली, अतिशीतल, शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवम्—मूर्च्छा, वमन तथा ज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [३०] अथ पुष्पसिता सितोपला च (फूल से बनाई हुई चीनी और मिश्री) । तयोर्गुणानाह भवेत्पुष्यसिता शीता रक्तपित्तहरी लघुः । सितोपला सरा लघ्वी वातपित्तहरी हिमा ।।३१।। पुष्पसिता (फूलों से बनाई हुई चीनी)—शीतल, लघु एवम् रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है। सितोपला (मिश्री)—सारक, लघु, शीतवीर्य एवम् वात तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [३१] अथ मधुखण्डगुणानाह मधुजा शर्करा रूक्षा कफपित्तहरा गुरुः । छर्द्यतीसारतृड्दाहरक्तहृत्तुवरा हिमा ।।३२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९४४ भावप्रकाशनिघण्टुः मधुखण्ड (शहद से बनी हुई खाँड अथवा शक्कर)—रूक्ष, कफ तथा पित्तनाशक, गुरु, कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य एवम्-वमन, अतिसार, तृषा, दाह तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [३२] अथ परिभाषामाह यथा यथैषां नैर्मल्यं मधुरत्वं यथा यथा। स्नेहलाघवशैत्यादि सरत्वञ्च तथा तथा।।३३।। परिभाषा—जैसे-जैसे इन (खांड, बूरा आदि) सब में निर्मलता तथा मधुरता (मिठास) अधिक होती जाती है वैसे- वैसे इनमें, स्निग्धता, लघुता, शीतलता एवम्-सारकता आदि (गुण) भी बढ़ते जाते हैं, अर्थात् निर्मलता तथा मधुरता के अनुसार ही इन सब में स्निग्धता आदि गुण रहते हैं। [३३] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे इक्षुवर्गः समाप्तः।
अथ अनेकार्थनामवर्गः वक्तव्य— प्रस्तुत अनेकार्थ वर्ग के पर्यायों को मूलनिघंटु भाग में आये पर्यायों के साथ मिलाकर अध्ययन करने से अनेक परिवर्तन देखे गये, इसलिये पादटिप्पणी में इनका स्पष्टीकरण किया गया है। कुछ पर्याय इनमें ऐसे हैं जो ठीक होते हुवे भी मूल भावप्रकाश निघंटु में नहीं हैं किन्तु अन्य निघंटुओं में हैं। कुछ पर्याय, मूल पर्यायों से कुछ ही भिन्न हैं जैसे किसी में केवल लिंगभेद है या किसी में केवल विशेषण का अन्तर है। कुछ ऐसे भी पर्याय हैं जिनका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसी प्रकार संभव है कि कुछ पर्याय अनेकार्थवाची होते हुये भी यहाँ उनका उल्लेख न हुआ हो। परिशिष्ट में दी हुई संपूर्ण पर्यायों की सूची से इनका ज्ञान हो सकता है। तत्र द्व्यर्थानि नामान्याह दो अर्थ वाले शब्द अश्मन्तकः—अम्ललोणिका कोविदारश्च। १. अश्मन्तक—तिनपतिया और कचनार। कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा च। २. कठिल्लक—करैला और लाल पुनर्नवा। कुलकः—पटोला, कुपीलुश्च (कुपीलुः ‘कुचिला’ इति लोके प्रसिद्धः)। ३. कुलक—परवर और कुचिला। कोशातकी—महाकोशातकी, राजकोशातकी च। ४. कोशातकी—नेनुआ और तरोई। दीप्यकः—यवानी, अजमोदा च। ५. दीप्यक—अजवाइन और अजमोद। मरुबकः—फणिज्जकः, पिण्डीतकश्च, (फणिज्जका = ‘मरुआ’ इति लोके, पिण्डीतकः = ‘मैनफल’ इति लोके)। ६. मरुबक—मरुआ और मैनफल। मधूलिका—मूर्वा, जलयष्टी च। ७. मधूलिका—मूर्वा और जलमुलेठी। रुचकम्—सौवर्चलं, बीजपूरकञ्च। ८. रुचक—सोंचरनमक और बिजौरा नींबू। लोणिका—लोणीशाकं, चाङ्गेरीशाकञ्च। ९. लोणिका—नोनीशाक और चांगेरीशाक (तिनपतिया)। वसुकः—रक्तार्कः १, क्षारलवणं च २। १०. वसुकः—लाल आक और रेहगवा नोन। बाह्लीकम्—कुङ्कुमं, हिङ्गु च। ११. बाह्लीक—केशर और हींग। वितुन्नकम—धान्यकं, तुत्थञ्च। १२. वितुन्नक—धनिया और नीला थोथा। स्वादुकण्टकः—गोक्षुरः, विकङ्कतश्च। १३. स्वादुकण्टक—गोखरू और कंटाई। अग्निमुखी—भल्लातकी, लाङ्गली च। १४. अग्निमुखी—भिलावा और कलिहारी। अग्निशिखम्—कुङ्कुमं, कुसुम्भञ्च। १५. अग्निशिखा—केसर और कुसुम (बर्रें)। अजशृङ्गी—मेषशृङ्गी, कर्कटशृङ्गी च। १६. अजशृङ्गी—मेढ़ासिङ्गी और काकड़ासिङ्गी। प्रियङ्गु—फलिनी, कङ्गुश्च। १७. प्रियङ्गु—फूलप्रियङ्गु और कंगुनी। भृङ्गः—भृङ्गराजः, त्वक् च। १८. भृङ्ग—भांगरा और तज। समङ्गा—मञ्जिष्ठा, लज्जालुश्च। १. वसुक पर्याय श्वेतार्क (मन्दार) का होने से यहाँ रक्तार्क के स्थान पर श्वेतार्क होना चाहिये। २. क्षारलवण के लिये वसुक पर्याय मूल में नहीं है। ध. नि. ने. वसुक पर्याय ‘उद्भिदलवण’ के लिये दिया है। ६३ भाव. I
१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः [ बायाँ स्तम्भ ] १९. समङ्गा—मंजीठ और लजालू। अमोघा—विडङ्गं, पाटला च। २०. अमोघा—वायविडंग और पाढल। मोचा—कदली, शाल्मलिश्च। २१. मोचा—केला और सेमर। कुटन्नटः—श्योनाकः, कैवर्तीमुस्तञ्च। २२. कुटन्नट—सोनापाठा और केवटी मोथा। कुनटी—धनिका, मनःशिला च। २३. कुनटी—धनियाँ और मैनसिल। घोण्टा—पूगः, बदरी च। २४. घोण्टा—सुपारी और बेर। त्रिपुटा—त्रिवृत्, सूक्ष्मैला च। २५. त्रिपुटा—निशोथ और छोटी इलायची। शटी—कचूरः, गन्धपलाशी च। २६. शटी—कचूर और गन्धपलाशी (कपूर- कचरी)। दन्तशठः—जम्बीरः, कपित्थश्च २७. दन्तशठ—जम्बीरी नींबू और कैथा। दन्तशठा—अम्लिका, चाङ्गेरी च। २८. दन्तशठा—इमली और तिनपतिया। अरुणम्१—मञ्जिष्ठा, अतिविषा च। २९. अरुणा—मञ्जीठ और अतीस। कणा—पिप्पली, जीरकञ्च। ३०. कणा—पीपल और जीरा। तालपर्णी२—मुशली, मुरा च। ३१. तालपर्णी—मूसली और मुरा (एकाङ्गी)। पीलुपर्णी—मूर्वा, बिम्बी च। ३२. पीलुपर्णी—मूर्वा और कन्दूरी। ब्राह्मणी—भार्ङ्गी, स्पृक्का च। ३३. ब्राह्मणी—भारङ्गी और स्पृक्का। अपराजिता३—विष्णुक़्रान्ता, शालिपर्णी च। ३४. अपराजिता—कोयल और शालिपर्णी। आस्फोटा—अपराजिता, सारिवा च। [ दायाँ स्तम्भ ] ३५. आस्फोटा—अपराजिता (कोयल) और श्वेत सारिवा (अनन्तमूल)। पारावत पदी—ज्योतिष्मती, काकजङ्घा च। ३६. पारावतपदी—मालकांगुनी और काकजङ्घा। शारदी४—शारिवा, जलपिप्पली च। ३७. शारदी—अनन्तमूल और जलपीपल। उग्रगन्धा—वचा, यवानी च। ३८. उग्रगन्धा—घोडवच और अजवाइन। परिव्याधः—कर्णिकारः जलवेतसश्च। ३९. परिव्याध—कर्णिकार और जलवेतस। अञ्जनम्—स्रोतोञ्जनम्, सौवीरञ्च। ४०. अञ्जन—काला सुरमा और सफेद सुरमा। अग्निः—चित्रकः भल्लातश्च। ४१. अग्नि—चीता और भिलावा। कृमिघ्नः—विडङ्गः, हरिद्रा च। ४२. कृमिघ्न—वायविडङ्ग और हरदी। तेजनः—शरः, वेणुश्च। ४३. तेजन—सरपत और बाँस। तेजनी—तेजस्वती, मूर्वा च। ४४. तेजनी—तेजवल और मूर्वा। रोचनः—कम्पिल्लः रोचना च। ४५. रोचन—कबीला और गोलोचन। [ रोचना—गोरोचना, रक्तकह्लारश्च५ ]। ४६. रोचना—गोलोचन और लाल कुमुद। राजादनम्—क्षीरिका, प्रियालश्च। ४७. राजादन—खिरनी और चिरौंजी। शकुलादनी—कटुका, जलपिप्पली च। ४८. शकुलादनी—कटुकी और जलपीपल। गोलोमी—श्वेतदूर्वा, वचा च। ४९. गोलोमी—सफेद दूब और घोडवच। पद्मा—पद्मचारिणी, भार्ङ्गी च। ५०. पद्मा—स्थलकमल और भारङ्गी। श्यामा—सारिवा, प्रियङ्गुश्च। [ पाद-टिप्पणियाँ ] १. मञ्जिष्ठा एवं अतिविषा का पर्याय अरुणा आया हुआ है न कि अरुणम्। २. तालपर्णी यह न मुशली का पर्याय है न मुरा का। अन्य निघण्टुओं में यह मिश्रेया का पर्याय दिया हुआ है। मुशली का पर्याय तालमूली मिलता है एवं मुरा का शालपर्णिका मिलता है। ३. 'अपराजिता' यह नाम शालिपर्णी (पाठा०-शालपर्णी) के पर्यायों में नहीं आया है। ४. 'शारदी' यह 'सारिवा' के पर्यायों में नहीं है। ५. कल्हार के पर्यायों में रोचना नहीं है।
अनेकार्थनामवर्गः १४७ ५१. श्यामा—अनन्तमूल और प्रियङ्गु। उत्तमा—त्रिफला, सर्वतोभद्रा च। ५२. उत्तमा—त्रिफला और गम्भारी। धान्यम्—धान्याकं, शाल्यादि च। ५३. धान्य—धनिया और शालि (जड़हन) आदि धान्य। सहस्रवीर्या—नीलदूर्वा, महाशतावरी च। ५४. सहस्रवीर्या—हरी दूब और बड़ी शतावर। सेव्यम्—उशीरं, लामज्जकञ्च। ५५. सेव्य—खस और लामज्जक उदुम्बरः—जन्तुफलं, ताम्रञ्च। ५६. उदुम्बर—गूलर और ताँबा। ऐन्द्री—इन्द्रवारुणी, इन्द्राणी¹ च। ५७. ऐन्द्री—इन्द्रायन, निर्गुण्डी और बड़ी इलायची। कटम्भरा—कटुका, श्योनाकश्च। ५८. कटम्भरा—कुटकी और सोनापाठा। क्षारः—यवक्षारः स्वर्जिका च। ५९. क्षारः—जवाखार और सज्जीखार। गण्डीरः—गण्डारी, मञ्जिष्ठा च [ गण्डारी शाकविशेषो 'गण्डानी' इति लोके]। ६०. गण्डीर—गण्डारी शाक (इसे लोक में 'गण्डानी' भी कहते हैं) और मंजीठ। गान्धारी—दुरालभा गन्धपलाशी च। ६१. गान्धारी—धमासा और गन्धपलाशी² (कपूरकचरी)। चित्रा—इन्द्रवारुणी, बृहदन्ती च। ६२. चित्रा—इन्द्रायन और बड़ी दन्ती। तुण्डीकेरी—कार्पासी, बिम्बी च। ६३. तुण्डीकेरी—कपास और कन्दूरी। धीरा—गुडूची, क्षीरकाकोली च। ६४. धीरा—गिलोय और क्षीरकाकोली बालपत्रः—खदिरः, यवासश्च³। ६५. बालपत्र—खैर और जवासा। वारि—बालकम्, उदकञ्च। ६६. वारि—सुगन्धवाला और जल। अङ्गारवल्ली—भार्गी गुञ्जा च। ६७. अङ्गारवल्ली—भारङ्गी और गुंजा (घुँघची)। अमृणालम्—लामज्जकम्, उशीरञ्च। ६८. अमृणाल—लामज्जक और खस। कुण्डली—गुडूची, कोविदारश्च। ६९. कुण्डली—गिलोय और कचनार। गन्धफली—प्रियङ्गु और गन्धफली—प्रियङ्गुः, चम्पककलिका च। ७०. गन्धफली—प्रियङ्गु और चम्पे की कली। दीर्घमूलः⁴—यवासः, शालिपर्णी च। ७१. दीर्घमूल—जवासा और सरिवन। पिच्छिला—शाल्मली शिंशपा च। ७२. पिच्छिला—सेमर और सीसम। पुष्पफलः—कपित्थः, कुष्माण्डश्च। ७३. पुष्पफल—कैथा और पेठा। पोटगलः—नलः, काशश्च। ७४. पोटगल—नरसल और कास। यवफल—कुटजः, वंशश्च। ७५. यवफल—कुड़ा और बांस देवी—मूर्वा, स्पृक्का च। ७६. देवी—मूर्वा और स्पृक्का। विश्वा—शुण्ठी, अतिविषा च। ७७. विश्वा—सोंठ और अतीस। शीतशिव—सैन्धवं, मिश्रेया⁵ च। ७८. शीतशिव—सेन्धा नमक और मिश्रेया। कर्कशः—काम्पिल्यः, कासमर्दश्च। ७९. कर्कश—कबीला और कसौंदी। चर्मकषा—शातला, मांसरोहिणी च। ८०. चर्मकषा—शातला, मांसरोहिणी च। १. भा. प्र. में इन्द्राणी के निर्गुण्डी तथा बृहदेला पर्याय नहीं हैं किन्तु रा. नि. ने दिये हैं। २. कपूरकचरी का गन्धारि का पर्याय भा. प्र. में है, गान्धारी नहीं है। ३. भा. प्र. में यवासा का बालपत्र पर्याय नहीं है किन्तु रा. नि. एवं ध. नि. में है। ४. यवासा और शालापर्णी का दीर्घमूलः पर्याय भा. प्र. में नहीं है किन्तु रा. नि. एवं ध. नि. में यवासा के लिये दीर्घमूलः एवं शालिपर्णी के लिये दीर्घमूला पर्याय मिलते हैं। ५. मिश्रेया के लिये शीतशीव पर्याय भा. प्र. में नहीं है किन्तु ध. नि. एवं रा. नि. में है।
९४८ भावप्रकाशनिघण्टुः
नन्दिवृक्षः -अश्वत्थभेदः (अधोमुखपत्रशाखी 'वेलिया पीपर' इति लोके), तूणिश्च । ८१. नन्दिवृक्ष-पीपलभेद (अधोमुख पत्ते तथा शाखाओं वाला 'बेलिया पीपर' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वृक्ष) और तून । पयः -क्षीरम्, उदकञ्च । ८२. पयः-दूध और जल । रुहा -दूर्वा, मांसरोहिणी १ च । ८३. रुहा-दूब और मांसरोहिणी । सिंही-बृहती, वासा च । ८४. सिंही-बड़ी कटेरी और अडूसा । कतकम्-विड्लवणम् २, निर्मलीफलं च । ८५. कतक-विरियाँ सञ्चर नोन और निर्मली का फल । कण्टकाढ्या-कुब्जकः, शाल्मली च । ८६. कण्टकाढ्या-कूजा और सेमर । यक्षधूपः -सरलनिर्यासः, ३ रालश्च । ८७. यक्षधूप-गन्धाविरोजा और राल । द्राविडी-शटी, सूक्ष्मैला च । ८८. द्राविडी-कचूर और छोटी इलायची । हट्टविलासिनी -हरिद्रा, नखी च । ८९. हट्टविलासिनी-हरदी और नखी । तिलपर्णम् ४ -रक्तचन्दनम्, ग्रन्थिपर्णं च । ९०. तिलपर्ण-लालचन्दन और गठिवन । मधुरः-जीवकः जीवनीयगणश्च । ९१. मधुर-जीवक और जीवनीय गण । लोहद्रावणी ५ -गण्डदूर्वा अम्लवेतसश्च ।
९२. लोहद्रावणी-गाँडरदूब और अमलबेंत । नागिनी-ताम्बूली, नागपुष्पी च । ९३. नागिनी-पान और नागपुष्पी । मृदुरेचनी-त्रिवृत् ६, मार्कण्डिका च । ९४. मृदुरेचनी-निसोत और सनाय । नटः-श्योनाकः, अशोकश्च । ९५. नट-सोनापाठा और अशोक । वनस्पतिः -वटः, नन्दिवृक्षश्च । ९६. वनस्पति-बरगद और बेलियापीपर । मन्दारः -श्वेतार्कः, महानिम्बश्च । ७ ९७. मन्दार-सफेद आक और बकायन । अम्बुजः-कमलम् ८, इज्जलश्च । ९८. अम्बुज-कमल और इज्जल (समुद्र-फल) । कबरी -बर्बरी ९, हिङ्गुपत्री च । ९९. कबरी-बर्बरी (वनतुलसी और हींगपत्री) । कुमारी -घृतकुमारिका, शतपत्री १० च । १००. कुमारी-घीकुवार और गुलाब । वरतिक्तकः-पाठा, पर्पटश्च । १०१. वरतिक्तक-पाठी और पित्तपापड़ा । चित्रकः -एरण्डः, ११ अनलनामा च । १०२. चित्रक-एरण्ड और चिता । यज्ञियः-खदिरः, पलाशश्च । १०३. यज्ञिय-खैर और पलाश । रक्तबीजः -अरिष्टकः, कन्दुंरी १२ च । १०४. रक्तबीज-रीठा और कन्दुंरी । क्षारश्रेष्ठः -पलाशः, मोक्षकश्च । १०५. क्षारश्रेष्ठः-पलाश और मोखा ।
१. मांसरोहिणी का पर्याय अतिरुहा आया है न कि केवल रुहा । ध. नि. में रुहा है । २. विडलवण का पर्याय कृतक है न कि कतक । ३. भा. प्र. में सरलनिर्यास के लिये वृक्षधूप आया है न कि यक्षधूप । ४. मूल में तैलपर्णकम् यह ग्रन्थिपर्ण के लिये पर्याय आया है । ५. गण्डदूर्वा का पर्याय लोहदद्राविणी आया है एवं अम्लवेतस के लिये यह पर्याय नहीं है । ६. त्रिवृत् का रेचनी पर्याय आया है न कि मृदुरेचनी । ७. महानिम्ब के लिये मन्दार पर्याय नहीं है । भा. प्र. में पारिभद्र के पर्याय में भण्डार लिखा हैं । ८. कमल के लिये अंबुज पर्याय अन्य निघण्टुओं में है । ९. बर्बरी के पर्याय में कबरी नहीं मिलता । १०. शतपत्री का पर्याय महाकुमारी आया है न कि कुमारी । ११. एरण्ड का पर्याय चित्रः दिया हुआ है । १२. कन्दुंरी नाम सन्दिग्ध है । रक्तबीज यह अनार का पर्याय अन्य निघण्टु में है । अनार का रक्तपुष्प पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है ।
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं शुद्ध लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
अनेकार्थनामवर्गः १४१ श्वेतपुष्पः-श्वेतार्कः, इन्द्रवारुणी च। १०६. श्वेतपुष्प-सफेद आक और इन्द्रायण। तुवरी-सौराष्ट्री, आढकी च। १०७. तुवरी-सोरठी माटी और अरहर। कुम्भिका-कट्फलः, वारिपर्णी च। १०८. कुम्भिका-कायफल और जलकुम्भी। राजपुत्रिका-रेणुका, जाती च। १०९. राजपुत्रिका-रेणुका और जाई (चमेली)। रक्तपुष्पः-रक्तार्कः, कन्दुंरी१ च। ११०. रक्तपुष्प-लाल आक और कन्दुरी। सप्तला-शातला, वासन्ती च। १११. सप्तला-शातला और नेवारी। विषमुष्टिकः-महानिम्बः विषतिन्दुकश्च। १ ११२. विषमुष्टिक-बकायन और कुचला। [L16
९५० भावप्रकाशनिघण्टुः श्रीपर्णी-गम्भारी, गणिकारिका, कट्फलं च। १६. श्रीपर्णी-गम्भारि, अरनी और कायफर। अमृता-गुडूची, हरीतकी, धात्री च। १७. अमृता-गिलोय, हर्रा और आँवला। अनन्ता-दुरालभा, नीलदूर्वा, लाङ्गली च। १८. अनन्ता-धमासा, हरी दूब और कलिहारी। ऋष्यप्रोक्ता-अतिबला, महाशातावरी, कपि-कच्छुश्च। १९. ऋष्यप्रोक्ता-ककही, बड़ी शातावर और केवा च। कृष्णवृन्तः-पाढल, गम्भारी, माषपर्णी च। २०. कृष्णवृन्ता-पाटला, गम्भारी, माषपर्णी। जीवन्ती-गुडूची, शाकविशेषः, वन्द१ च। २१. जीवन्ती-गिलोय, जीवन्ती शाकविशेष और बन्दा। लता-सारिवा, प्रियङ्गु, ज्योतिष्मती च। २२. लता-अनन्तमूल (सारिवा), प्रियङ्गु और मालकांगुनी। समुद्रान्ता-दुरालभा, कार्पासी, स्पृक्का च। २३. समुद्रान्ता-धमासा, कपास और स्पृक्का। हैमवती-हरीतकी, श्वेतवचा, पीतदुग्धः सेहुण्डश्च२ (यस्य मूलं 'चोक' इति प्रसिद्धम्)। २४. हैमवती-हर्रा, सफेद वच और पीले दूध का सेहुंड, भड़भाड़ (इसके मूल को लोक में 'चोक' कहते हैं)। अव्यथा-हरीतकी, महाश्रावणी, पद्माचारिणी च। २५. अव्यथा-हर्रा, बड़ी मुण्डी और स्थल-कमल। २६. षड्ग्रन्था-गन्धकचरी, वच और करञ्जी। वरदा-सुवर्चला ('हुरहुर' इति लोके), अश्वगन्धा, वाराही ('गेठी'ति लोके)। २७. वरदा-हुरहुर, असगन्ध और वाराहीकंद ('गेंठी' नाम से लोकप्रसिद्ध)। इक्षुगन्धा-काशः, कोकिलाक्षा, क्षीरविदारी (गोक्षुरः) च। २८. इक्षुगन्धा-कास, तालमखाना और विदारी। (और इक्षुगन्धिका-गोखरू भी है)। कालस्कन्धः-तमालः तिन्दुकं कालखदिरश्च।३ २९. कालस्कन्ध-तमाल, तेन्दू और दुर्गन्ध-खैर। महौषधम्-शुण्ठी, रसोनरू, विषञ्च।४ ३०. महौषध-सोंठ, लहसुन और विष (वत्सनाभ)। मधु-क्षौद्रं, पुष्परसः, मद्यञ्च। ३१. मधु-शहद, फूल का रस और मद्य। कपीतनः-आम्रातकः, शिरीषः, गर्दभाण्डश्च। ३२. कपीतन-अम्बाडा, सिरस और पारस पीपल। मदनः-पिण्डीतकः, धत्तूरः, सिक्थकश्च। ३३. मदन-मैनफल, धतूर और मोम। शतपर्वा-वंशः, दूर्वा और वच। ३४. शतपर्वा-बाँस, दूब और वच। सहस्रवेधी५-अम्लवेतसः, मृगमदः, हिङ्गु च। ३५. सहस्रवेधी-अमलवेत, कस्तूरी और हींग। ताम्रपुष्पी-धातकी, पाटला, श्यामा त्रिवृच्च।६ ३६. ताम्रपुष्पी-धाय का फूल, पाढ़लभेद और काली निशोथ। सदापुष्पः-श्वेतार्कः, रक्तार्कः, ७कुन्दश्च। ३७. सदापुष्प-सफेद आक, लाल आक और कुन्द। सुरभिः-शल्लकी, मुरा, एलवालुकं८ च। ३८. सुरभिः-सालई, मुरा और एलवालुक। लक्ष्मीः-ऋद्धिः, वृद्धिः और शमी च। ३९ लक्ष्मी-ऋद्धि, वृद्धि और शमी। कालानुसार्यम्-कालीयकं, तगरं शैलेयञ्च। ४०. कालानुसार्य-पीला चन्दन (कलम्बक), तगर और भूरिछरीला। चाम्पेयः-चम्पकः नागकेसरः, पद्मकेसरश्च९। ४१. चाम्पेय-चंपा, नागकेशर और कमलका केसर। नादेयी-गणिकारिका, जलजम्बूः, जलवेतसञ्च। १. वन्दा का पर्याय जीवन्ती नहीं है यद्यपि जीवन्तीभेद, स्वर्ण जीवन्ती एक प्रकार का बांदा ही होता है। २. वास्तव में यह सेहुण्ड भेद नहीं है। ३. कालखदिर पर्याय भा. प्र. ने नहीं दिया है। इरिमेद (विट्खदिर) का पर्याय कालस्कन्ध दिया हुआ है। ४. ध. नि. में विष का पर्याय महौषध दिया है। ५. भा. प्र. में अम्लवेतस् के पर्याय शतवेधी एवं सहस्रनुत् हैं एवं कस्तूरी का पर्याय सहस्रभित् है। ६. रा. नि. ने श्यामाविशेष का ताम्रपुष्पिका पर्याय दिया है। ७. रक्तार्क के लिये सदापुष्प पर्याय नहीं दिया हुआ है। ८. भा. प्र. में एलवालुक का सुगन्धि पर्याय दिया है न कि सुरभिः। ९. रा. नि. ने पद्मकेसर का पर्याय चाम्पेयकं दिया है।
अनेकार्थनामवर्गः ९५९ ४२. नादेयी-अग्निमंथ, जलजामुन और जलवेतस । पाक्यम्-विडम्, सौवर्चलम्¹, यवक्षारश्च । ४३. पाक्य-बिरिया सञ्चर नमक, कालानोन और जवाखार । विशल्या-लाङ्गली, गुडूची लघुदन्ती च । ४४. विशल्या-कलिहारी, गिलोय और छोटीदंती । इन्द्रद्रुः-ककुभः देवदारुः,² कुटजश्च । ४५. इन्द्रद्रु-अर्जुन, देवदार और कुड़ा । काश्मीरं काश्मीरी च-कुङ्कुमम्, पुष्करमूलम्, गम्भारी च। ४६. काश्मीर और काश्मीरी-केशर, पुष्करमूल और गम्भारि । गुन्द्रः³-पटेरकः, मुञ्जः शरश्च । ४७. गुन्द्र-गोंदपटेर, मूँज और सरपत । गुन्द्रा-प्रियङ्गुः, गवेधुका⁴, भद्रमुस्तकञ्च । ४८. गुन्द्रा-प्रियङ्गु, गर हेडुओ और नागरमोथा । चुक्रम्-शुक्तम्, अम्लवेतसम्, वृक्षाम्लञ्च । ४९. चुक्र-चूक, अमलवेंत और कोकम । पारिभद्रः-निम्बः, पारिजातः, देवदारुश्च ।⁵ ५०. पारिभद्र-नीम, फरहद और देवदारु । पीतदारुः-हरिद्रा,⁶ देवदारुः⁷ सरलश्च ।⁸ ५१. पीतदारु-हरदी, देवदार और धूपसरल । वीरः-ककुभः, वीरणं, काकोली च । ५२. वीर-कोह, वीरण तृण और काकोली । वीरतरुः-ककुभः⁹, वीरणम्, शरश्च ।¹⁰ ५३. वीरतरु-कोह, वीरण तृण और सरपत । मयूरः-अपामार्गः, अजमोदा, तुत्थञ्च । ५४. मयूर-चिचिड़ा, अजमोद और तूतिया । रक्तसारः-रक्तचन्दनं, पुतङ्गः, खदिरश्च । ५५. रक्तसार-लालचन्दन, पतङ्ग और खैर । बदरा¹¹-सुवर्चला, अश्वगन्धा, वाराही च । ५६. बदरा-हरहुर, असगंध और बाराहीकंद । वशिरः-रक्तापामार्गः, गजपिप्पली, समुद्रलवणश्च । ५७. वशिर-लाल अपामार्ग, गजपीपर और समुद्री नोन । सौवीरम्-अञ्जनभेदः, वदरम्, सन्धानभेदश्च । ५८. सौवीर-सफेद सुरमा, बेर, कांजी का भेद । वञ्जुलः-अशोकः, वेतसः, तिनिशश्च । ५९. वञ्जुल-अशोक, वेतस और तिनिस । शिला-मनःशिला, शिलाजतु,¹² गैरिकञ्च¹³ । ६०. शिला-मैनसिल, शिलाजीत और गेरू । सोमवल्ली-वाकुची, गुडूची, ब्राह्मी च । ६१. सोमवल्ली-वाकुची, गिलोय और ब्राह्मी । अक्षीवः-शोभाञ्जनः, महानिम्बः,¹⁴ समुद्रलवणश्च । ६२. अक्षीव-सहिजन, वकायन और समुद्री नोन । कारवी-काकजाजी, शताह्वा अजमोदा च । ६३. कारवी-कलौंजी, सोआ और अजमोदा । धामार्गवः-रक्तापामार्गः, राजकोशातकी, महाकोशातकी च । ६४. धामार्गव-लाल अपामार्ग, तरोई और नेनुआ । दुःस्पर्शः-यवासः, कपिकच्छूः, कण्टकारी च । ६५. दुःस्पर्श-जवासा, कौंच और भटकटैया ।
१. सौवर्चल का पर्याय मन्थपाकं आया है न कि पाक्यम् । २. देवदारुः का पर्याय भा. प्र. ने इन्द्रदारु लिखा है । ३. मुंज एवं शर के लिये गुन्द्रः पर्याय नहीं दिखलाई देता । ४. गवेधुका का गुन्द्रा पर्याय नहीं मिलता किन्तु एरका का पर्याय गुन्द्रा है । ५. देवदारु का पर्याय पारिभद्र नहीं मिलता । ६. हरिद्रा का पर्याय पीतदारु नहीं है किन्तु दारुहरिद्रा का है । ७. देवदारु का पर्याय पीतदारु नहीं है । ८. सरल का पर्याय पीतवृक्ष दिया हुआ है । ९. ककुभ का पर्याय वीरवृक्ष है । वीरतरु अन्य वृक्ष है । १०. शर का पर्याय वीरतरु नहीं मिलता । ११. बदरा के स्थान पर वरदा अधिक उचित है क्योंकि अश्वगन्धा तथा वाराही का पर्याय वरदा है । १२. शिलाजतु का पर्याय शिलांज है । १३. गैरिक के पर्याय गैरेयं, गिरिजं हैं न कि शिला । १४. महानिम्ब का अक्षीर पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है, अक्षीव नहीं ।
९५२ भावप्रकाशनिघण्टुः [ बायाँ स्तम्भ ] पलाशः—किंशुकः, गन्धपलाशी,१ पत्रङ्गं२ । ६६. पलाश—पलाश, कपूरकचरी और तेजपात । कालमेषी—मञ्जिष्ठा, वाकुची, श्यामा त्रिवृच्च । ६७. कालमेषी—मञ्जीठ, वाकुची और काली निसोध । पलङ्कषा—गुग्गुलुः, गोक्षुरः, लाक्षा च । ६८. पलङ्कषा—गूगल, गोखरू और लाख । मधुरसा—द्राक्षा, मूर्वा, गम्भारी च । ६९. मधुरसा—दाख, मूर्वा और गंभारि । रसा—रास्ना, शाल्लकी, पाठा च । ७०. रसा—रास्ना, सलई और पाढ़ी । श्रेयसी—हरीतकी, रास्ना, गजपिप्पली च । ७१. श्रेयसी—हर्रा, रास्ना और गजपीपल । लोहम्—अयः, कांस्यम्३, अगुरु च । ७२. लोह—लोहा, कांसा और अगर । सहा—मुद्गपर्णी, बलाभेदः ('ककही' इति लोके), शतपत्री४ ('सेवती गुलाब' इति लोके) । ७३. सहा—मुगंवन, बरियारा का भेद (लोक प्रसिद्ध 'ककही') और सेवती गुलाब । सुवहा—रास्ना, नाकुली५, नीलपुष्पः सिन्दुवारश्च । ७४. सुवहा—रास्ना, नाकुली और नीले फूलकी मेउड़ी । कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा, कृष्णबर्बरी च । [ दायाँ स्तम्भ ] ७५. कठिल्लक—करेला, लाल गदहपुर्ना और काली बर्बरी । मधूलिका—मूर्वा, यष्टी, जलमधूकश्च । ७६. मधूलिका—मूर्वा, मुलेठी और जल महुआ । वितुन्नकम्—धान्यकम्, तुत्थकम्, गोनर्दश्च । ७७. वितुन्नक—धनिया तूतिया और केवटी मोथा । देवी—स्पृक्का, मूर्वा, वन्ध्याकर्कोटी च । ७८. देवी—स्पृका, मूर्वा और बाँझ खेकसा । वसुकः—शिवमल्ल, श्वेतार्कः, रोमकं६ च । ७९. वसुक—बड़ी मौलसिरी, सफेद आक और सांभर नोन । गण्डीरः—शाकविशेषः, मञ्जिष्ठा, गण्ड दूर्वा च । ८०. गण्डीर—गण्डारी नामक शाकविशेष, मंजीठ और गांडर दू । लाङ्गली—कलिहारी, जलपिप्पली, नारिकेलश्च । ८१. पिच्छिला—कलिहारी, जलपीपल और नारियल । पिच्छिला—शिंशपा, शाल्मलिः, भूतवृक्षश्च । ८२. पिच्छिला—शीशम, सेमर और लिसोड़ा । महासहा—माषपर्णी, अम्लातकः, कुब्जकश्च । ८३. महासहा—माषपर्णी, बाणपुष्प और कूबजा । चन्द्रिका—मेथी, चन्द्रशूरः, श्वेतकण्टकारी च । ८४. चन्द्रिका—मेथी, चनसुर और सफेद भटकटैया । इति त्र्यर्थानि नामानि । अथ चतुर्थार्थकानि नामान्याह चार अर्थ वाले शब्द [ बायाँ स्तम्भ ] श्वेतपुष्पा—इन्द्रवारुणी, सिन्दुवारः, श्वेतार्कः, सैरेयकश्च । १ श्वेतपुष्पा—इन्द्रायण, मेउड़ी, सफेद आक और कटसरैया । [ दायाँ स्तम्भ ] कारवी—पृथ्वीका७, शतपुष्पा, कालाजाजी, अजमोदा च । २ कारवी—पृथ्वीका, शतपुष्पा, कलौंजी और अजमोदा ।
[ पाद-टिप्पणियाँ ] १. गन्धपलाशी का पर्याय पलाशी है न कि पलाशः । २. ध. नि. एवं रा. नि. ने पलाशी पर्याय तेजपत्र के लिये लिखा है । ३. ध. नि. एवं रा. नि. ने कांस्य का पर्याय लोह लिखा है । ४. शतपत्री का सहा पर्याय भा. प्र. रा. नि. एवं ध. नि. में नहीं है । ५. नाकुली का सुरसा पर्याय भा. प्र. में है, सुवहा नहीं । ६. रा. नि. एवं ध. नि. में रोमक के वसुकं, वसु पर्याय मिलते हैं । ७. पृथ्वीका का पर्याय कारवी नहीं मिलता । पृथ्वीका, बृहदेला तथा हिंगुपत्री दोनों का पर्याय है किन्तु इनके कारवी पर्याय न होने से यहाँ दोनों में से कोई नहीं हो सकता । ध. नि. में कारवी का एक अन्य पर्याय कटुहुञ्जी (ऋतुसविशेष) दिया है ।
अनेकार्थनामवर्गः ९५३ अम्बष्ठा—पाठा, चाङ्गेरी, माचिका, यूथिका च इति । ३ अम्बष्ठा—पाठी, चांगेरी, माचिका और जूही। इति चतुर्थार्थकानि नामानि । अथ बह्वर्थकानि नामान्याह बहुत अर्थवाले शब्द अक्षशब्दः स्मृतोऽष्टासु सौवर्चलबिभीतके। कर्षपद्माक्षरुद्राक्षशकटेन्द्रियपाशके ॥१॥ १. अक्ष—(१) काला नमक, (२) बहेड़ा, (३) कर्षनामक तौल (४) कमलगट्टा, (५) रुद्राक्ष, (६) गाड़ी, (७) इन्द्रिय और (८) पासा (जुआ खेलने का साधन) इन ८ अर्थों में अक्ष का प्रयोग होता है ॥१॥ काकाख्यः काकमाची च काकोली काकणन्तिका । काकजङ्घा काकनासा काकोदुम्बरिकाऽपि च॥ सप्तस्वर्थेषु कथितः काकशब्दो विचक्षणैः ॥२॥ २. काक—(१) कौवा, (२) मकोय, (३) काकोली, (४) लाल गुञ्जा, (५) काकजङ्घा, (६) काकनासा और (७) कठूमर इन सात अर्थों में काक शब्द का प्रयोग होता हैं।।२।। सर्पद्विरदमेषेषु सीसके नागकेसरे। नागवल्ल्यां नागदन्त्यां नागशब्दः प्रयुज्यते ॥३॥ ३. नाग—(१) साँप, (२) हाथी, (३) भेड़ा, (४) सीसा (धातु), (५) नागकेसर, (६) पान और (७) नागदन्ती (दन्तीभेद) इन ७ अर्थों में नाग शब्द का प्रयोग होता है ॥३॥ मांसद्रवे चेक्षुरसे पारदे मधुरादिषु । बोले¹ रागे विषे नीरे रसो नवसु वर्त्तते ॥४॥ ४ रसः—(१) मांस का रस, (२) द्रव पदार्थ, (३) ऊख का रस, (४) पारा, (५) मधुरादि ६ प्रकार के रस, (६) बोल, (७) राग (अनुराग), (८) विष और (९) जल इन ९ अर्थों में रस शब्द का प्रयोग होता है ॥४४॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे अनेकार्थवर्गः समाप्तः । इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमभागे द्रव्यगुणप्रकरणापरनामकं षष्ठं मिश्रप्रकरणं समाप्तम् ॥६॥ समाप्तश्चायं निघण्टुभागः । १. स्वादेति पाठा०।
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श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः पूर्वखण्डे द्वितीयो भागः तत्र सप्तमं परिभाषादिप्रकरणम् ।।७।। अथ प्रथमं मानपरिभाषाप्रकरणम् ।।१।। तत्रादौ मानोक्तौ हेतुमाह- न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् । अतः प्रयोगकार्यार्थ मानमत्रोच्यते मया ।।१।। मानपरिभाषा प्रकरण आरम्भ करने के पूर्व मान (तौल) के विषय में कहने का प्रयोजन बिना मान (तौल) के द्रव्यों का किसी में योग नहीं किया जा सकता, अतः प्रयोग में काम करने के लिये यहाँ मैं (ग्रन्थकार) मान (तौल) को कहता हूँ ।।१।। अथ मागधमानमाह- चरकस्य मतं वैद्यैराद्यैर्यस्मान्मतं ततः । विहाय सर्वमानानि मागधं मानमुच्यते ।।२।। त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिशता परमाणुभिः । त्रसरेणुस्तु पर्यायनाम्ना वंशी निगद्यते ।।३।। जालान्तरगतैः सूर्यकरैर्वंशी विलोक्यते । षड्वंशीभिर्मरीचिः स्यात्ताभिः षड्भिश्च राजिका ।। तिसृभी राजिकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः । यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुञ्जा स्यात्तच्चतुष्टयम् ।।५।। षड्भिस्तु रक्तिकाभिः स्यान्माषको हेमधानकौ । माषैश्चतुर्भिःशाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ।।६।। टङ्कः स एव कथितस्तद्वयं कोल उच्यते । क्षुद्रको वटकश्चैव द्रङ्क्षणः स निगद्यते ।।७।। कोलद्वयन्तु कर्षः स्यात्स प्रोक्तः पाणिमानिका । अक्षः पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ।। विडाल पदकं चैव तथा षोडशिका मता । करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ।।९।। उदुम्बरञ्च पर्यायैः कर्षमेव निगद्यते । स्यात्कर्षाभ्यामर्द्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा ।।१०।। शुक्तिभ्याञ्च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रंचतुर्थिका । प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्त्यते ।।११।। पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतञ्च निगद्यते । प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात्कुडवोऽर्द्धशरावकः ।।१२।। अष्टमानञ्च स ज्ञेयः कुडवाभ्याञ्च मानिका । शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ।।१३।। शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुःप्रस्थस्तथाऽऽढकः । भाजनं कांस्यपात्रं च चतुःषष्टिपलंश्च सः ।।१४।। चतुभिराढकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोऽर्मणः । उन्मानञ्च घटो राशिर्द्रोणपर्यायसंज्ञितः ।।१५।। द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकः । शूर्पाभ्याञ्च भवेद् द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ।। द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः । चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा ।।१७।। पलानां द्विसहस्रञ्च भार एकः प्रकीर्त्तितः । तुलापलशतं ज्ञेयं सर्वत्रैवैष निश्चयः ।।१८।। माषटङ्काक्षबिल्वानि कुडवप्रस्थमाढकम् । राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुर्गुणम् ।।१९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मागध मान—जब कि प्राचीन वैद्यों ने चरक के मत को माना है इसीसे अन्य सब मानों (तौलों) को छोड़ कर सर्वप्रथम मगध देश में प्रचलित 'मागध' नामक मान को कहता हूँ। पण्डितों ने ३० परमाणुओं¹ का 'त्रसरेणु' और त्रसरेणु का ही पर्यायवाची शब्द 'वंशी' कहा है। जाली के अन्तर्गत सूर्य की किरणों द्वारा वंशी दिखाई पड़ती है अर्थात् उन किरणों में ध्यान से देखने पर जो सूक्ष्म रज (धूल के कण) दिखाई पड़ते हैं वे ही वंशी हैं। ६ वंशी की (त्रसरेणु) १ मरीचि होती है और ६ मरीचि की १ राजिका (राई) होती है। ३ राई का १ सरसों, ८ सरसों का १ जौ, ४ जौ की एक रत्ती, ६ रत्ती का १ मासा होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द हेम और धानकं (धान्यक) हैं। ४ मासे का एक शाण होता है और इसीको धरण तथा टङ्क भी कहते हैं। २ शाण का १ कोल होता है और इसी को क्षुद्रक, वटक तथा द्रङ्क्षण भी कहते हैं। २ कोल का एक कर्ष होता है और कर्ष ही के पर्यायवाची शब्द पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्पाणि, तिन्दुक, विडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह तथा उदुम्बर ये सब कहे जाते हैं। दो कर्ष का १ अर्धपल (आधा पल) होता है, इसी को शुक्ति तथा अष्टमिका कहते हैं। २ शुक्ति का १ पल होता है। इसी के नामान्तर मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व ये सब हैं। २ पल की १ प्रसृति होती है। इसी को प्रसृत भी कहते हैं। २ प्रसृति की १ अञ्जलि होती है। इसी के नामान्तर कुडव, अर्धशारावक तथा अष्टमान हैं। २ कुडव (अञ्जलि) की १ मानिका होती है। इसी को शराव तथा आठ पल का होने से अष्टपल भी विद्वान् लोग मानते हैं। २ शराव का एक प्रस्थ और ४ प्रस्थ का १ आढक होता है। इसी को भाजन, कांस्यपात्र तथा ६४ पल का होने से चतुःषष्टिपल भी कहते हैं। ४ आढक का १ द्रोण होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द कलश, नल्वण, अर्मण, उन्मान, घट तथा राशि ये सब हैं। २ द्रोण का शूर्प होता है। इसी को कुम्भ तथा ६४ शराव का होने से चतुःषष्टिशरावक भी कहते हैं। २ शूर्प की १ द्रोणी होती है। इसी को वाह तथा गोणी भी कहते हैं। २ द्रोणी की १ खारी होती है। बुद्धिमान् लोग तौल में ४०९६ (चार हजार छानबे) पलों की खारी, २००० (दो हजार) पलों का एक भार तथा १०० (सौ) पलों की एक तुला कहते हैं। सर्वत्र शास्त्रों में यही निश्चित है। माष, टङ्क, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक, राशि, गोणी और खारी ये सब उत्तरोत्तर एक दूसरे की अपेक्षा चौगुने होते हैं अर्थात्— ४ माष (माशे) का १ टङ्क। ४ टङ्क का १ अक्ष। ४ अक्ष का १ बिल्व। ४ बिल्व का १ कुडव। ४ कुडव का १ प्रस्थ। ४ प्रस्थ का १ आढक। ४ आढक की १ राशि। ४ राशि की १ गोणी। ४ गोणी की १ खारी समझनी चाहिये ॥२-१९॥ १. जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स उच्यते ॥१॥ खिड़की के राह जो सूर्य की किरणें मकान के अन्दर आती हैं उनमें जो सूक्ष्म रज दिखाई पड़ते हैं उन रजों में एक के तीसवें भाग को परमाणु कहते हैं ॥१॥
अथ प्रथमं मानपरिभाषाप्रकरणम् ९५७ ❖ मागधपरिभाषायां षड्रक्तिको माषश्चतुर्विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, षण्णवतिरक्तिकः कर्षः । अयं चरकसम्मतः । सुश्रुतमते तु पञ्चरक्तिको माषः, विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, अशीतिरक्तिकः कर्षः । अयमेव कालिङ्गपरिभाषायामपि । यतस्तत्राष्टरक्तिको माषो द्वात्रिंशद्रक्तिकष्टङ्कः, सार्धटङ्कद्वयमितः कर्षः ।। २-१९ ।। मागधपरिभाषा में ६ रत्ती का एक मासा, २४ रत्ती का १ टङ्क और ९६ रत्ती का १ कर्ष होता है। यह मान चरकसम्मत है। सुश्रुत के मत में-५ रत्ती का १ माशा, २० रत्ती का १ टङ्क और ८० रत्ती का १ कर्ष होता है। यही कालिङ्ग परिभाषा में भी होता है। क्योंकि उसमें ८ रत्ती का १ माशा, ३२ रत्ती का १ टङ्क और २ ।। टङ्क का १ कर्ष होता है ।।२-१९।। अथ द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां मानविषये परिभाषामाह- गुञ्जाऽऽदिमानमारभ्य यावत्स्यात्कुडवस्थितिः । द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।। प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः । मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित्स्मृतम् ।। द्रव (पानी आदि के समान), गीले तथा सूखे द्रव्यों के मान के विषय में परिभाषा-रत्ती आदि से लेकर कुडवपर्यन्त द्रव, गीले तथा सूखे पदार्थों का मान (तौल) बराबर रहता है, अर्थात् जितना और द्रव्यों का मान है उसी के समान ही इसका भी रहता है। किन्तु प्रस्थ आदि मान से द्रव तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों का लिखित मान द्विगुण होना आरम्भ हो जाता है। तुला का मान द्रव्य द्रव्य या आर्द्र द्रव्यों में भी कहीं द्विगुण नहीं किया जाता अर्थात् जैसा लिखित रहता है उतना ही लिया जाता है ।।२०-२१।। अथ कुडवभाण्डस्य लक्षणमाह- मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् । विस्तीर्णञ्च तयोच्छ्रञ्च तन्मानं कुडवं वदेत् ।। २२ ।। कुडवसंज्ञक मानपात्र का लक्षण-मिट्टी, वृक्ष, बांस या लोहा के बने हुये चार अंगुल चौड़े तथा चार ही अंगुल ऊंचे मानपात्र को 'कुडव' कहते हैं ।।२२।। इति मागधमानं समाप्तम् । अथ कालिङ्गमानमाह- यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ । अतस्तु मात्रा तद्योग्या प्रोच्यते सुज्ञसंमता ।। यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः । यवद्वयेन गुञ्जा स्यात्त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते ।। २४ ।। माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत्क्वचित् । चतुर्भिर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च ।। गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद्दशमाषकैः । चतुष्कषैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः ।। चतुष्पलैश्च कुडवः प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः । स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् । नाल्पं हन्त्यौषधं व्याधिं यथाऽम्भोऽल्पं महानलः ।। अतिमात्रं च दोषाय यथा शस्ये बहूदकम् ।। २८ ।। कालिङ्गमान-कलियुग में मनुष्य मन्द अग्नि वाले, छोटे शरीर के तथा हीन बलवाले हैं, अतः उनके योग्य विद्वानों के द्वारा स्वीकृत जो मात्रा (औषध देने में) है उसे कहते हैं। १२ सफेद सरसों का १ जौ और दो जौ की एक रत्ती, तीन रत्ती का एक बल्ल होता है। ८ रत्ती का अथवा कहीं कहीं ७ रत्ती का भी एक माशा और चार मासे का एक शाण होता है, इसी को निष्क और टङ्क भी कहते हैं। छः माशे का एक गद्याण होता है। दस माशे का एक कर्ष और चार कर्ष का एक पल जो कि दस शाण के बराबर होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ४ पलों का एक कुडव होता है। इसके बाद प्रस्थादि का मान पूर्वोक्त रीति के समान ही माना गया है। वस्तुतः ओषधियों की मात्रा का कोई मर्यादा निश्चित नहीं है। अतः बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि—काल (शीतादि ऋतु और प्रातः, सायं आदि), अग्नि (मन्द, दीप्त आदि), अवस्था (बाल्यादि), बल, प्रकृति (वातादि), दोष (वातादि) और देश (जाङ्गलादि) को देखकर तदनुसार मात्रा की कल्पना करें। उचित मात्रा की अपेक्षा हीन मात्रा की ओषधि बढ़े हुये रोग को उसी प्रकार शान्त नहीं कर सकती है जैसे कि—थोड़ा जल बड़े अग्निराशि को नहीं शान्त कर सकता। यदि ओषधि की अधिक मात्रा दी जाय तो भी हानिकारक ही होती है जैसे कि—धान में भी अधिक जल हानिकारक होता है। इससे बहुत समझ बूझ कर ओषधियों की मात्रा देनी चाहिये ॥२३-२८॥ मागध मान तथा कालिङ्ग मान की आधुनिक मान से तुलना—मागध मान का १ कर्ष १ तोले (१२ माशे) के बराबर तथा कालिङ्ग मान का १ कर्ष (१० माशे) एक रुपये भर का होता है। इतना ध्यान अवश्य देना चाहिये। मागध मान आधुनिक मान ६ रत्ती का १ माशा = ६ रत्ती ४ माशे का १ शाण (टङ्क) = ३ माशा २ शाण का १ कोल = ६ माशा (आधा तोला) २ कोल का १ कर्ष = १२ माशा (१ तोला) २ कर्ष का १ अर्धपल (शुक्ति) = २ तोले २ शुक्ति का १ पल = ४ तोले २ पल की १ प्रसृति = ८ तोले २ प्रसृति की १ अञ्जलि (कुडव) = १६ तोले २ कुडव की १ मानिका (शराव) = ३२ तोले २ शराव का १ प्रस्थ = ६४ तोले ४ प्रस्थ का १ आढक = २५६ तोले ४ आढक का १ द्रोण = १०२४ तोले २ द्रोण का १ शूर्प = २०४८ तोले २ शूर्प की १ द्रोणी = ४०९६ तोले ४ द्रोणी की १ खारी = १६३८४ तोले २००० पल का १ भार = ८००० तोले १००० पल की १ तुला = ४०० तोले कालिङ्ग मान आधुनिक मान ८ रत्ती का १ माशा = ८ रत्ती या १ माशा ४ मासे का १ शाण (टङ्क) = ४ माशे ६ मासे का १ गद्याण = ६ माशा (आधा तोला) १० मासे का १ कर्ष = १ भर ४ कर्ष का १ पल = ४ भर ४ पल का १ कुडव = १६ भर (३ छ. १ भर) २ कुडव की १ मानिका (शराव) = ३२ भर (६ छ. २ भर) २ शराव का १ प्रस्थ = ६४ भर (१२ छ. ४ भर)