भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः [ बायाँ स्तम्भ ] १९. समङ्गा—मंजीठ और लजालू। अमोघा—विडङ्गं, पाटला च। २०. अमोघा—वायविडंग और पाढल। मोचा—कदली, शाल्मलिश्च। २१. मोचा—केला और सेमर। कुटन्नटः—श्योनाकः, कैवर्तीमुस्तञ्च। २२. कुटन्नट—सोनापाठा और केवटी मोथा। कुनटी—धनिका, मनःशिला च। २३. कुनटी—धनियाँ और मैनसिल। घोण्टा—पूगः, बदरी च। २४. घोण्टा—सुपारी और बेर। त्रिपुटा—त्रिवृत्, सूक्ष्मैला च। २५. त्रिपुटा—निशोथ और छोटी इलायची। शटी—कचूरः, गन्धपलाशी च। २६. शटी—कचूर और गन्धपलाशी (कपूर- कचरी)। दन्तशठः—जम्बीरः, कपित्थश्च २७. दन्तशठ—जम्बीरी नींबू और कैथा। दन्तशठा—अम्लिका, चाङ्गेरी च। २८. दन्तशठा—इमली और तिनपतिया। अरुणम्१—मञ्जिष्ठा, अतिविषा च। २९. अरुणा—मञ्जीठ और अतीस। कणा—पिप्पली, जीरकञ्च। ३०. कणा—पीपल और जीरा। तालपर्णी२—मुशली, मुरा च। ३१. तालपर्णी—मूसली और मुरा (एकाङ्गी)। पीलुपर्णी—मूर्वा, बिम्बी च। ३२. पीलुपर्णी—मूर्वा और कन्दूरी। ब्राह्मणी—भार्ङ्गी, स्पृक्का च। ३३. ब्राह्मणी—भारङ्गी और स्पृक्का। अपराजिता३—विष्णुक़्रान्ता, शालिपर्णी च। ३४. अपराजिता—कोयल और शालिपर्णी। आस्फोटा—अपराजिता, सारिवा च। [ दायाँ स्तम्भ ] ३५. आस्फोटा—अपराजिता (कोयल) और श्वेत सारिवा (अनन्तमूल)। पारावत पदी—ज्योतिष्मती, काकजङ्घा च। ३६. पारावतपदी—मालकांगुनी और काकजङ्घा। शारदी४—शारिवा, जलपिप्पली च। ३७. शारदी—अनन्तमूल और जलपीपल। उग्रगन्धा—वचा, यवानी च। ३८. उग्रगन्धा—घोडवच और अजवाइन। परिव्याधः—कर्णिकारः जलवेतसश्च। ३९. परिव्याध—कर्णिकार और जलवेतस। अञ्जनम्—स्रोतोञ्जनम्, सौवीरञ्च। ४०. अञ्जन—काला सुरमा और सफेद सुरमा। अग्निः—चित्रकः भल्लातश्च। ४१. अग्नि—चीता और भिलावा। कृमिघ्नः—विडङ्गः, हरिद्रा च। ४२. कृमिघ्न—वायविडङ्ग और हरदी। तेजनः—शरः, वेणुश्च। ४३. तेजन—सरपत और बाँस। तेजनी—तेजस्वती, मूर्वा च। ४४. तेजनी—तेजवल और मूर्वा। रोचनः—कम्पिल्लः रोचना च। ४५. रोचन—कबीला और गोलोचन। [ रोचना—गोरोचना, रक्तकह्लारश्च५ ]। ४६. रोचना—गोलोचन और लाल कुमुद। राजादनम्—क्षीरिका, प्रियालश्च। ४७. राजादन—खिरनी और चिरौंजी। शकुलादनी—कटुका, जलपिप्पली च। ४८. शकुलादनी—कटुकी और जलपीपल। गोलोमी—श्वेतदूर्वा, वचा च। ४९. गोलोमी—सफेद दूब और घोडवच। पद्मा—पद्मचारिणी, भार्ङ्गी च। ५०. पद्मा—स्थलकमल और भारङ्गी। श्यामा—सारिवा, प्रियङ्गुश्च। [ पाद-टिप्पणियाँ ] १. मञ्जिष्ठा एवं अतिविषा का पर्याय अरुणा आया हुआ है न कि अरुणम्। २. तालपर्णी यह न मुशली का पर्याय है न मुरा का। अन्य निघण्टुओं में यह मिश्रेया का पर्याय दिया हुआ है। मुशली का पर्याय तालमूली मिलता है एवं मुरा का शालपर्णिका मिलता है। ३. 'अपराजिता' यह नाम शालिपर्णी (पाठा०-शालपर्णी) के पर्यायों में नहीं आया है। ४. 'शारदी' यह 'सारिवा' के पर्यायों में नहीं है। ५. कल्हार के पर्यायों में रोचना नहीं है।