भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1167 में से

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अथ अनेकार्थनामवर्गः वक्तव्य— प्रस्तुत अनेकार्थ वर्ग के पर्यायों को मूलनिघंटु भाग में आये पर्यायों के साथ मिलाकर अध्ययन करने से अनेक परिवर्तन देखे गये, इसलिये पादटिप्पणी में इनका स्पष्टीकरण किया गया है। कुछ पर्याय इनमें ऐसे हैं जो ठीक होते हुवे भी मूल भावप्रकाश निघंटु में नहीं हैं किन्तु अन्य निघंटुओं में हैं। कुछ पर्याय, मूल पर्यायों से कुछ ही भिन्न हैं जैसे किसी में केवल लिंगभेद है या किसी में केवल विशेषण का अन्तर है। कुछ ऐसे भी पर्याय हैं जिनका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसी प्रकार संभव है कि कुछ पर्याय अनेकार्थवाची होते हुये भी यहाँ उनका उल्लेख न हुआ हो। परिशिष्ट में दी हुई संपूर्ण पर्यायों की सूची से इनका ज्ञान हो सकता है। तत्र द्व्यर्थानि नामान्याह दो अर्थ वाले शब्द अश्मन्तकः—अम्ललोणिका कोविदारश्च। १. अश्मन्तक—तिनपतिया और कचनार। कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा च। २. कठिल्लक—करैला और लाल पुनर्नवा। कुलकः—पटोला, कुपीलुश्च (कुपीलुः ‘कुचिला’ इति लोके प्रसिद्धः)। ३. कुलक—परवर और कुचिला। कोशातकी—महाकोशातकी, राजकोशातकी च। ४. कोशातकी—नेनुआ और तरोई। दीप्यकः—यवानी, अजमोदा च। ५. दीप्यक—अजवाइन और अजमोद। मरुबकः—फणिज्जकः, पिण्डीतकश्च, (फणिज्जका = ‘मरुआ’ इति लोके, पिण्डीतकः = ‘मैनफल’ इति लोके)। ६. मरुबक—मरुआ और मैनफल। मधूलिका—मूर्वा, जलयष्टी च। ७. मधूलिका—मूर्वा और जलमुलेठी। रुचकम्—सौवर्चलं, बीजपूरकञ्च। ८. रुचक—सोंचरनमक और बिजौरा नींबू। लोणिका—लोणीशाकं, चाङ्गेरीशाकञ्च। ९. लोणिका—नोनीशाक और चांगेरीशाक (तिनपतिया)। वसुकः—रक्तार्कः १, क्षारलवणं च २। १०. वसुकः—लाल आक और रेहगवा नोन। बाह्लीकम्—कुङ्कुमं, हिङ्गु च। ११. बाह्लीक—केशर और हींग। वितुन्नकम—धान्यकं, तुत्थञ्च। १२. वितुन्नक—धनिया और नीला थोथा। स्वादुकण्टकः—गोक्षुरः, विकङ्कतश्च। १३. स्वादुकण्टक—गोखरू और कंटाई। अग्निमुखी—भल्लातकी, लाङ्गली च। १४. अग्निमुखी—भिलावा और कलिहारी। अग्निशिखम्—कुङ्कुमं, कुसुम्भञ्च। १५. अग्निशिखा—केसर और कुसुम (बर्रें)। अजशृङ्गी—मेषशृङ्गी, कर्कटशृङ्गी च। १६. अजशृङ्गी—मेढ़ासिङ्गी और काकड़ासिङ्गी। प्रियङ्गु—फलिनी, कङ्गुश्च। १७. प्रियङ्गु—फूलप्रियङ्गु और कंगुनी। भृङ्गः—भृङ्गराजः, त्वक् च। १८. भृङ्ग—भांगरा और तज। समङ्गा—मञ्जिष्ठा, लज्जालुश्च। १. वसुक पर्याय श्वेतार्क (मन्दार) का होने से यहाँ रक्तार्क के स्थान पर श्वेतार्क होना चाहिये। २. क्षारलवण के लिये वसुक पर्याय मूल में नहीं है। ध. नि. ने. वसुक पर्याय ‘उद्भिदलवण’ के लिये दिया है। ६३ भाव. I