भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्षुवर्गः ९४३ अथ नवीनगुडस्य गुणानाह गुडो नवः कफश्वासकासकृमिकरोऽग्निकृत् ।।२७।। नवीन गुड़—कफ, श्वास, कास तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला एवम् जठराग्नि की वृद्धि करने वाला होता है। [२७] अथानुपानभेदेन गुडस्य गुणानाह श्लेष्माणमाशु विनिहन्ति सहार्द्रकेण पित्तं निहन्ति च तदेव हरीतकीभिः । शुण्ठ्या समं हरति वातमशेषमित्थं दोषत्रयक्षयकराय नमो गुडाय ।।२८।। अनुपान भेद से गुड़ के गुण—गुड़ यदि अदरख के साथ सेवन किया जाय तो कफ को शीघ्र नष्ट करता है। और हरीतकी (हर्रे) के साथ सेवन करने से पित्त को दूर करता है। एवम् सोंठ के साथ गुड़ का सेवन करने से समस्त वातसम्बन्धी विकारों को दूर करता हैं। इस प्रकार से तीनों दोषों को दूर करने वाले गुड़ के लिये नमस्कार है अर्थात् तीनों दोषों को दूर करने से गुड़ ओषधियों में सर्वोत्तम है। [२८] अथ खण्डस्य गुणानाह खण्डन्तु मधुरं वृष्यं चक्षुष्यं बृंहणं हिमम् । वातपित्तहरं स्निग्धं बल्यं वान्तिहरं परम् ।।२९।। खण्ड—मधुर रसयुक्त, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), शीतवीर्य, वात तथा पित्त नाशक, स्निग्ध, बलकारक एवम् अत्यन्त वमन को दूर करने वाला होता है। [२९] खण्डमिति प्रसिद्धं (खांड) ।।२९।। यहाँ पर "खण्ड" इस पद से लोक प्रसिद्ध "खांड" का ग्रहण करना चाहिये। [२९] अथ शर्करा (‘‘चीनी’’ इति लोके) । तस्या लक्षणगुणानाह खण्डन्तु सिकतारूपं सुश्वेतं शर्करा सिता । सिता सुमधुरा रुच्या वातपित्तास्रदाहहृत् । मूर्च्छार्च्छदिज्वरान्हन्ति सुशीता शुक्रकारिणी ।।३०।। शर्करा (‘‘चीनी’’ इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—जो खाँड बालू के समान तथा श्वेत हो उसे ‘‘शर्करा’’ अथवा ‘‘सिता’’ कहते हैं। चीनी—अति मधुर, रुचिकारक, वात, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाली, अतिशीतल, शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवम्—मूर्च्छा, वमन तथा ज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [३०] अथ पुष्पसिता सितोपला च (फूल से बनाई हुई चीनी और मिश्री) । तयोर्गुणानाह भवेत्पुष्यसिता शीता रक्तपित्तहरी लघुः । सितोपला सरा लघ्वी वातपित्तहरी हिमा ।।३१।। पुष्पसिता (फूलों से बनाई हुई चीनी)—शीतल, लघु एवम् रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है। सितोपला (मिश्री)—सारक, लघु, शीतवीर्य एवम् वात तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [३१] अथ मधुखण्डगुणानाह मधुजा शर्करा रूक्षा कफपित्तहरा गुरुः । छर्द्यतीसारतृड्दाहरक्तहृत्तुवरा हिमा ।।३२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA