भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० भावप्रकाशनिघण्टुः इससे मूत्रादि में दुर्गन्ध नहीं आती। इसे पूयस्राव बंद होने के २ हफ्ते बाद तक देना चाहिये जिससे फिर से न हो। इसमें इलायची एवं वंशलोचन के साथ या सोंठ या अजवायन के फांट के साथ भी इसका प्रयोग किया जाता है। (२) जीर्ण बस्तिशोथ (Cystitis), गवीनीमुख शोथ (Pyelitis-पाइलाइटिस्), बस्ति के राजयक्ष्मा उपसर्ग से यदि बार बार पेशाब होती हो एवं मूत्रकृच्छ्र में इसको बताशे में डालकर दूध के साथ देते हैं। यह क्षारीय मूत्र में ही प्रतिदूषक का कार्य करता है इसलिये साथ में क्षारीय औषधों का प्रयोग आवश्यक है। (३) दुर्गन्धित कफयुक्त कास में २-३ बूँद बताशे पर डालकर देते हैं। (४) खुजली (पामा-Scabies) में इसको लगाने से लाभ होता है। कर्णशूल, दंतशूल एवं शोथ आदि पर तथा अनेक चर्मरोगों में इसका स्थानिक उपयोग किया जाता है। नाक पर की फुन्सियों पर दुगुने सरसों के तेल में मिलाकर इसे लगाते हैं। चन्दन के बीज-पेसरी के रूप में गर्भपात के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ मा०, तैल ५-१५ बूँद । अथ पीतचन्दनम् । (कलम्बक इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कालीयकं' तु कालीयं पीताभं हरिचन्दनम् ॥ १४ ॥ हरिप्रियं कालसारं तथा कालानुसार्यकम् । कालीयकं रक्तगुणं विशेषाद् व्यङ्गनाशनम्॥१५॥ पीत चन्दन अर्थात् जिसे लोक में 'कलम्बक' कहते हैं उसके नाम तथा गुण-कालीयक, कालीय, पीताभ, हरिचन्दन, हरिप्रिय, कालसार तथा कालानुसार्यक ये सात पीले चन्दन के संस्कृत नाम हैं। पीलाचन्दन-गुणों में रक्तचन्दन के समान ही होता है किन्तु विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से व्यङ्ग (मुख की झाँई) को भी दूर करने वाला होता है ॥ १४-१५ ॥ ७ पीतचन्दन हि०-पीतचन्दन, पीला चन्दन, कलंबक । बं-कलंबा । म०-पिंवळे चन्दन । फा०-संदल अबियज । नवीन औद्भिदी विदों के अनुसार पीत चन्दन का स्वतन्त्र कोई वृक्ष नहीं पाया जाता। ध० नि० एवं भावप्रकाश में उत्तम श्वेत चन्दन के विषय में लिखा है कि 'कषे पीतम्', अर्थात् घिसने पर जो पीतवर्ण का हो वह उत्तम श्वेत चन्दन होता है। इसी प्रकार ध० नि० में 'मलयोत्थम् पीतकाष्ठम् चतुर्थं हरिचन्दनम्', लिखा है जिससे ज्ञात होता है कि पीतचन्दन मलयपर्वत पर ही होता है। श्वेत चन्दन का उत्पत्ति स्थान भी मलय पर्वत दिया हुआ है। इस प्रकार उत्पत्ति स्थान एवं घिसने पर पीतवर्ण दोनों चन्दनों के एक ही हैं केवल ऊपर से देखने में पोत चन्दन कुछ अधिक पीला तथा श्वेत चन्दन पीताभ श्वेत होता है। इसलिये यदि उत्तम पीतवर्ण के काष्ठसार को पीतचन्दन एवं कुछ श्वेत वर्ण के काष्ठसार को श्वेत चन्दन मान लिया जाय तो पीत चन्दन की संगति लग सकती है। १. कलम्बकं इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः १६१ दूसरा द्रव्य जिसके तरफ ध्यान जाता है वह है कलंबा (Calumba) । यह अफ्रीका में होनेवाली एक लता जेटिओहाइझा पामेटा (Jateorhiza palmata Miers; Fam. Menisperma- ceae) के पीतवर्ण के मूल के टुकड़े हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा में तिक्त पौष्टिक एवं दीपन द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह भारत में भी लगाई हुई मिलती है एवं इसका भारतीय प्रतिनिधि है 'झाड़ की हलदी' (पृष्ठ १२२) जिसको दक्षिण में दारुहरिद्रा के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस भारतीय द्रव्य को सीलोन कलंबा या नकली कलंबा भी कहा जाता है। दारूहरिद्रा के पर्यायों में भी 'कालीयक' आता है। इन बातों से ऐसा आभास होता है कि संभवतः 'झाड़ की हलदी' (नकली कलंबा) या कलंबा पीतचन्दन हो । अथ रक्तचन्दनम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह रक्तचन्दनमाख्यातं रक्ताङ्गं क्षुद्रचन्दनम् । तिलपर्णं रक्तसारं तत्प्रवालफलं स्मृतम् ॥ १६ ॥ रक्तं शीतं गुरु स्वादुच्छर्दितृष्णाऽस्रपित्तहृत् । तिक्तं नेत्रहितं वृष्यं ज्वरव्रणविषापहम् ॥ १७ ॥ लाल चन्दन के नाम तथा गुण-रक्तचन्दन, रक्ताङ्ग, क्षुद्रचन्दन, तिलपर्ण, रक्तसार और प्रवालफल ये सब लाल चंदन के संस्कृत नाम हैं। लाल चन्दन-शीतवीर्य, गुरु, स्वादु तथा तिक्त रस युक्त तथा वमन, प्यास और रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। यह नेत्रों के लिये हितकर, वृष्य और ज्वर, व्रण तथा विष को दूर करने वाला होता है ॥ १६-१७ ॥ ८ लालचन्दन हि०-लाल चंदन, रक्तचंदन । बं, म०-रक्तचंदन । गु०-रतांजली । ते०-रक्तचंदनम् । ता०- शेन् चंदनम् । पं, मा०-लाल चंदन । मला०-रक्तचंदैनम् । फा०-संदले सुर्ख । अ०-संदले अहमर । अं०-Red Sanders Wood (रेड सॅण्डर्स वुड ); Red Sandal Wood (रेड सॅण्डल वुड) । ले०-Pterocarpus santalinus, Linn. f. (प्टेरोकार्पस् सॅन्टैलिनस्, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कर्नूल के दक्षिण भाग एवं चिंगलपुट में १५०० फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह दक्षिण भारत तथा फिली पाइन द्वीपों में नैसर्गि- क रूप में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-२५ फुट तक ऊँचा होता है। छाल-कालापन युक्त भूरे रङ्ग की, लकड़ी-दृढ़ तथा काष्ठसार-अत्यंत कठिन एवं कालापन युक्त लाल रंग का होता है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः पत्रक तीन, १½ -२ इञ्च लम्बे, गोलाई युक्त अंडाकार एवं कुण्ठिताग्र होते हैं। पत्तों के अधोपृष्ठ हल्के वर्ण के एवं मृदु रोमश होते हैं। फूल-अल्प, पीताभ श्वेत एवं सवृंतकाण्डज गुच्छों में आते हैं। फलियाँ- करीब १½ इञ्च व्यासकी, टेढ़ी, आधार की तरफ कम चौड़ी एवं छोटे से डंठल से युक्त होती हैं। इसके काष्ठसार का औषध में व्यवहार किया जाता है। यह गहरे काळे से लाल रंग का, अत्यंत कठोर, वजन में भारी एवं रेशेदार होता है। यह लम्बाई में आसानी से टूट जाता है। इसके सफाई से कटे हुये अनुप्रस्थ विच्छेद में (Transverse section) में वार्षिक चक्र (Annual rings) नहीं होते किन्तु गहरे रंग की घन काष्ठतंतुओं (Wood fibres) की स्पर्श समतलीय (Tangential) पट्टियाँ (Bands) होती हैं जो कम चौड़ी, हल्के रंग की काष्ठ तंतुभित्तिक (Wood parenchyma) की करीब करीब संतत पट्टियों से एकांतरित रहती हैं। इन