भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 143 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

१६२ भावप्रकाशनिघण्टुः पट्टियों के अन्दर के किनारों पर महावाहिनियों (Vessels) दूर-दूर पर विन्यस्त रहती हैं। इन पट्टियों को समकोण में काटती हुई अत्यंत महीन, हल्के रंग की मज्जक किरणें (Medullary rays) होती हैं जो १० गुना बड़ा करके ही देखी जा सकती हैं। इसका बुरादा बाजार में मिलता है। इससे मद्यसार का रंग गहरा लाल हो जाता है लेकिन जल में बहुत कम इसका भाग घुलता है। इसमें गन्ध नहीं होती तथा स्वाद कुछ कसैला होता है। नोट-यद्यपि इसे रक्तचंदन कहा गया है तथापि इसमें चंदन के समान सुगंध नहीं होती। रा. नि. में एक सुगंधि युक्त लालचंदन का उल्लेख 'हरिचंदन' नाम से किया है लेकिन यह भी लिखा है कि यह दिव्य होता है एवं दुर्लभ होता है। कुछ लोगों ने रक्तचंदन से पतंग का ग्रहण किया है क्योंकि वह भी रक्तचंदन से मिलता-जुलता होता है लेकिन वह इस वृक्ष से अलग वृक्ष है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। 'निघण्डुआदर्श' में कुचंदन का ले० नाम अॅडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन. (Adenanthera pavonina Linn.) बं०-रक्तकंबल; बम्ब०-थोरलीगुञ्ज, वाल; हि०- बड़ी गुमची, रक्तचंदन लिखकर 'वनौषधि दर्पण' से उद्धृत उसकी टीका में लिखा है कि 'कुचंदन यह रा. नि. का पतंग है जिसका रक्तचंदन के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।' लेकिन पतंग का वृक्ष अलग होता है जिसे सिझल्पिनिआ सप्पन कहते हैं। बड़ी गुमची को रक्तचंदन अथवा पतंग मानना उचित नहीं। इस प्रकार रक्तचंदन एवं पतंग के अलग अलग वृक्ष पाये जाते हैं। केवल रा. नि. का सुगंध युक्त लालचंदन (हरिचंदन) अभी तक नहीं प्राप्त हो सका है। संभव है वनस्पतियों का व्यापक अनुसंधान होने पर इस विषय का अंतिम निर्णय किया जा सके। रासायनिक संगठन-इसमें संन्टॅलिन् (सॅन्टॅलिक एसिड) [Santalin (santalic acid)] नामक एक रंजक द्रव्य तथा डेसुऑक्सि संन्टेलिन् नामक एक अन्य पदार्थ पाया जाता है। सॅन्टॅलिन् से मद्यसार में रक्त के समान लाल रंग, ईथर में पीला, अमोनिया एवं दाहक क्षार में नीललोहित रंग आता है। यह जल में नहीं घुलता। इसके अतिरिक्त लालचन्दन में प्टेरोकार्पिन (Ptero- carpin), होमो-प्टेरोकार्पिन (Homo-pterocarpin) एवं सॅन्टालू ये तीन रंगहीन रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें मद्यसार में घुलनशील पदार्थ २% से कम एवं राख २% से अधिक न होनी चाहिये। इसके मद्यसारीय घोल से इसके रंग को खनिज अम्लों (Mineral acids) के द्वारा निस्सादित (Precipitated) किया जा सकता है। गुण और प्रयोग-रक्तचन्दन शीतल, बल्प, सौम्य एवं ग्राही है। इसका बाह्य लेप शीतल, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, रक्तदोष, रक्ताशं, रक्तपित्त, अतिसार, संग्रहणी एवं शिरःशूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है। रंजक द्रव्य के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाता है। (१) शोथ, फोड़े, व्रण, अन्हौरी तथा शिरःशूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में जल में घिसकर लगाते हैं। पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर होती है। (२) ग्राही होने के कारण अन्य औषधों के साथ इसका काथ अतिसार एवं संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। (३) रक्ताशं में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं। (४) इसके मद्यसारीय घोल से खनिज अम्लों के द्वारा इसके रंजक द्रव्य को निस्सादित कर लिया जाता है जिसका उपयोग रंजन के लिये करते हैं। कंपाउण्ड टिंक्चर आफ् लह्वेण्डर में इसी का रंग होता है। मात्रा-४२०-८२०।


कर्पूरादिवर्गः १६३ बड़ी गुमची Adenanthera pavonina Linn; Fam. Leguminosae (अँडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन, लेग्यूमिनोसी)-यह पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमो पेनिन्सुला में पाया जाता है। इसके बीजों का प्रयोग फोड़े तथा सूजन आदि पर किया जाता है तथा छाल का उपयोग आमवात एवं रक्तष्ठीवन में किया जाता है। अथ पतङ्गम् (बकम्) । तस्य नामानि गुणांश्चाह पतङ्गं रक्तसारञ्च सुरङ्गं रञ्जनं तथा । पट्टराङ्कम मख्यातं पट्टरञ्च कुचन्दनम् ॥ १८ ॥ पतङ्गं मधुरं शीतं पित्तश्लेष्मव्रणास्रनुत् । हरिचन्दनवज्ज्ञेयं विशेषाद्दाहनाशनम् ॥ १९ ॥ पतङ्ग के नाम तथा गुण-पतङ्ग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टराङ्ग, पट्टर और कुचन्दन ये सब पतङ्ग के संस्कृत नाम हैं। पतङ्ग-मधुररस युक्त, शीतवीर्य एवम् पित्त-कफ, व्रण और रक्तदोष को दूर करने वाला होता है। यद्यपि पतङ्ग का गुण पीले चन्दन के समान ही होता है तथापि इसे विशेष करके दाहनाशक समझना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ ९ पतङ्ग हि०-पतङ्ग, बक, बकम काठ, आल। बं०-बकम काष्ठ, बोकोम । म०, गु०-पतङ्ग । ते०-बुक- पुचेट्टु। ता०-वरत्तंगि, शप्पङ्गु। मला०-चप्पनम् । फा०, अ०-बकम । अं०-Sappan Wood (सॅप्पन वुड)। ले०-Caesalpinia sappan Linn. (सिझल्पिनिया सँप्पन) । Fam. Caesalpiniaceae (सिझल्पिनिएसी) । यह पूर्व और पश्चिम प्रायद्वीप एवं मद्रास प्रान्त में अधिक पाया जाता है। बंगाल और बिहार के किसी किसी स्थान में देखने में आता है। इसका वृक्ष छोटा एवं कांटेदार होता है। लकड़ी दृढ़, सारभाग-नारङ्गी या चमकीले लाल रङ्ग का होता है। पत्ते-संयुक्त, उपपक्ष ८ से १२ जोड़े; पत्रक-१० से १८ जोड़े, ३/४ इन्च तक लंबे, आयताकार, न्यूनाधिक विनाल, गोलाश्म एवं मध्य शिरा के दोनों तरफ के भाग असमान होते हैं। फूल-किंचित पीताभ रंग के आते हैं। फलियां-चपटी, ३-४ इन्च x १ ३/४-२ इन्च बड़ी होती हैं। प्रत्येक में ३-४ बीज होते हैं। इसके काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। यह लाल- चन्दन जैसी, फीके लाल रंग की, कड़ी एवं निर्गन्ध होती है। बाजार में सिंगापुरी, धुनसरी और सिलीनी इन तीन नामों से इसकी लकड़ी मिलती है। रासायनिक संगठन-इसमें सॅप्पन रेड (Sappan red) नामक एक लाल रंग, मैलिक एवं टॅनिक एसिड तथा उड़नशील तैल आदि पाये जाते हैं। इसमें का रंग होर्मैटोक्साइलिन (Haema- toxylin) से मिलता-जुलता होता है तथा ईथर, मद्यसार एवं जल में घुल जाता है। पतंग का कायकारी सत्व हीमॅटीन (Haematin) से मिलता-जुलता तथा ब्रॅसिलिन (Brasilin) के समान होता है। इसकी राख में एक रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो यदि आसुत करके पोटाँश के साथ गलाया जाए तो रीसॉसिन (Resorcin) प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिये उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। (१) फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका काथ पिलाने से 13 लाभ होता है। १३ भा० नि०