भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ भावप्रकाश निघण्टुः ( २ ) पुराने व्रणों पर इसके महीन चूर्ण का अवचूर्णन करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं तथा स्थानिक रक्तस्राव भी बन्द होता है। इसके काथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है। श्वेत प्रदर में इसके काथ की बस्ति दी जाती है। पतंग एवं बनफ़्शा के काथ से मांसांकुरों का प्रक्षालन करने से पीडा एवं दुर्गन्धि कम हो जाती है। लिचेन (Lichen) नामक त्वग्रोग में इसे पीस कर इसका लेप करते हैं। मात्रा—१-२ माशा ।
अथ सर्वेषां चन्दनानां मध्ये मलयजस्य श्रेष्ठतामाह चन्दनानि तु सर्वाणि सदृशानि रसादिभिः । गन्धेन तु विशेषोऽस्ति पूर्वंः श्रेष्ठतमो गुणैः ॥ सभी प्रकार के चन्दनों में मलयागिरी चन्दन की उत्तमता-यद्यपि रसादिकों में प्रायः सभी प्रकार के चन्दन समान ही होते हैं, उनमें विशेषता केवल गन्ध की ही रहती है। तथापि उनमें सर्वप्रथम जो मलयागिरी चंदन है, वही गुणों में सर्वश्रेष्ठ होता है ॥ २० ॥
अथागुरु कृष्णागुरु च ( अगर, काला अगर ) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह अगुरु प्रवरं लोहं राजाहं योगजं तथा । वंशिकं कृमिजं वाऽपि कृमिजग्धमनार्यकम् ॥ २१ ॥ अगुरुष्णं कटु स्वच्यं तिक्तं तीक्ष्णञ्च पित्तलम् । लघु कर्णाक्षिरोगघ्नं शीतवातकफप्रणुत् ॥२२॥ कृष्णं गुणाधिकं तत्त लोहवद्वारि मज्जति । अगुरुप्रभवः स्नेहः कृष्णागुरुसमः स्मृतः ॥ २३ ॥ अगर तथा काले अगर के नाम और गुण एवं अगर के तेल के गुण-अगुरु, प्रवर, लोह, राजाई, योगज, वंशिक, कृमिज, कृमिजग्ध और अनार्यक ये सब अगर के संस्कृत नाम हैं। अगर- उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, त्वचा के लिये हितकारी, तीक्ष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् कान व नेत्र संबंधी रोगों को दूर करने वाला तथा शीत, वात व कफ को नष्ट करने वाला होता है। काला अगर-यह अगर की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है तथा पानी में डालने से लोहे की भांति डूब जाने वाला होता है। अगर का तेल-अगर से निकाला हुआ तेल गुणों में काले अगर के समान ही समझा जाता है ॥ २१-२३ ॥ १० अगर हि०-अगर, काला अगर । वं०-अगर काष्ठ, अगरु चन्दन । म०, गु०-अेगर । पं०-ऊद, ऊदफारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णाअगरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood ( ईगल वुड ) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. ( एक्विलेरिया ऍगोलोचा राक्स.) Fam. Thymelaea- ceae ( थाइमेलिएसी )। यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहृट आदि प्रान्तों में पाया जाता है ।
कर्पूरादिवर्गः १६५ इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाइरित रहता है। काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हल्की, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत, एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय ( Radial ) वाहिकाओं ( Vessels ) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है। काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४ ५/८-२ इन्च बड़े, आयताकार मालाकार, या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने, तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-१५-२ इन्ध लम्बे, अभि- अंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं। अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं कहीं पाया जाता है। यह एक विशेष प्रकार के फफूंद ( Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है। प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है। विकृत भाग कालासा तेलिया हो जाता है। जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है। जहां शाखायें विभक्त होती हैं वहां यह अधिक होता है। सिलहृट का अगर अच्छा होता है। इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है। इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है। यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दिया- सलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है। इसका स्वाद कडुवा, कसैला तथा तेलिया मालूम होता है। इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है। सिलहूट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है। यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है। नोट-भारतवर्ष में प्राचीन कालने अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप१ के रूप में किया जा रहा है। अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है। २ सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू. अ. ४५)। सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगरु की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझाना चाहिये (सू. अ. २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल ( ६न ) होता है तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है। गुण और प्रयोग- अगर उष्ण, सुगन्धि, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभ- दायक है। (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अकींगुरुगुहूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)