भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ भावप्रकाशनिघण्टुः एवं मरोड़ में मालिश किया जाता है। विसूचिका में हाथ एवं पैरों की ऐठन में भी इसके मलने से लाभ होता है। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—बंबई जायफल, रामफल या जंगली जायफल नाम से मायूरि- स्टिका मलबारिका लॅम (Myristica malabarica Lam.) के फलों को लोग इसके स्थान पर व्यवहार करते हैं इसके वृक्ष कोंकण, कर्नाटक तथा उत्तर मलबार प्रान्तों में पाये जाते हैं। इससे जो पत्री निकलती है उसे रामपत्री या बंबई की जायपत्री कहते हैं। ये जंगली जायफल अधिक लंबे, कम चौड़े, किंचित् मुलायम एवं करीब २ गंधहीन होते हैं। ये जायफल की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं। कभी २ खराब जायफल तथा मिट्टी आदि मिलाकर सांचे के द्वारा बने हुवे नकली जायफल भी बाजार में बिकते हैं। मात्रा—चूर्ण २-८ र०; तैल १-५ बूंद ।
अथ जातीपत्री । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलस्य त्वक् प्रोक्ता जातीपत्री भिषग्वरैः ॥ ५६ ॥ जातीपत्री लघुः स्वादुः कटूष्णा रुचिवर्णकृत् । कफकासवमिश्रासतृष्णाकृमिविषापहा ॥५७॥ जावित्री के नाम तथा गुण—वैद्यों में जो श्रेष्ठ हैं वे लोग 'जायफल' के छिल्के को ही 'जावित्री' कहते हैं। जातीपत्री या जातिपत्री और जातिकोष आदि संस्कृत नाम 'जावित्री' के हैं। जावित्री-लघु, स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, रुचिकारक तथा वर्णकारक होती है एवम् यह कफ, खांसी, वमन, श्वास, तृष्णा, कृमि और विषविकार इन सबों को दूर करने वाली भी होती है ॥ २१ जावित्री हि०-जावित्री, जायपत्री। बं०-जायित्री, जैत्री । म०-जायपत्री । गु०-जावंतरी । क०-जाय- पत्री । ते०-जातिपत्री । फा०-बजब़ाज । अ०-बस्वास (सः)। अं०-Mace (मेस)। ले०- Myristica fragrans Houtt (मायूरिस्टिका फ्रॅग्रेन्स आउट)। Fam. Myristicaceae (मायूरिस्टिकेसी)। जिस वृक्ष से जायफल उत्पन्न होता है उसी से जावित्री भी उत्पन्न होती है। इस वृक्ष के वास्तविक फल के भीतर के बीज (जायफल) से लिपटा हुआ झालरङ्ग का जालीदार जो वेष्टन दिखाई देता है वही जावित्री है। अन्य वानस्पतिक वर्णन जायफल के साथ पहले किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें जायफल की तरह ही एक उड़नशील तैल ८-१७% पाया जाता है। इसके अतिरिक्त स्थिर तैल, राल, वसा, शर्करा, डेक्स्ट्रीन एवं गोंद आदि पदार्थ इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके गुण जायफल के समान होते हैं। यह दीपन, पाचन, वातानु- लोमक, कफहर, रुचिकर, वर्ण्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग कास, कफयुक्त श्वास, क्षयरोग, मन्दज्वर, वमन, आंतों के जीर्ण विकार, विसूचिका एवं कृमि आदि में किया जाता है। मात्रा—२-८ र० ।
कर्पूरादिवर्गः २१६ अथ लवङ्गम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञं श्रीप्रसूनकम् । लवङ्गं कटुकं तिक्तं लघु नेत्रहितं हिमम् ॥ ५८ ॥ दीपनं पाचनं रुच्यं कफपित्तास्रनाशनम् । तृष्णां छर्दि तथाऽऽध्मानं शूलमाशु विनाशयेत् । कासं श्वासञ्च हिक्काञ्च क्षयं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ५९ ॥ लौंग के नाम तथा गुण—लवङ्ग, देवकुसुम, श्रीसंज्ञ (लक्ष्मीवाचक सम्पूर्ण शब्द लवङ्गवाचक हैं) और श्रीप्रसूनक ये सब 'लौंग' के संस्कृत नाम हैं। लौंग—कटु तथा तिक्त रस युक्त, लघु, नेत्र के लिये हितकर, शीतवीर्य, अग्नि को दीप्त करने वाली, पाचक एवम् रुचिकारक होती है तथा कफ, पित्त, रक्तविकार, तृषा, वमन, आध्मान, शूल, कास, श्वास, हिचकी एवम् क्षय इन सब रोगों को प्रायः शीघ्र तथा निश्चय दूर करती है ॥ ५८-५९ ॥ लौंग हि०-लौंग, लौंग, लवंग । बं०, म०-लवंग । गु०-लवींग । क०-लवंग कलिका, लंग । ते०-करवप्पू, लवंगमु । ता०-किरांडु । मा०-लौंग । फा०-मेखक । अ०-करन्फुल, करन्फूल । अं०-Cloves (क्लोव्स्) । ले०-Caryophyllus aromaticus Linn. (कॅरियोफालस् एरोमॅटिकस् लिन.); Eugenia aromatica Kuntze (यूजेनिया एरोमॅटिका कुंझे); Syzy- gium aromaticum (Linn.) Merr. & L. M. Perry (सिझिगियन् एरोमॅटिकम् (लिन.) मेर. पेरी) । Fam. Myrtaceae (मिर्टेसी)। इसका वृक्ष मोलक्का द्वीप में नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होता है। झंजिबार तथा पेम्बा में इसकी बहुत खेती की जाती है तथा करीब ९०% लौंग की पूर्ति वहीं से होती है। पेनांग, मेडागास्कर, मॉरिशस् एवं सीलोन आदि स्थानों में भी इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में दक्षिण भारत में अल्प मात्रा में इसकी खेती का प्रयत्न किया गया है। इसके वृक्ष-प्रायः १२-१३ हाथ ऊँचे और सतेज होते हैं तथा देखने में बहुत सुहावने लगते हैं। काण्ड-इसकी लकड़ी कठोर होती है तथा इस पर धूसर वर्ण की चिकनी छाल होती है। पत्ते-अभिमुख, सवृन्त, ४ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-आयताकार; फलकमूल एवं अग्र दोनों पतले एवं लम्बे; पत्रतट अखण्ड किन्तु लहरदार एवं मध्य नाड़ी के दोनों तरफ अनेक समानान्तर नाडियाँ होती हैं। पत्ते चमकीले हरे रंग के होते हैं तथा मसलने से इनमें सुगन्ध आती है। पुष्प-हलके नीलारुण (Purple) रंग के, ६ मि० मि० लम्बे तथा अत्यन्त तीव्र आह्लादकारक सुगन्ध वाले होते हैं। इस वृक्ष की सुखी हुई पुष्प कलिकाओं को लौंग कहा जाता है। ये पहले हरी होती हैं। बाद में जब इनका रंग किरमिजी हो जाता है तब इन्हें वृक्षों से तोड़ कर सुखा लिया जाता है। इसी समय इनमें तैल की मात्रा अधिकतम रहती है। लौंग १०-१७′५ मि० मि० लम्बी तथा रक्ताभ बादामी रंग की होती है। इसके नीचे का भाग जो हायपैन्थियम् (Hypanthium) से बना होता है वह चौकोर तथा कुछ चपटा होता है तथा नख से दबाने पर उसमें से तैल निकलता है एवं इसके अग्र भाग में दो कोष रहते हैं जिनके अन्दर अक्षलग्न जरायु से लगे हुए अनेक बीजभव (Ovule) होते हैं। लौंग के ऊपर के भाग में मोटे, नुकीले तथा फैले हुए ४ बाह्यदल होते हैं जिनके बीच में गुम्बजाकृति हल्के रंग के, न फैले हुए, पतले तथा अनियतारूढ़ (Imbricate) ४ अन्तर्दल होते हैं। अन्तर्दलों के अन्दर अनेक अन्दर की तरफ मुड़े हुए पुंकेशर होते हैं तथा एक स्त्री केशर होता है जिसका कुक्षिवृन्त सीधा तथा कड़ा होता है। लौंग में अत्यन्त तीव्र मसालेदार गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु होता है।