भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसमें १५-२०% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें ८५-९२% युजेनॉल (Eugenol, $C_{10} H_{12} O_2$) रहता है। इसके अतिरिक्त लौंग में टैनिन् (गैलोटैनिक ॲसिड् १३%) एवं फाइटोस्टेरॉल सदृश एक कैरियोफाइलीन् (Caryophyllene) नामक गन्धहीन, स्वादहित, रंगहीन रवेदार पदार्थ पाया जाता है। लौंग के तैल में फेनॉल के समान युजेनॉल नामक एक महत्त्व का पदार्थ रहता है। इसके अतिरिक्त तैल में ॲसिटिल् युजेनॉल (Acetyl eugenol १०%), मेथिल् सॅलिसिलेट् (Methyl salicylate), मेथिल ॲमिलकीटोन् (Methylamylketone, $C_5 H_{11} COCH_3$); हॅनिलिन् (Vanillin), कॅरियोफाइलीन् (Caryophyllene) तथा फफ्यू'रॉल् (Furfurole, $C_5 H_4 O_2$) ये पदार्थ पाये जाते हैं। यह तैल ताजी अवस्था में रंगहीन या हलके पीले रंग का होता है लेकिन वह पुराना होने पर या खुला रखने पर गहरे रक्ताभ बादामी रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—लौंग सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, अग्निदीपक, उद्वेष्टनविरोधि, कफघ्न, मूत्रजनन, रुचिकर, दुर्गन्धनाशक, श्वेतकणवर्धक, वृष्य एवं कृमिघ्न है। यह स्थानिक वेदनाहर, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है। इसका उपयोग उदरशूल, आध्मान, अजीर्ण, कास, तृष्णा, वमन, विसूचिका, क्षय तथा सुगन्धि पदार्थ के रूप में मसाले आदि में किया जाता है। (१) लौंग के फांट (४० में १) को १ से २ तोला की मात्रा में विसूचिका में प्यास की शान्ति के लिये देते हैं। इससे जी मिचलाना भी कम होता है तथा वमन कम हो जाता है। गर्भिणी- वमन में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाया जाता है। (२) अजीर्ण, आध्मान एवं उदरशूल आदि में इसका फांट या चूर्ण खिलाया जाता है। (३) गले की सूजन, कुकास, कास, मुख एवं श्वास की दुर्गन्ध तथा जीमिचलाना आदि में लौंग दिये पर भून कर या उसी तरह मुख में रख कर चूसते हैं। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं। (४) प्रतिश्याय एवं मस्तकश्लूल में लौंग को गरम जल में घिस कर ललाट पर लगाते हैं। लौंग का तैल—इसके गुण भी लौंग के समान ही होते हैं। इसका उत्सर्ग वृक्क, चर्म, श्वसनसंस्थान, आंत्र तथा यकृत् आदि से होता है। चरक-सुश्रुत में इसका उल्लेख नहीं मिलता। सिगरेट के लिये प्रयुक्त तम्बाकू को सुगन्धित करने के लिये जावा, सुमात्रा तथा जापान आदि स्थानों में इसका उपयोग किया जाता है। अनेक ओषधों को सुगन्धित करने के लिये तथा विरेचक ओषधों के साथ मरोड़ आदि न हो इसलिये इसका उपयोग करते हैं। मच्छर भगाने के लिये सोते समय इसे थोड़ा सा खुले अङ्गों पर लगा देने से मच्छर नहीं काटते। तैलों को सुगन्धित करने के लिये तथा पदार्थ संरक्षण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। इसका बाह्य प्रभाव कपूर के सदृश होता है। यह स्थानिक उत्तेजक, त्वग्दागकारक, प्रतिशोथक, अल्पवेदनाहर, कृमिघ्न, सड़न को रोकने वाला एवं प्रतिदूषक है। (१) मिश्री पर ढाल कर या गोंद के साथ मिश्रण के रूप में इसको आन्त्रिकशूल तथा आध्मान में खिलाते हैं (२) क्षयजकास में कफ कम करने के लिये इसको खिलाते हैं। (३) दन्तशूल में दांत के गड्ढे में इसका फाहा रखने से बहुत लाभ होता है। सन्धिपीडा, गुंमसी, कटिशूल एवं वातनाडीशूल आदि में इसको लगाया जाता है। तिलाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। कर्पूरादिवर्गः २२१ प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—बाजार में तैल निकाली हुई लौंग भी बिकती है। इसे नख से दबाने पर तैल नहीं निकलता तथा उबले जल में डालने पर यह तैरती है एवं इसका रंग भी कुछ हलका रहता है। लौंग के चूर्ण में डंठल के टुकड़े का चूर्ण मिला दिया जाता है। लौंग के पक फल भी मदरक्लोह्वस (Mother cloves) नाम से बिकते हैं लेकिन उनमें तैल बहुत कम रहता है तथा उनके बीज में रहने वाले बड़े स्टार्च के कण से इनकी पहचान की जा सकती है। टूटे हुए पुंकेसर, अन्तर्दल एवं विकसित फूल जिनके पुंकेसर एवं अन्तर्दल निकाल लिये गये हों इनका मिश्रण लौंग के चूर्ण में व्यापारी कर देते हैं। लौंग में १५% से कम तैल नहीं होना चाहिये। मात्रा—चूर्ण १-२॥ रत्ती; तैल १-३ बूंद। अथ स्थूलैला (बड़ी इलायची) तस्या नामानि गुणांश्चाह एला स्थूला च बहुला पृथ्वोका त्रिपुटाऽपि च ॥६०॥ भद्रैला बृहदेला च चन्द्रबाला च निष्कुटिः । स्थूलैला कटुका पाके रसे चानलकूल्लघुः १ ॥ रूक्षोष्णा श्लेष्मपित्तास्त्रकण्डूश्वासतृषाऽपहा । हृल्लासविषवस्त्यामयरशिरोरुग्वमिकासनुत् ॥६२॥ बड़ी इलायची के नाम तथा गुण—एला, स्थूला, बहुला, पृथ्वीका, त्रिपुटा, भद्रैला, बृहदेला, चन्द्रबाला, निष्कुटि तथा स्थूलैला ये सब संस्कृत नाम 'बड़ी इलायची' के हैं। बड़ी इलायची- पाक तथा रस (स्वाद) में कड़ु होती है एवं अग्निजनक, लघु, रूक्ष और उष्णवीर्य होती है। यह कफ, पित्त, रक्तविकार, कण्डू (खुजली), श्वास, तृषा, हृल्लास (वमन मालूम पड़ना अर्थात् जीमिचलाना), विष एवं बस्ति, मुख तथा शिर सम्बन्धी रोग, वमन तथा खांसी को दूर करने वाली होती है ॥६०-६२॥ २३ बड़ी इलायची हि०—बड़ी इलायची, पूर्वी इलायची, लाल इलायची। बं०—बड़ा इलाची। म०—मोठी एलची, मोठे वेलदोड़े। गु०—एलचा, मोटी एलची। तै०—पेद्दायेलकी। ता०—पेरेलम, पेरिय एलक्के। क०—डोड्डा एलाक्की। फा०—हीलकलों। अ०—काकुले कुबार, काकुले जंगी। अं०—Nepal or Greater Cardamom (नेपाल या ग्रेटर कार्डैमोग्); Amomum (अॅमोमम् )। ले०—Amomum subulatum Roxb. (एमोमम् सबुलॅटम् राक्स)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)। इसकी खेती नेपाल, बंगाल, सिक्किम तथा आसाम के पहाड़ी मार्गों के पास में गीली भूमि में की जाती है। इसका क्षुप-आमा हल्दी के समान होता है और उसकी जड़ के नीचे कन्द रहता है। पत्रदण्ड-३-४ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार, हरे एवं चिकने होते हैं। फूल-अवृन्तकान्डज ब्यूहों (Spike) में नलिकाकार सफेद रङ्ग के आते हैं। फल-किञ्चित लम्बाई लिये गोल, १ इञ्च तक लम्बे तथा लाल भूरे रङ्ग के होते हैं। बीज-शर्करायुक्त गाढ़े गूदे के कारण आपस में चिपके हुए अनेक बीज प्रत्येक कोष में होते हैं। १. 'चानिलकुल्लघुः' इति पाठो० अशुद्धम् ।