भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- चीनी दालचीनी बहुत ही आह्लादकारक एवं फलप्रद सुगन्धि द्रव्यों में से है। यह उष्ण, आमाशय के लिये उत्तेजक, वातानुलोमक एवं ग्राही है। यह सार्वदैहिक उत्तेजक की अपेक्षा स्थानिक उत्तेजक है। यद्यपि इसका स्वतंत्र प्रयोग कम किया जाता है तथापि इसके फांट या चूर्ण से हृल्लास दूर होता है तथा आध्मान में लाभ होता है। अतिसार में अन्य ग्राही औषधों के साथ तथा अन्य अनेक मिश्रणों में सहायक द्रव्य के रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-२३-१० २०। अथ दारुसिता (दालचीनी)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्वक्स्वाद्दी तु तनुत्वक्त्स्यात्तथा दारुसिता मता ॥ ६६ ॥ उक्ता दारुसिता स्वाद्दी तिक्ताचानिलपित्तहृत् । सुरभिः शुक्रलाबल्या मुखशोषतृषापहा ॥ ६७ ॥ दालचीनी के नाम तथा गुण- त्वक्, स्वाद्दी, किंवा त्वक्स्वाद्दी, तनुत्वक् तथा दारुसिता ये सब 'दालचीनी' के संस्कृत नाम हैं। दालचीनी-स्वादिष्ट, तिक्तरसयुक्त, वातपित्तनाशक, सुगन्धयुक्त, शुक्रजनक, बलकारक, ('वण्या' पाठान्तर में-शरीर के रङ्ग को सुन्दर करने वाली), मुखशोष तथा तृषा को दूर करने वाली होती है ॥ ६६-६७ ॥ २६ दालचीनी हि०-दालचीनी, दारचीनो । बं०-दारुचीनी । म०-दालचीनो । गु०-तज। ते०, मळ०-लवंग पत्ते । ता०-कद्रलवंग पत्ते । अ०-दारसीनी, किर्फा । फा०-दारचीनी । अं०-Cinnamon Bark (सिनेमोन् बार्क)। ले०-Cinnamomum Zeylanicum Blume (सिन्नेमोमम् झेलैनिकम्, ब्लूम) । Fam, Lauraceae (लॉरेसी)। इसके वृक्ष लंका तथा दक्षिणी भारत में पाये जाते हैं। लंका, दक्षिण भारत, मार्टिनिक्यू, कैने, जमेका, ब्राझील तथा सेचिलीस में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-साधारण ऊंचाई का एवं सदा हरित होता है। छाल-कुछ मोटी, चिकनी तथा हल्के रंग की होती है। छोटी शाखाएं कुछ दबी हुई एवं नये भाग चिकने रहते हैं किन्तु कलिकाएं महीन सिल्क की तरह रहती हैं। पत्ते-प्रायः विपरीत, कड़े तथा चर्मवत, ३-८ इञ्च लम्बे, १॥-३ इञ्च चौड़े, अण्डाकार या लट्वाकार-भालाकार, नुकीले अग्रयुक्त, चिकने, ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से कुछ हल्के एवं फलकमूल की तरफ तीक्ष्ण या गोलाई लिये हुए होते हैं। नाड़ियां-३-५ प्रधान नाड़ियां रहती हैं जिनके बीच महीन जालीदार नाड़ियां रहती हैं। पर्णवृन्त- ३-१ इञ्च लंबा तथा ऊपर से चपटा रहता है। पुष्प-बहुत एवं प्रायः पत्तों से लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में जो सिल्क की तरह मृदुरोमश होते हैं। पुष्पदंड (Peduncle) लंबे, प्रायः एक साथ गुच्छों में, चिकने या मृदुरोमश एवं पुष्पवृन्त (Pedicle) लम्बे होते हैं। परिपुष्प ५-६ मि० मि० लंबे; नलिका १ इञ्च लम्बी एवं दल मृदुरोमश, आयताकार या कुछ अभि-लट्‌वाकार, एवं प्रायः कुण्ठिताग्र रहते हैं। फल-१२.३-१७ से० मि० लंबे, आयताकार या लट्वाकार- आयताकार, शुष्क या किंचित मांसल, गहरे बैगनी रंग के एवं ८ मि० मि० व्यास के संवृद्ध घंटिकाकार परिपुष्प से घिरे हुये रहते हैं। १. वण्यां इति पाठः । कर्पूरादिवर्गः २२७ इस वृक्ष के झाड़ियों को काटने के बाद उत्पन्न नवीन प्ररोहों की सूखी हुई अन्दर की छाल को औषध के लिये लिया जाता है। इसे सीलोनी दालचीनी कहा जाता है। यह सर्वोत्तम दालचीनी होती है। इसकी एक साथ बंधी हुई लंबी जुड़ियां आती हैं। बाह्य सतह हल्के पीताभ भूरे रंग की एवं लंबाई में लहरदार रेखाओं से युक्त तथा प्रायः छोटे दागों या छिद्रों से युक्त होती है। अन्दर से यह गहरे रंग की एवं लम्बाई में हल्की धारियों से युक्त होती है। यह बहुत ही पतली, ०.५ मि० मि० मोटी एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसमें मनोहर गन्ध रहती है तथा इसका स्वाद उष्ण, मधुर एवं सुगन्धि रहता है। रासायनिक संगठन- सिलोनी दालचीनी में ०.५-१% उड़नशील तैल, टैनिन तथा गोंद ये पदार्थ पाये जाते हैं। दालचीनी का तैल नया रहने पर हल्के पीले रंग का रहता है जो पुराना होने पर रक्ताभ भूरे रंग का हो जाता है। इसमें दालचीनी जैसी ही गन्ध एवं स्वाद रहता है। इस तैल में ६०-७५% सिनेमैल्डिहाइड (Cinnamaldehyde), करीब १०% यूजेनॉल (Eugenol) एवं अल्प मात्रा में मेथिल्-एन्-अँमिल् कीटोन (Methyl-n-amyl ketone ), पी-साइमीन (p-cymene ), एल्-फेलैन्ड्रीन (l-phellandrene), एल्-अंल्फा-पिनीन (l-a-pinene), एल्-लिनैलूल (l-linalool), क्यूमिक अॅल्डिहाइड (Cumic aldehyde ), नोनिल् अॅल्डिहाइड (Nonyl aldehyde ), कँर्योफाइलीन (Caryophylline) एवं ब्यूट्रिक अॅसिड के ईस्टर (Esters of butyric acid ) ये पदार्थ पाये जाते हैं । दालचीनी के पत्तों में भी किञ्चित गहरे रंग का एक उड़नशील तैल पाया जाता है। लेकिन यह तैल दालचीनी के तैल से बिलकुल भिन्न है। इसमें कुछ लौंग जैसी तीव्र गन्ध आती है तथा आमवातादि में इसकी मालिश की जाती है। इसमें ७०-९५% यूजेनॉल रहने के कारण लौंग के तैल सदृश इसका उपयोग किया जा सकता है। दालचीनी के तैल में पत्तों के तैल की मिलावट की जाती है जिसकी पहचान उसमें की बढ़ी हुई यूजेनॉल की मात्रा एवं घटी हुई सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मात्रा से की जा सकती है। इसमें रासायनिक विधि द्वारा निर्मित सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मिलावट करते हैं जिसकी पहचान उसमें के क्लोरीन की उपस्थिति, बढ़े हुये विशिष्ट गुरुत्व, भुजायन देशना (Refractive index) एवं अॅल्डिहाइड से की जा सकती है। गुण और प्रयोग- दालचीनी उष्ण, सुगन्धि, वातानुलोमक, साधारण ग्राही, दीपन, पाचन, उत्तेजक, गर्भाशय उत्तेजक, स्तम्भन, शोणितस्थापक, श्वेतकणवर्धक, आक्षेपहर एवं कृमिघ्न है। दालचीनी का तैल वातानुलोमक, प्रतिदूषक, उत्तेजक, आर्त्तवप्रवर्त्तक, वातहर, वेदनाहर, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। (१) यह उत्तम दीपन होने के कारण इससे आमाशय रस की वृद्धि होकर अन्न का पाचन ठीक होता है तथा वायु का अनुलोमन होता है। आमाशय के रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आध्मान, मरोड़, आमाशयिक शूल एवं वमन में इसके तैल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। हृल्लास एवं वमन में इसकी चूसने से या इसके क्वाथ से लाभ होता है। अतिसार, पुरानी आंव एवं ग्रहणी आदि में इसके क्वाथ से शौच कम होता है, वायु नहीं होता एवं पचननलिका को बल मिलता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में आन्त्रिक प्रतिदूषक औषध के रूप में अन्य औषधों के साथ इसके तैल को देते हैं। इससे आध्मान नहीं होता । (२) राजयक्ष्मा दण्डाणु के उपसर्ग में तैल का व्यवहार किया जाता है। सिनेमिक् एसिड का परिणाम इन जन्तुओं पर होता है। क्षयजव्रण पर इसको लगाते हैं।