भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः
(३) गर्भाशय उत्तेजक होने के कारण प्रसूति के समय आवि वृद्धि के लिये पिपरामूल एवं भांग के साथ इसका प्रयोग करते हैं। अत्यार्तव में गर्भाशय की शिथिलता कम करने के लिये अशोक के साथ इसे देते हैं।
(४) रक्तस्राव में इसके क्वाथ से लाभ होता है। फुफ्फुस एवं गर्भाशय से रक्तस्राव में इसका प्रयोग करते हैं।
(५) प्रतिश्याय तथा एन्फ्लुएंजा में इसके तैल को मिश्री के साथ या कॅपसूल में भरकर खिलाते हैं तथा रुमाल पर डालकर सूंघने को देते हैं।
(६) इसके तैल को दांत के गढ़े में रखने से दर्द दूर होता है। नाडीशूल एवं जिह्वा के लकवे में इसका प्रयोग किया जाता है। चूसने वाली गोलियों में सुगंध द्रव्य के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
(७) बड़ी मात्रा में दालचीनी का उपयोग कैन्सर में किया गया है। औषध के अतिरिक्त मसालों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। तैल को सुगंध द्रव्य रूप में बहुत व्यवहार करते हैं तथा औषध संरक्षण के रूप में भी कभी-कभी व्यवहार किया जाता है।
मात्रा— चूर्ण २ई–१० र०; तैल १–३ बूंद।
अथ पत्रकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
पत्रं तमालपत्रञ्च तथा स्यात्पत्रनामकम् । पत्रकं मधुरं किञ्चित्तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं लघु ॥ निहन्ति कफवाताशौहल्लासारुचिपीनसान् ॥ ६८ ॥
तेजपात के नाम तथा गुण— पत्र, तमालपत्र, पत्रनामक (अर्थात् पत्रवाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवम् पत्रक ये सब 'तेजपात' के संस्कृत नाम हैं। तेजपात–मधुर रसयुक्त, किञ्चित् तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पिच्छिल और लघु होता है एवम् यह कफ, वात, अर्श, हल्लास (उबकाई), अरुचि तथा पीनस इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ ६८ ॥
२७ तेजपात
हि०— तमालपत्र, पत्रज, तेजपत्ता, तेजपत्र, गुरन्द्रा । बं०— तेजपत्र । म०— तमालपत्र । ते०— आकुपत्री, तालीस पत्री । ने०— चेटा सिंकौली । गु०— तमालपत्र । आसा०— दोपती । ता०— कटड्डु-करुवपत्तै । अ०— साजजेहिन्दी । ले०— Cinnamomum tamala Nees & Eberm (सिर्नमोमम् तमाल नीज, एवर्म)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)।
इसका वृक्ष हिमालय में ३ से ७ हजार फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। मौतारगढ़ में ये समुद्बद्ध होकर बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। पूर्वी बंगाल तथा खासिया एवं जैन्तिया पहाड़ियों पर तथा बर्मा में भी पाये जाते हैं।
इसका वृक्ष मध्यमाकार का, करीब २५ फीट ऊंचा, साढ़े चार फीट के घेरे में एवं सुगन्धयुक्त होता है और वह बारहो मास हरा भरा रहता है। छाल-पतली, शिकनदार, खुरदरी, गहरे भूरे रंग की वा कृष्णाभ होती है। काट-आधा इञ्च मोटा, गुलाबी या ललाई लिये हुये भूरे रंग का और बाहर की ओर श्वेत रेखांकित होता है। पत्ते–प्रायः ५–८ इञ्च लम्बे, २–३ इञ्च चौड़े, लट्ट्वाकार–आयताकार या–भालाकार, नोकदार, चिकने, चर्मवत, विपरीत या एकान्तर तथा आधार से अग्रतक ३ शिराओं से युक्त एवं ७.५–१३ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से
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कर्पूरादिवर्गः २२६
युक्त होते हैं। नवीन पत्तियां कुछ-कुछ गुलाबी रंग की रहती हैं। फूल–७.५ मि० मि० लंबे, हल्के पीताभरंग के, ५–१५ से० मी० लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों (Panicles) में रहते हैं। परिपुष्प खंड ६, आयताकार, सिल्क की तरह मृदुरोमश जो पुष्पित होने पर मध्य के नीचे से टूट जाते हैं। पूर्ण पुंकेसर ९ रहते हैं। फल–आध इंच लंबे, अंडाकार, मांसल एवं काले रंग के रहते हैं। ये फल कुछ बढ़े हुये परिपुष्प नाल पर लगे रहते हैं जिनके परिपुष्प खंड अग्रपर कटे हुए (Truncated) मालूम पड़ते हैं।
इसके सूखे हुए अपक्व फल का काला नागकेशर नाम से दक्षिण भारत में व्यवहार होता है। अर्श के लिए यदि नागकेशर का प्रयोग करना हो तो इसका प्रयोग अधिक उचित मालूम होता है क्योंकि तमाल पत्र के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख मिलता है।
इसकी छाल को हि०–तज, बं–दालुका तथा अ०–मलीखा कहते हैं। यही भारतीय दालचीनी है जिसको सिलोनी दालचीनी के स्थान पर या मिलावट के रूप में उपयोग में लाते हैं। इसी के पत्ते तेजपात या तमालपत्र नाम से अधिकतर बेचे जाते हैं। कुछ लोगों के मत से तेजपात तथा तज अलग-अलग वृक्षों के पत्ते तथा छाल हैं। इसकी छाल सिलौनी दालचीनी की अपेक्षा मोटी, तेजी में कम तथा जल के साथ पीसने से पिच्छिलता युक्त हो जाती है। नवीन मत से सिलौनी तथा चीनी दालचीनी के गुण पहले लिखे जा चुके हैं तथा भारतीय के गुणों में नवीन दृष्टि से कोई विशेष अन्तर न होने के कारण इनको अलग नहीं लिखा है।
नोट :– भावप्रकाशकार त्वक्पत्र (तज) के गुणों में 'पित्तलं' तथा 'शुक्रहृत्' लिखते हैं। दारुसिता (सिलोनी दालचीनी) के गुणों में 'पित्तहृत्' एवं 'शुक्रला' लिखते हैं। दारुसिता के अन्य नाम 'स्वादी', 'तनुत्वक्' लिखे हैं जिससे दारुसिता यह सिलोनी दालचीनी होगी ऐसा लगता है। इस दृष्टि से सिलोनी तथा भारतीय दालचीनी के गुण भावप्रकाशकार के मत से बिलकुल अलग हैं। भावप्रकाशोक्त तीसरे द्रव्य पत्रक (तेजपात) के गुण त्वक्पत्र से मिलते-जुलते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि त्वक्पत्र (तज, भारतीय दालचीनी) के वृक्ष के पत्ते ही तेजपत्र हैं।
रासायनिक संगठन— इसमें एक प्रकार का लौंग के समान गन्ध वाला उड़नशील तैल पाया जाता है।
गुण और प्रयोग— तेजपत्र उष्ण, लघु, वातहर, दीपन, स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा उत्तेजक हैं। इसका प्रयोग कफ, वात, अर्श, हल्लास, अरुचि एवं पीनस में किया जाता है। कुपचन, उदरस्थवायु, उदरशूल एवं अतिसार आदि पाचननलिका के रोगों में, सब तरह के कफविकारों में एवं गर्भाशय की शिथिलता में इसका उपयोग करते हैं। गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान होने के लिये तथा गर्भस्राव न हो इसलिये इसका प्रयोग करते हैं। यह वातहर होने के कारण बच्चों के सभी प्रकार के रोगों में एवं आमवात में इसको खिलाते हैं।
मात्रा— १-४ माशा ।
अथ नागकेशरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
नागपुष्पः स्मृतो नागः केशरो नागकेशरः । चाम्पेयो नागकिञ्जल्कः कथितः काञ्चनाह्वयः ॥
नागकेशर के नाम तथा गुण— नागपुष्प, नाग, केशर, नागकेशर, चाम्पेय, नागकिञ्जल्क तथा काञ्चनाह्वय (काञ्चन के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) ये सब पुँल्लिङ्गी शब्द 'नागकेशर' वृक्षवाची हैं ॥ ६९ ॥