भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० भावप्रकाशनिघण्टुः क्लीवं पुष्पे तु क्लीवे ॥ ६९ ॥
किन्तु यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि यदि उक्त सभी शब्द नपुंसकलिंगी हों तो 'नागकेसर के पुष्प' को कहने वाले होते हैं ॥ ६९ ॥
नागपुष्पं कषायोष्णं रूक्षं लघ्वामपाचनम् ॥ ७० ॥ ज्वरकण्डूतृषास्वेदच्छर्दिहृल्लासनाशनम् । दौर्गन्ध्यकुष्ठवीसर्पकफपित्तविषापहम् ॥ ७१ ॥
नागकेशर (नागकेशर का फूल) - कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, रूक्ष, लघु तथा आम को पचाने वाला होता है एवं यह ज्वर, खुजली, तृषा, पसीना, वमन, हृल्लास, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विसर्प, कफ,
पित्त और विष को दूर करने वाला होता है ॥ ७०-७१ ॥ २८ नागकेसर (१)
हि०-नागकेसर, नागेसर, पीला / नागकेशर, नागचम्पा । बं०-नागेश्वर । म०-नागकेसर, नागचांफा (वृक्ष) । गु०-पीळु नागकेसर । क०-नागसम्पिगे । ते०-नागकेसरमु । ता०-चेरू
नगपू । अ०-मिस्रूरुम्मान । फा०-नारेमुश्क । अं०-Cobra's Saffron (कोबराज सैक्रॉन) । ले०-Mesua ferrea Linn. (मेसुआ फेरिआ लिन) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) ।
यह पूर्वी हिमालय, आसाम, बङ्गाल, दक्षिण हिन्दुस्तान और पूर्व बंगाल के पहाड़ों पर पाया जाता है । इसको बगीचों में भी लगाया जा सकता है ।
इसका छोटा सुन्दर वृक्ष होता है और वह सदा हराभरा रहता है। स्तम्भ-सीधा, छाल- चिकनी और राख के रङ्ग की होती है । पत्ते-विपरीत, ३ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १-१।। इञ्च
चौड़े, आयताकार-भालाकार एवं तीक्ष्णाग्र युक्त होते हैं । इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला और नीचे का श्वेताभ तथा रज से आवृत होता है। शिराएँ सघन और स्पष्ट होती हैं। नये पत्ते लाल
रंग के होते हैं । फूल-१ से ३ इञ्च के घेरे में सफेद रङ्ग के सुगन्धयुक्त वसन्त ऋतु में आते हैं । इनमें अन्तर्दल चार होते हैं। इन्हीं फूलों के भीतर के पीले केसरिया रंग के नरकेसर के
गुच्छ को नागकेसर कहते हैं। यही असली (पीला) नागकेशर है जिसका औषध में व्यवहार करना चाहिये। फल-एक इञ्च से बड़े, अंडाकार तथा कुछ तुर्कीके एवं प्रवृद्ध बाह्यदल से घिरे
हुये होते हैं। एक-एक फल से १ से ४ तक चिकने, कोणयुक्त एवं भूरे रंग के बीज निकलते हैं। नोट-नागकेसर के सम्बन्ध में लोगों में भ्रम है । अधिकांश विद्वानों ने उपर्युक्त मेसुआ
फेरिआ के पुष्पों के नरकेसर गुच्छ को नागकेसर माना है जिसके गुण एवं प्रयोग यहाँ दिये गये हैं । इसी वर्ग के दक्षिण की तरफ होने वाले वृक्ष ओक्रोकार्पस लोंगिफोलियस (Ochrocarpus
longifolius) की पुष्प-कलिकाओं को लाल नागकेशर के नाम से बेचा जाता है। इसी प्रकार काला नागकेशर के नाम से भारतीय या चीनी दालचीनी के फल बेचे जाते हैं जिसके गुण
दालचीनी के समान ही होते हैं। एक बात ध्यान देने की यह है कि नागकेसर के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख नहीं है। चरक में तथा व्यवहार में रक्तार्श के लिये इसका प्रयोग मिलता है।
तज के गुणों में अर्श का उल्लेख है तथा उसके फल का उपयोग काला नागकेशर नाम से व्यवहार में कहीं-कहीं आता है। मेसुआ फेरिआ के गुणादि के पश्चात् ओक्रोकार्पस् लोंगिफोलियस का
वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक तैलीय राल रहती है जिससे सुगंधित, हल्के
पीले रंग का एक उड़नशील तेल प्राप्त होता है। कठोर फलभित्ति में टैनिन रहता है। बीजों कर्पूरादिवर्गः २३१
में एक स्थिर तैल पाया जाता है। राल मद्यसार में कम घुलती है लेकिन बेन्झॉल में संपूर्णतया घुलती है। इसके अतिरिक्त इसमें दो कड़वे पदार्थ भी पाये जाते हैं ।
गुण और प्रयोग-नागकेसर संग्राहक, गर्भस्थापक, किंचित् उष्ण, रक्तसंग्राहक, आमपाचक एवं दीपक है। इसकी छाल तथा मूल तिक्त एवं सुगन्धि हैं। इसकी छाल कुछ संग्राहक होती है।
इसके कच्चे फल सुगन्धि, कटु तथा विरेचक होते हैं। (१) रक्तार्श में मक्खन तथा मिश्री के साथ इसे खिलाने से रक्त गिरना बन्द हो जाता है ।
शतधौत घृत में मिलाकर इसमें लेप भी किया जाता है । (२) गुद द्वार की जलन, रक्तातिसार, वमन, हिका, तृष्णा, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अति-
स्वेद आदि में नागकेसर का प्रयोग करते हैं। (३) बहुत कफयुक्त खांसी में इसे देते हैं ।
(४) अतिस्वेद में इसका लेप या इसके सूक्ष्म चूर्ण का भी बाह्य प्रयोग किया जाता है । (५) इसकी छाल एवं मूल का क्वाथ खांसी एवं आमाशय प्रक्षोभ (Gastritis) में दिया
जाता है । (६) तीव्र प्रतिश्याय में इसके पत्तों का उपनाह सर पर लगाते हैं ।
(७) इसके बीजों का तैल शरीर की पीड़ा, जोड़ों में दर्द तथा खुजली (पामा) एवं अन्य चर्मरोगों में लगाया जाता है ।
(८) इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग बिच्छू एवं सर्पदंश में किया जाता है । (९) हाथ-पैरों की जलन में नागकेशर को शतधौत घृत में मिलाकर लगाने से जलन
दूर होती है । मात्रा - ४ र० से १ माशा ।
लाल नागकेशर (२) सं०-सुरपुन्नाग, नमेरु, सुरपर्णिका । हि०-लाल नागकेशर । म०-सुरंगी (वृक्ष), गोडी उंडी
(फल), तांबडे नागकेशर । गु०-रांतु नागकेशर । अं०-Alexandrian Laurel (अॅलेक्झं- न्ड्रियन् लॉरेल ) । ले०-Ochrocarpus longifolius Benth. & Hook. f. (ओक्रोकार्पस्
लाँगिफोलिअस् बेन्थ, हुक्) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) । यह पश्चिम प्रायद्वीप के जंगलों में कनारा से कोंकण तक पाया जाता है। उत्तरी सरकार
में यह लगाया हुआ मिलता है । इसका वृक्ष साधारण ऊँचा तथा सदाइरित होता है। पत्ते-५-८ इंच लम्बे, १।।-२।। इंच
चौड़े, आयताकार, मोटे, चर्मवत् एवं सुन्दर शिराजाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अनेक, ४ अन्तर्दल वाले, लाल रेखांकित, श्वेत रंग के, गुच्छों में आते हैं। फल-१ इंच लंबे, अण्डाकार, नुकीले
तथा एक बीज से युक्त होते हैं। फलों के गूदरे को लोग खाते हैं। सूखी हुई पुष्पकलिकाओं को लाल नागकेशर कहा जाता है। यह गोल, नुकीले, नारंगरक्त रंग के तथा करीब ३ इंच
लम्बे पुष्पवृन्त से युक्त होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग असली नागकेशर (मेसुआ फेरिआ) के स्थान पर किया
जाता है । गुणों में उसके समान होते हुए भी यह कुछ न्यून गुण वाला है । इसके पुष्पों का अर्क निकालकर ज्वर में रोगी के स्नान के लिये प्रयोग करते हैं। इससे रोगी को आह्लाद मालूम होता