भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह उत्तेजक, सुगन्धि, ग्राही, कडुवा एवं दीपन है। अत्यधिक प्यास, आमाशयिक प्रक्षोभ, अर्श, कुपचन तथा अतिसार में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा-१-३ माशा । नोट-कुछ लोग इसी वर्ग के पुन्नाग वृक्ष की कलिकाओं का भी उपयोग नागकेशर के नाम से करते हैं। इसे ले०-Calophyllum inophyllum Linn. (कॅलोफाइलम् आइनोफाइलम् लिन); हिं०-सुलतानचंपा; म०-उंडी, उंडल कहते हैं। इसका बहुत सुन्दर वृक्ष दक्षिण भारत के समुद्री किनारे पर तथा अन्य स्थानों पर लगाया हुआ मिलता है। पत्ते-बड़ के पत्र जैसे लम्बगोल ४ से ६ इञ्च लम्बे तथा २ से ४ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के चार दल वाले और सुगन्धित होते हैं। फल-गोल, १ से १ १/२ इञ्च लम्बे, चिकने तथा पीले रंग के आते हैं। इसके बीजों से तैल निकालते हैं, जिसे सर्पन का तैल कहते हैं। पुन्नाग-यह मधुर, शीत, सुगन्धि और पित्तनाशक है। इसका तैल पुराने संधिवात में मालिश करते हैं। खुजली तथा सर की फुन्सियों में तैल लगाते हैं। सोज़ाक में इस तैल को खिलाते हैं।
अथ त्रिजातकं चातुर्जातकं च । तयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धि त्रिजातकम् । नागकेशरसंयुक्तं चातुर्जातकमुच्यते ॥ ७२ ॥ तद् द्वयं रोचनं रूक्षं तीक्ष्णोष्णं मुखगन्धहृत् । लघुपित्ताग्निकृद्वर्ण्य कफवातविषापहम् ॥७३॥ 'त्रिजातक' तथा 'चातुर्जातक' बोधक द्रव्य तथा उनके एकत्र गुण-दालचीनी, इलायची और तेजपात इन्हीं तीनों द्रव्यों का समभाग में योग होने से उसे 'त्रिसुगन्धि' या 'त्रिजातक' कहते हैं और यदि उन्हीं द्रव्यों में समभाग से 'नागकेशर' भी मिला दी जाय तो उसे 'चातुर्जातक' कहते हैं। त्रिजातक तथा चातुर्जातक-रुचिकारक, रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मुख की दुर्गन्ध को दूर करने वाले, लघु, पित्त तथा अग्निवर्धक, वर्ण्य (शरीर के रङ्ग को उत्तम करने वाले), कफ, वात तथा विष को नष्ट करने वाले होते हैं ॥ ७२-७३ ॥
अथ कुङ्कुमम् ( केशर ) । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणाँश्चाह कुङ्कुमं घुसृणं रक्तं काश्मीरं पीतकं वरम् । संकोचं पिशुनं धीरं बाह्लीकं शोणिताभिधम् ॥ काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवेद्धि तत् । सूक्ष्मकेशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम् ॥७५॥ बाह्लीकदेशसंजातं कुङ्कुमं पाण्डुरं स्मृतम् । केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम् ॥७६॥ कुङ्कुमं पारसीकं यन्मधुगन्धि तदीरितम् । ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ॥७७॥ कुङ्कुमं कटुकं स्निग्धं शिरोरोगव्रणजन्तुजित् । तिक्तं वमिहरं वर्ण्यं व्यङ्गदोषत्रयापहम् ॥७८॥ केशर के नाम-कुङ्कुम, घुसृण, रक्त, काश्मीर, पीतक, वर, सङ्कोच, पिशुन, धीर, बाह्लीक और शोणिताभिध (रक्तवाची सभी शब्द ) ये सब केशर के संस्कृत नाम हैं। देश भेद से केशर की उत्तमता एवं उसके लक्षण-काश्मीर देश के खेतों में जो 'केशर' उत्पन्न होता है वह सूक्ष्म केशरों से युक्त, कुछ रक्त वर्ण वाला तथा कमल की समान सुन्दर गन्ध से युक्त होता है एवं वह 'उत्तम' माना जाता है। जो 'बाह्लीक' (बुलारा) देश में उत्पन्न होने वाला 'केशर' होता है वह पाण्डुर (शुक्ल तथा पीतवर्ण युक्त) वर्ण का एवं 'केतकी' के समान गंध
कर्पूरादिवर्गः २३३ से युक्त होता है। यह सूक्ष्म केशरों से युक्त होता है और 'मध्यम' माना जाता है। जो 'पारसीक' (फारस) देश में उत्पन्न होने वाला केशर होता है वह मधु (शहद) के समान गन्ध वाला, कुछ पाण्डुर वर्णयुक्त तथा मोटे केशरों से युक्त होता है और वह 'अधम' माना जाता है। केशर-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध और वर्ण्य (शरीर के वर्ण के लिये हितकर) होता है तथा यह शिरोरोग, व्रण, कृमि, वमन, व्यङ्ग (झाईं) तथा त्रिदोष इन सबों को नष्ट करने वाला होता है ॥ ७४-७८ ॥
२९ केशर हिं०-केशर । म०, गु०-केशर । बं०-जाफरान । क०-कुङ्कुम । ते०-कुङ्कुम पुव । ता०- कुङ्कुमपु । फा०-करकीमास । अ०-जाफरान । अं०-Saffron (सॅफ्रॉन) । ले०-Crocus sativus Linn. (क्रोकस् सेटाइवस् लिन.)। Fam. Iridaceae (इरिडेँसी)। केशर का नैसर्गिक उत्पत्ति स्थान दक्षिण योंरप है। यह स्पेन से बम्बई में बहुत आता है और भारतवर्ष के बाजारों में बिकता है। ईरान, स्पेन, फ्रान्स, इटली, ग्रीस, तुर्की, चीन और फारस आदि देशों में इसकी खेती की जाती है। हमारे देश के काश्मीर में पम्पूर (४३०० फीट नामक स्थान पर तथा जम्मू के किश्तवाड़ में इसकी खेती की जाती है। यहाँ का उत्पन्न हुआ केशर भाव- प्रकाशकार की दृष्टि से सर्वोत्तम समझा गया है। इसका बहुवर्षायु क्षुप १।। फुट तक ऊँचा होता है। जड़ के नीचे प्याज के समान गांठदार कन्द (Corm) होता है। इसमें कांड नहीं होता। पत्ते-घास के समान लम्बे, पतले, पनालीदार और जड़ ही से निकले हुए मूलपत्र (Radicle leaf) रहते हैं। इनके किनारे पीछे की तरफ मुड़े हुए होते हैं। आश्विन कार्तिक में इस पर फूल आते हैं। फूल-एकाकी या गुच्छों में, नीलोलोहित वर्ण के, पत्तों के साथ ही शरद्ऋतु में आते हैं। नीचे के पत्रकोश (Spathe), पुष्पध्वज (Scape) को घेरे रहते हैं तथा दो हिस्सों में विभक्त रहते हैं। परिपुष्प (Perianth) निवापसम (Funnel-shaped), नाल (Tube) पतला, दल ६ खण्डों में विभक्त दो श्रेणियों में एवं नाल का कण्ठ श्मश्रुल (बालों से युक्त) रहता है। कण्ठ पर ३ पुंकेशर (Stamen) रहते हैं एवं परागशय (Anther) पीतवर्ण का रहता है। कुक्षिवृन्त (Style) परिपुष्प के बाहर निकले हुए (Exserted), नारंगारक्त रंग के, मुद्रराकार, अखण्ड या खण्डित रहते हैं। फल-सामान्य स्फोटी फल (Capsule) आयताकार एवं बीज गोल होते हैं। इन फूलों के स्त्री केशर के सूखे हुए अग्रभाग जिन्हें कुक्षि (Stigma) कहा जाता है उन्हें ही केशर कहते हैं। कुक्षि (Stigma) ३, कुक्षिवृन्त के ऊपर लगी हुई या अलग, करीब १ इञ्च लम्बी गहरे लाल से लेकर हलके रक्ताभ भूरे रंग की एवं सामान्य दन्तुर या लहरदार होती है। कुक्षिवृन्त (Styles) करीब १ से. मि. लम्बे, करीब-करीब रम्भाकार, ठोस, पीताभ भूरे से लेकर पीताभ नारंगी रंग के रहते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र सुगन्ध रहती है तथा इसका स्वाद सुगन्धि तथा कड़वापन लिये हुए होता है। केशर के पौधे को बीज या उसके कन्द द्वारा लगाया जा सकता है। साधारणतः १ एकड़ भूमि से करीब ५०-५५ पौंड ताजा केशर प्राप्त होता है जो सूखने पर १०-११ पौंड रह जाता है। इसकी खेती तथा माल के तैयार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता रहती है। सूर्योदय के पहले जब फूल लगभग खिलने को होते हैं तब उनको तोड़ लेते हैं। उसमें से केशर को तोड़कर छलनी में डालकर मन्द आंच पर सुखाते हैं। केशर को हमेशा प्रकाशहीन बन्द पात्र में रखना चाहिये।