भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:


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२३४ | भावप्रकाशनिघण्टुः

रासायनिक संगठन— केसर में एक स्नेहीय तैल ८-१३%, करांव १% उड़नशील तैल, एक रंगहीन कडुवा पिकोक्रोसिन (Picrocrocin) नामक ग्लाइकोसाइड् एवं क्रोसेटिन (Crocetin) नामक रंजक द्रव्य का क्रोसिन (Crocin) ग्लाइकोसाइड् ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्रोसेटिन नामक रवेदार रंजक द्रव्य ३ प्रकार का होता है। अॅल्फा क्रोसेटिन ($\alpha$-crocetin, $C_{24} H_{28} O_{5}$) ०.७%, बीटा क्रोसेटिन ($B$-crocetin, $C_{25} H_{30} O_{5}$) ०.७%, एवं गामा क्रोसेटिन ($\gamma$-crocetin, $C_{26} H_{32} O_{5}$) ०.३% रहता है। क्रोसिन (Crocin) यह लाल रंग का चूर्ण होता है जो जल तथा मद्यसार में आसानी से घुल जाता है। संकेन्द्रित गन्धक के तेजाब में इसका गहरे नीले रंग का घोल बनता है जो रखने पर नील लोहित, रक्त तथा अन्त में भूरे रंग का हो जाता है। शोरे के तेजाब से यह हरे रंग का हो जाता है।

गुण और प्रयोग— केसर उष्ण, सुगन्धि, दीपन, पाचन, उद्वेष्टन-निरोधि, मनःप्रसादकर, रुचिकर, वर्ण्य, वश्य, कामोत्तेजक, विषघ्न, आर्तवजनक, मूत्रल एवं अल्प वेदनाहर है। आमाशयोत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधि गुणों के लिये यह बहुत प्रसिद्ध है तथा यह श्रेष्ठ उत्तेजक एवं वृष्य औषध मानी जाती है। यह वातनाड़ियों के लिये शामक है। सुगन्धित रंजक द्रव्य के रूप में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके उड़नशील तैल में अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही गुण होते हैं।

इसका उपयोग अतिसार, शूल, मूत्रकृच्छ्र, अनार्तव, पीडितार्तव, कास, श्वास, कण्ठरोग, यकृत-विकार, आमवात, नाड़ीशूल एवं शिरोरोगों में किया जाता है।

  • (१) पीडितार्तव में इसको पूर्ण मात्रा में देने से शूरु कम होता है तथा भार्तव स्राव ठीक होने लगता है। गर्भाशय के पीड़ा युक्त विकारों में इसकी गोली योनि में धारण कराई जाती हैं। स्तनों पर इसके लेप से दूध बढ़ता है।
  • (२) मूत्राघात में १ तोला केशर मधुयुक्त जल में रात में भिगो कर सुबह उसे पिलाने से लाभ होता है। (सु. उ. अ. ५८-३०)
  • (३) बच्चों की सरदी में गरम दूध में केशर खिलाते हैं, तथा ललाट एवं छाती पर लगाते हैं।
  • (४) केसर तथा शर्करा को घृत में भून कर उसके नस्य से सूर्यावर्त एवं अर्धावभेदक आदि में लाभ होता है। शिरःशूल में इसे मस्तक पर लगाते हैं।
  • (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं।
  • (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदर शूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं।

प्रमाप तथा परीक्षा— केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हों। कुक्षिकृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्र्गैनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता—इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी. सी. जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१%


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कर्पूरादिवर्गः | २३५

पोटैशियम डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या इससे कम नहीं होनी चाहिये।

व्यामिश्रण— इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिकृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस) के मेथिल् आरेज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी-कभी सत्व निकाला हुआ केसर रंग कर के बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, गिलसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं।

मात्रा— २-४ र०।


अथ गोरोचना । तस्या नामानि गुणांश्चाह

गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना । गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा । विषाऽलक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ॥ ७९ ॥

गोरोचन के नाम तथा गुण— गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन—शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है ॥ ७९ ॥


३० गोलोचन

  • हि०— गोलोचन, गोरोचन ।
  • बं०— गोरोचना ।
  • म०— गोरोचन ।
  • गु०— गोरुचन्दन, गोरोचन ।
  • ते०— गोरोचनमु ।
  • ता०— गोरोचनम् ।
  • फा०— संगगाव ।
  • अ०— हजरुल बकर ।
  • अं०— Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन) ।
  • ले०— Bezoar (बेझोर) ।

गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से परतदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी किसी का रङ्ग नारंगी या लाल युक्त होता है। इसी प्रकार किसी किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी।

इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है।

गुण और प्रयोग— गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, विषहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है।

इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है।