भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२३६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १ ) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुन- राक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं । यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं । ( २ ) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है । ( ३ ) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है । मात्रा—१-२ र० । नोट—पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है । गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है । ले०-Extractum fellis bovini ( एक्स्ट्रैक्टम् फेलिस् बोहिनि )। अं०-Purified Ox- Gall ( प्यूरिफाइड ऑक्स-गॉल् )। हि०-गो या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा । ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार ( ९०% ) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इनमें पित्त के लवण तथा रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है । इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है । जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (विटामिन्) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्रॉम्बिन् ( Prothrombin ) के निर्माण के लिये भिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा-५-१५ ग्रेन । अथ नखं नखी च ( गन्धद्रव्यम् ) तयोर्नामानि गुणांश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ॥ ८० ॥ नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी । नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ॥ ८१ ॥ लघूष्णं शुक्लं वर्ण्य स्वादु व्रणविषापहम् । अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ॥ ८२ ॥ सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण-नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख-ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्ताविकार (किंता वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक, एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं ॥ ८०-८२ ॥ कर्पूरादिवर्गः २३७ ३१ नख-नखी हि०-नख, नखी, छोटा नख । बं०-नखी गन्ध द्रव्य, छोट नखी । म०-नखला, वाघनख । ते०-नखमुच्चिप्प । गु०-नखला, सावजना नख । क०-नख, बाघमख । फा०-नाखून पर्यां । अ०-अजफारुतिब, इकलिलुल मुलुक । अं०-Land snail (लैंड स्नेल)। ले०-Helix aspera (हेलिक्स अॅस्पेरा); Achatina fulica (ॲचॅटिना फूलिका) । नख एक सुगन्धि द्रव्य है। यद्यपि इसे नख, व्याघ्रनख आदि नाम दिये गये हैं तथापि यह किसी जानवर का नाखून नहीं है। यह एक प्रकार के सीप की जाति के समुद्री जीव के मुख के ऊपर का आवरण है जो नख सदृश होने के कारण नख कहा जाता है। भावप्रकाशकार ने इनके दो भेद लिखे हैं। बड़े को नख या व्याघ्रनख तथा छोटे को नखी लिखा है। अन्य ग्रन्थों में नखी के आकृति के अनुसार ५ भेद लिखे हैं। बेर के पत्ते के सदृश, कमलदल सदृश, घोड़े के खुर की आकृति के, हाथी के कान के समान आकार वाले तथा सुअर के कान के समान ये पांच प्रकार होते हैं। इनमें से सुअर के कान के समान निषिद्ध माना गया है। कुछ लोगों ने हाथी के कान सदृश और घोड़े के खुर के समान आकृति वाले नख का उपयोग गन्धयोगों में तथा बेर या कमलदल सदृश नख का उपयोग धूपन में बतलाया है। यह गहरे भूरे रंग का तथा अनेक पटलों से बना हुआ कठोर, अपारदर्शक तथा नख के सदृश होता है। इसके उन्नतोदर पृष्ठ पर परत साफ दिखलाई देते हैं। इसको जलाने से दुर्गन्ध आती है लेकिन तैल के साथ पकाने से तैल सुगन्धित होता है। अन्य ग्रन्थों में इसके शोधन का विधान मिलता है। भैंस के गोबरयुक्त जल, तिन्त्रिड़ी जल या मृत्तिकायुक्त जल के साथ स्वेदन करके, प्रक्षालन करने के पश्चात् भून कर गुड़हरीतकी मिले जल में बुझाते हैं। फिर पीस कर उपयोग में लाते हैं। चरक में प्रायोगिक धूम्रपान की वर्ति के योग में (सू. अ. ५ श्लो. २०), श्वयथुचिकित्सा (चि. अ. १६) में शैलेयकादि तैल और प्रदेह में, महासुगन्धहस्ती नामक अगद के योग में (चि. अ. २३ ), अमृतादि तैल (चि. अ. २८) तथा वातरक्त चिकित्सा (चि. अ. २९) में शतपुष्पादि तैल के योग में अन्य द्रव्यों के साथ नख का प्रयोग लिखा है। सुश्रुत में एला- दिगण में व्याघ्रनख का उल्लेख है । तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका अधिक उपयोग होता है। अथ बालम् [ सुगन्धबाला ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह बालं ह्रीबेरबर्हिष्ठोदीच्यं केशाम्बुनाम च । बालकं शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् ॥ हृल्लासारुचिवीसर्पहृद्रोगामातिसारजित् ॥ ८३ ॥ सुगन्धबाला के नाम तथा गुण-बाल, ह्रीबेर, बर्हिष्ठ, उदीच्य, केशनाम (केशवाचक सभी शब्द), एवं अम्बुनाम (जलवाची सभी शब्द ) तथा बालक ये सब 'सुगन्धबाला' के संस्कृत नाम हैं। सुगन्धवाला-शीतवीर्य, रूक्ष, लघु, अग्निदीपक तथा पाचक होती है और यह हृल्लास (जीमिचलाना ), अरुचि, वीसर्प, हृद्रोग, आम तथा अतिसार इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ ८३ ॥ ३२ सुगन्धबाला हि०-सुगन्धवाला, नेत्रवाला । बं०-बाला । म०-काला वाला । गु०-वालो, कालो वालो । क०-बलरकसी-गिडा । ते०-मुत्तुपलागमु, प्ररांकुटी । ता०-पेरामुदिवेर । ले०-Pavonia odorata Willd. (पॅवोनिया ओडोरेटा विल्ड) । Fam. Malvaceae (मालवेसी) ।