भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 143 में से
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२३८ | भावप्रकाश निघण्टुः सुगन्धवाला - पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिन्ध, पश्चिम प्रायद्वीप और सिलोन में अधिक उत्पन्न होती है। इसके क्षुप में थोड़ी सी कस्तूरी की सुगन्ध रहती है। इसका क्षुप-सीधा तथा १॥-२ फीट ऊँचा होता है और समस्त क्षुप पर बारीक रोवें होते हैं। पत्ते-१ से ३ इञ्च लम्बे गोलाकार हृदयाकृति, कंधी के पत्तों के आकार वाले, ३ से ५ भागों में थोड़ी दूर तक विभक्त और ऊपर के पत्ते दन्तुर होते हैं। पत्तों को मसलने से चिपचिपापन मालूम होता है। शाखाओं के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। पुष्पद्दल-किञ्चित् हल्के गुलाबी रङ्ग के होते हैं। फल-अण्डाकृति, छोटे एवं चने बराबर होते हैं। बीज-भूरे रंग के, तैल से युक्त लेकिन गन्धहीन होते हैं। मूल-७-८ इञ्च लम्बे, प्रायः ऐंठे हुए तथा अधिक से अधिक ३/४ इञ्च मोटे, चिकने, भूरे रंग के तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहते हैं। इसमें कस्तूरी के समान सुगन्ध रहती है। औषध में इन्हीं मूलो का व्यवहार किया जाता है। नोट-बाजार में सुगन्धवाला के नाम से मिलने वाला गांठदार द्रव्य सुगन्धवाला नहीं है। उसे असली तगर मानते हैं। उसका वर्णन पहले किया गया है। कुछ लोगों ने इसके लैटिन नाम में खस का लैटिन नाम दिया है, वह उचित नहीं है। कुछ लोगों ने खस जाति के ही दूसरे तृण का लैटिन नाम सुगन्धवाला के लिए दिया है जिसको कुछ लोग खस का ही पर्याय मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें लुआबदार पदार्थ तथा उत्तेजक सुगन्धि द्रव्य है। गुण और प्रयोग-सुगन्धवाला शीतल, स्नेहन, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं बल्य है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, दाह, तृषा, हल्लास, वमन, अतिसार, व्रणशोथ एवं विसर्प में किया जाता है। ( १ ) किसी भी प्रकार के ज्वर में षडंग पानीय के रूप में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, श्वेत चन्दन, सुगन्धवाला एवं सोंठ का क्वाथ देने से ज्वर का दाह एवं प्यास कम हो जाती है। ( २ ) बेल के साथ इसका उपयोग संग्रहणी में लाभकर होता है। अतिसार में आदी के साथ इसको फाण्ड बना कर पिलाते हैं। बच्चों के अतिसार में चाँवल के धोवन के साथ मिश्री, मधु तथा सुगन्धवाला देते हैं। वमन, हल्लास आदि में भी तण्डुलोदक के साथ इसको देते हैं। ( ३ ) रक्तपित्त में चन्दन, मिश्री तथा तण्डुलोदक के साथ इसका प्रयोग किया गया है। ( ४ ) विसर्प में इसके चूर्ण को घृत के साथ लेप करते हैं। श्वित्र में इसकी जली हुई काली राख का लेप लाभदायक माना जाता है। मात्रा-३-६ माशा।
अथ वीरणम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह
स्याद्वीरणं वीरतर्वीरञ्च बहुमूलकम् । वीरणं पाचनं शीतं वान्तिहल्लघु तिक्तकम् ॥ ८४ ॥ स्तम्भनं ज्वरनुद् भ्रान्तिमदहत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पकृच्छ्रदाहव्रणापहम् ॥८५॥ वीरण अर्थात् गांडर घास के नाम तथा गुण-वीरण, वीरतरु, वीर और बहुमूलक ये नाम संस्कृत में वीरण के हैं। वीरण-पाचक, शीतवीर्य, वमन को दूर करने वाला, लघु, तिक्त रसयुक्त एवम् स्तम्भन होता है। यह ज्वर, भ्रमरोग, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, मूत्रकृच्छ्र, दाह और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८४-८५ ॥
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कर्पूरादिवर्गः | २३६
अथोशीरम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह
वीरणस्य तु मूलं स्यादाशीरं नलदञ्च तत् । अमृणालञ्च सेव्यञ्च समगन्धिकमित्यपि ॥८६॥ उशीरं पाचनं शीतं स्तम्भनं लघु तिक्तकम् ॥ ८७ ॥ मधुरं ज्वरहद्धान्तिमदनुत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पदाहकृच्छ्रव्रणापहम् ॥ ८८ ॥ खस के नाम तथा गुण - 'वीरण' नामक घास के जड़ को 'खस' कहते हैं। उसके संस्कृत नाम-उशीर; नलद, अमृणाल, सेव्य और समगन्धिक ये सब हैं। खस-पाचक, शीतवीर्य, स्तम्भन, लघु, तिक्त तथा मधुर रस युक्त होता है और यह ज्वर, वमन, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्र और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८६-८८ ॥
३३ वीरण-खस
हि०-खस, वीरण मूल, गांडर, बेना। बं०-वेणर मूल, खसखस । म०-वाला । गु०-वालो । क०-मुडिवाल । ते०-वट्टिवेलु । ता०-वैट्टिवेर । फा०-रेशये वाला, दीखेवाला । अं०-Cuscus grass (कसकस ग्रास ) ले०-Andropogon muricatus Retz. (एन्ड्रोपोगोन् म्युरिकैट्स् रेझ. ); Vetiveria zizanioides (Linn.) Nash (वेटिवेरिया झाझेनिऑईडिस (लिन) नैश)। Fam, Gramineae ( ग्रैमिनी ) । यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह अधिकतर खुले हुये दलदल वाले स्थानों में होता है। खस-तृणजातीय औषधि का क्षुप २ से ५ फुट तक ऊँचा एवं दृढ होता है। यह गुच्छबद्ध और समूह बद्ध होकर उगता है। पत्ते-सरकण्डें के समान १-२ फुट लम्बे और पतले होते हैं। ये दो कतारों में तथा आधार पर परस्पराच्छादित रहते हैं। मूलीयपत्र कुछ अधिक लम्बे रहते हैं। मध्यशिरा दबी हुई तथा पत्तों के किनारों पर दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटे रहते हैं। फूलों का घनहरा पीलापन या किञ्चित् लाली युक्त होता है। इसकी जड़ सुगन्धित होती है। इसी को खस कहते हैं। औषध के अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में इसके बने परदे एवं पंखों आदि का उपयोग किया जाता है। सुगन्धि के लिये इसके इत्र का भी बहुत व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, राल, रंजक पदार्थ, अम्लद्रव्य, चूने का लवण, लोहभस्म तथा काष्ठयुक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खस शीतल, तिक्त, स्तम्भक, पाचक, पित्तनाशक, मूत्रजनक, पसीने की दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वरहर, दाहशामक, स्तन्यजनक, वमन को रोकने वाला, श्रमहर एवं जल को सुगन्धित करने वाला है। इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, विष, स्वेद दुर्गन्ध, वमन, कुष्ठ एवं आमाशयिक प्रक्षोभ आदि में किया जाता है। इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है। ( १ ) वमन को रोकने के लिये ३ तो० खस को १ पाव उबलते जल में डालकर उसके फांट को पिलाते हैं। इसके साथ धनियाँ का भी उपयोग लाभदायक है। विसूचिका में वमन रोकने के लिये २ बूँद इत्र बताशा में भरकर खिलाते हैं। ( २ ) पसीने की अधिकता तथा मसूरिका में इसका लेप किया जाता है। ( ३ ) लोहबान के साथ चिलम में रखकर या सिगरेट बनाकर इसका धूम्रपान करने से शिरःशूल दूर होता है। मात्रा-२-४ माशा।