भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः
(३) गर्भाशय उत्तेजक होने के कारण प्रसूति के समय आवि वृद्धि के लिये पिपरामूल एवं भांग के साथ इसका प्रयोग करते हैं। अत्यार्तव में गर्भाशय की शिथिलता कम करने के लिये अशोक के साथ इसे देते हैं।
(४) रक्तस्राव में इसके क्वाथ से लाभ होता है। फुफ्फुस एवं गर्भाशय से रक्तस्राव में इसका प्रयोग करते हैं।
(५) प्रतिश्याय तथा एन्फ्लुएंजा में इसके तैल को मिश्री के साथ या कॅपसूल में भरकर खिलाते हैं तथा रुमाल पर डालकर सूंघने को देते हैं।
(६) इसके तैल को दांत के गढ़े में रखने से दर्द दूर होता है। नाडीशूल एवं जिह्वा के लकवे में इसका प्रयोग किया जाता है। चूसने वाली गोलियों में सुगंध द्रव्य के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
(७) बड़ी मात्रा में दालचीनी का उपयोग कैन्सर में किया गया है। औषध के अतिरिक्त मसालों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। तैल को सुगंध द्रव्य रूप में बहुत व्यवहार करते हैं तथा औषध संरक्षण के रूप में भी कभी-कभी व्यवहार किया जाता है।
मात्रा— चूर्ण २ई–१० र०; तैल १–३ बूंद।
अथ पत्रकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
पत्रं तमालपत्रञ्च तथा स्यात्पत्रनामकम् । पत्रकं मधुरं किञ्चित्तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं लघु ॥ निहन्ति कफवाताशौहल्लासारुचिपीनसान् ॥ ६८ ॥
तेजपात के नाम तथा गुण— पत्र, तमालपत्र, पत्रनामक (अर्थात् पत्रवाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवम् पत्रक ये सब 'तेजपात' के संस्कृत नाम हैं। तेजपात–मधुर रसयुक्त, किञ्चित् तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पिच्छिल और लघु होता है एवम् यह कफ, वात, अर्श, हल्लास (उबकाई), अरुचि तथा पीनस इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ ६८ ॥
२७ तेजपात
हि०— तमालपत्र, पत्रज, तेजपत्ता, तेजपत्र, गुरन्द्रा । बं०— तेजपत्र । म०— तमालपत्र । ते०— आकुपत्री, तालीस पत्री । ने०— चेटा सिंकौली । गु०— तमालपत्र । आसा०— दोपती । ता०— कटड्डु-करुवपत्तै । अ०— साजजेहिन्दी । ले०— Cinnamomum tamala Nees & Eberm (सिर्नमोमम् तमाल नीज, एवर्म)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)।
इसका वृक्ष हिमालय में ३ से ७ हजार फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। मौतारगढ़ में ये समुद्बद्ध होकर बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। पूर्वी बंगाल तथा खासिया एवं जैन्तिया पहाड़ियों पर तथा बर्मा में भी पाये जाते हैं।
इसका वृक्ष मध्यमाकार का, करीब २५ फीट ऊंचा, साढ़े चार फीट के घेरे में एवं सुगन्धयुक्त होता है और वह बारहो मास हरा भरा रहता है। छाल-पतली, शिकनदार, खुरदरी, गहरे भूरे रंग की वा कृष्णाभ होती है। काट-आधा इञ्च मोटा, गुलाबी या ललाई लिये हुये भूरे रंग का और बाहर की ओर श्वेत रेखांकित होता है। पत्ते–प्रायः ५–८ इञ्च लम्बे, २–३ इञ्च चौड़े, लट्ट्वाकार–आयताकार या–भालाकार, नोकदार, चिकने, चर्मवत, विपरीत या एकान्तर तथा आधार से अग्रतक ३ शिराओं से युक्त एवं ७.५–१३ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से
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कर्पूरादिवर्गः २२६
युक्त होते हैं। नवीन पत्तियां कुछ-कुछ गुलाबी रंग की रहती हैं। फूल–७.५ मि० मि० लंबे, हल्के पीताभरंग के, ५–१५ से० मी० लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों (Panicles) में रहते हैं। परिपुष्प खंड ६, आयताकार, सिल्क की तरह मृदुरोमश जो पुष्पित होने पर मध्य के नीचे से टूट जाते हैं। पूर्ण पुंकेसर ९ रहते हैं। फल–आध इंच लंबे, अंडाकार, मांसल एवं काले रंग के रहते हैं। ये फल कुछ बढ़े हुये परिपुष्प नाल पर लगे रहते हैं जिनके परिपुष्प खंड अग्रपर कटे हुए (Truncated) मालूम पड़ते हैं।
इसके सूखे हुए अपक्व फल का काला नागकेशर नाम से दक्षिण भारत में व्यवहार होता है। अर्श के लिए यदि नागकेशर का प्रयोग करना हो तो इसका प्रयोग अधिक उचित मालूम होता है क्योंकि तमाल पत्र के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख मिलता है।
इसकी छाल को हि०–तज, बं–दालुका तथा अ०–मलीखा कहते हैं। यही भारतीय दालचीनी है जिसको सिलोनी दालचीनी के स्थान पर या मिलावट के रूप में उपयोग में लाते हैं। इसी के पत्ते तेजपात या तमालपत्र नाम से अधिकतर बेचे जाते हैं। कुछ लोगों के मत से तेजपात तथा तज अलग-अलग वृक्षों के पत्ते तथा छाल हैं। इसकी छाल सिलौनी दालचीनी की अपेक्षा मोटी, तेजी में कम तथा जल के साथ पीसने से पिच्छिलता युक्त हो जाती है। नवीन मत से सिलौनी तथा चीनी दालचीनी के गुण पहले लिखे जा चुके हैं तथा भारतीय के गुणों में नवीन दृष्टि से कोई विशेष अन्तर न होने के कारण इनको अलग नहीं लिखा है।
नोट :– भावप्रकाशकार त्वक्पत्र (तज) के गुणों में 'पित्तलं' तथा 'शुक्रहृत्' लिखते हैं। दारुसिता (सिलोनी दालचीनी) के गुणों में 'पित्तहृत्' एवं 'शुक्रला' लिखते हैं। दारुसिता के अन्य नाम 'स्वादी', 'तनुत्वक्' लिखे हैं जिससे दारुसिता यह सिलोनी दालचीनी होगी ऐसा लगता है। इस दृष्टि से सिलोनी तथा भारतीय दालचीनी के गुण भावप्रकाशकार के मत से बिलकुल अलग हैं। भावप्रकाशोक्त तीसरे द्रव्य पत्रक (तेजपात) के गुण त्वक्पत्र से मिलते-जुलते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि त्वक्पत्र (तज, भारतीय दालचीनी) के वृक्ष के पत्ते ही तेजपत्र हैं।
रासायनिक संगठन— इसमें एक प्रकार का लौंग के समान गन्ध वाला उड़नशील तैल पाया जाता है।
गुण और प्रयोग— तेजपत्र उष्ण, लघु, वातहर, दीपन, स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा उत्तेजक हैं। इसका प्रयोग कफ, वात, अर्श, हल्लास, अरुचि एवं पीनस में किया जाता है। कुपचन, उदरस्थवायु, उदरशूल एवं अतिसार आदि पाचननलिका के रोगों में, सब तरह के कफविकारों में एवं गर्भाशय की शिथिलता में इसका उपयोग करते हैं। गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान होने के लिये तथा गर्भस्राव न हो इसलिये इसका प्रयोग करते हैं। यह वातहर होने के कारण बच्चों के सभी प्रकार के रोगों में एवं आमवात में इसको खिलाते हैं।
मात्रा— १-४ माशा ।
अथ नागकेशरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
नागपुष्पः स्मृतो नागः केशरो नागकेशरः । चाम्पेयो नागकिञ्जल्कः कथितः काञ्चनाह्वयः ॥
नागकेशर के नाम तथा गुण— नागपुष्प, नाग, केशर, नागकेशर, चाम्पेय, नागकिञ्जल्क तथा काञ्चनाह्वय (काञ्चन के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) ये सब पुँल्लिङ्गी शब्द 'नागकेशर' वृक्षवाची हैं ॥ ६९ ॥
२३० भावप्रकाशनिघण्टुः क्लीवं पुष्पे तु क्लीवे ॥ ६९ ॥
किन्तु यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि यदि उक्त सभी शब्द नपुंसकलिंगी हों तो 'नागकेसर के पुष्प' को कहने वाले होते हैं ॥ ६९ ॥
नागपुष्पं कषायोष्णं रूक्षं लघ्वामपाचनम् ॥ ७० ॥ ज्वरकण्डूतृषास्वेदच्छर्दिहृल्लासनाशनम् । दौर्गन्ध्यकुष्ठवीसर्पकफपित्तविषापहम् ॥ ७१ ॥
नागकेशर (नागकेशर का फूल) - कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, रूक्ष, लघु तथा आम को पचाने वाला होता है एवं यह ज्वर, खुजली, तृषा, पसीना, वमन, हृल्लास, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विसर्प, कफ,
पित्त और विष को दूर करने वाला होता है ॥ ७०-७१ ॥ २८ नागकेसर (१)
हि०-नागकेसर, नागेसर, पीला / नागकेशर, नागचम्पा । बं०-नागेश्वर । म०-नागकेसर, नागचांफा (वृक्ष) । गु०-पीळु नागकेसर । क०-नागसम्पिगे । ते०-नागकेसरमु । ता०-चेरू
नगपू । अ०-मिस्रूरुम्मान । फा०-नारेमुश्क । अं०-Cobra's Saffron (कोबराज सैक्रॉन) । ले०-Mesua ferrea Linn. (मेसुआ फेरिआ लिन) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) ।
यह पूर्वी हिमालय, आसाम, बङ्गाल, दक्षिण हिन्दुस्तान और पूर्व बंगाल के पहाड़ों पर पाया जाता है । इसको बगीचों में भी लगाया जा सकता है ।
इसका छोटा सुन्दर वृक्ष होता है और वह सदा हराभरा रहता है। स्तम्भ-सीधा, छाल- चिकनी और राख के रङ्ग की होती है । पत्ते-विपरीत, ३ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १-१।। इञ्च
चौड़े, आयताकार-भालाकार एवं तीक्ष्णाग्र युक्त होते हैं । इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला और नीचे का श्वेताभ तथा रज से आवृत होता है। शिराएँ सघन और स्पष्ट होती हैं। नये पत्ते लाल
रंग के होते हैं । फूल-१ से ३ इञ्च के घेरे में सफेद रङ्ग के सुगन्धयुक्त वसन्त ऋतु में आते हैं । इनमें अन्तर्दल चार होते हैं। इन्हीं फूलों के भीतर के पीले केसरिया रंग के नरकेसर के
गुच्छ को नागकेसर कहते हैं। यही असली (पीला) नागकेशर है जिसका औषध में व्यवहार करना चाहिये। फल-एक इञ्च से बड़े, अंडाकार तथा कुछ तुर्कीके एवं प्रवृद्ध बाह्यदल से घिरे
हुये होते हैं। एक-एक फल से १ से ४ तक चिकने, कोणयुक्त एवं भूरे रंग के बीज निकलते हैं। नोट-नागकेसर के सम्बन्ध में लोगों में भ्रम है । अधिकांश विद्वानों ने उपर्युक्त मेसुआ
फेरिआ के पुष्पों के नरकेसर गुच्छ को नागकेसर माना है जिसके गुण एवं प्रयोग यहाँ दिये गये हैं । इसी वर्ग के दक्षिण की तरफ होने वाले वृक्ष ओक्रोकार्पस लोंगिफोलियस (Ochrocarpus
longifolius) की पुष्प-कलिकाओं को लाल नागकेशर के नाम से बेचा जाता है। इसी प्रकार काला नागकेशर के नाम से भारतीय या चीनी दालचीनी के फल बेचे जाते हैं जिसके गुण
दालचीनी के समान ही होते हैं। एक बात ध्यान देने की यह है कि नागकेसर के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख नहीं है। चरक में तथा व्यवहार में रक्तार्श के लिये इसका प्रयोग मिलता है।
तज के गुणों में अर्श का उल्लेख है तथा उसके फल का उपयोग काला नागकेशर नाम से व्यवहार में कहीं-कहीं आता है। मेसुआ फेरिआ के गुणादि के पश्चात् ओक्रोकार्पस् लोंगिफोलियस का
वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक तैलीय राल रहती है जिससे सुगंधित, हल्के
पीले रंग का एक उड़नशील तेल प्राप्त होता है। कठोर फलभित्ति में टैनिन रहता है। बीजों कर्पूरादिवर्गः २३१
में एक स्थिर तैल पाया जाता है। राल मद्यसार में कम घुलती है लेकिन बेन्झॉल में संपूर्णतया घुलती है। इसके अतिरिक्त इसमें दो कड़वे पदार्थ भी पाये जाते हैं ।
गुण और प्रयोग-नागकेसर संग्राहक, गर्भस्थापक, किंचित् उष्ण, रक्तसंग्राहक, आमपाचक एवं दीपक है। इसकी छाल तथा मूल तिक्त एवं सुगन्धि हैं। इसकी छाल कुछ संग्राहक होती है।
इसके कच्चे फल सुगन्धि, कटु तथा विरेचक होते हैं। (१) रक्तार्श में मक्खन तथा मिश्री के साथ इसे खिलाने से रक्त गिरना बन्द हो जाता है ।
शतधौत घृत में मिलाकर इसमें लेप भी किया जाता है । (२) गुद द्वार की जलन, रक्तातिसार, वमन, हिका, तृष्णा, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अति-
स्वेद आदि में नागकेसर का प्रयोग करते हैं। (३) बहुत कफयुक्त खांसी में इसे देते हैं ।
(४) अतिस्वेद में इसका लेप या इसके सूक्ष्म चूर्ण का भी बाह्य प्रयोग किया जाता है । (५) इसकी छाल एवं मूल का क्वाथ खांसी एवं आमाशय प्रक्षोभ (Gastritis) में दिया
जाता है । (६) तीव्र प्रतिश्याय में इसके पत्तों का उपनाह सर पर लगाते हैं ।
(७) इसके बीजों का तैल शरीर की पीड़ा, जोड़ों में दर्द तथा खुजली (पामा) एवं अन्य चर्मरोगों में लगाया जाता है ।
(८) इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग बिच्छू एवं सर्पदंश में किया जाता है । (९) हाथ-पैरों की जलन में नागकेशर को शतधौत घृत में मिलाकर लगाने से जलन
दूर होती है । मात्रा - ४ र० से १ माशा ।
लाल नागकेशर (२) सं०-सुरपुन्नाग, नमेरु, सुरपर्णिका । हि०-लाल नागकेशर । म०-सुरंगी (वृक्ष), गोडी उंडी
(फल), तांबडे नागकेशर । गु०-रांतु नागकेशर । अं०-Alexandrian Laurel (अॅलेक्झं- न्ड्रियन् लॉरेल ) । ले०-Ochrocarpus longifolius Benth. & Hook. f. (ओक्रोकार्पस्
लाँगिफोलिअस् बेन्थ, हुक्) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) । यह पश्चिम प्रायद्वीप के जंगलों में कनारा से कोंकण तक पाया जाता है। उत्तरी सरकार
में यह लगाया हुआ मिलता है । इसका वृक्ष साधारण ऊँचा तथा सदाइरित होता है। पत्ते-५-८ इंच लम्बे, १।।-२।। इंच
चौड़े, आयताकार, मोटे, चर्मवत् एवं सुन्दर शिराजाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अनेक, ४ अन्तर्दल वाले, लाल रेखांकित, श्वेत रंग के, गुच्छों में आते हैं। फल-१ इंच लंबे, अण्डाकार, नुकीले
तथा एक बीज से युक्त होते हैं। फलों के गूदरे को लोग खाते हैं। सूखी हुई पुष्पकलिकाओं को लाल नागकेशर कहा जाता है। यह गोल, नुकीले, नारंगरक्त रंग के तथा करीब ३ इंच
लम्बे पुष्पवृन्त से युक्त होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग असली नागकेशर (मेसुआ फेरिआ) के स्थान पर किया
जाता है । गुणों में उसके समान होते हुए भी यह कुछ न्यून गुण वाला है । इसके पुष्पों का अर्क निकालकर ज्वर में रोगी के स्नान के लिये प्रयोग करते हैं। इससे रोगी को आह्लाद मालूम होता
२३२ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह उत्तेजक, सुगन्धि, ग्राही, कडुवा एवं दीपन है। अत्यधिक प्यास, आमाशयिक प्रक्षोभ, अर्श, कुपचन तथा अतिसार में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा-१-३ माशा । नोट-कुछ लोग इसी वर्ग के पुन्नाग वृक्ष की कलिकाओं का भी उपयोग नागकेशर के नाम से करते हैं। इसे ले०-Calophyllum inophyllum Linn. (कॅलोफाइलम् आइनोफाइलम् लिन); हिं०-सुलतानचंपा; म०-उंडी, उंडल कहते हैं। इसका बहुत सुन्दर वृक्ष दक्षिण भारत के समुद्री किनारे पर तथा अन्य स्थानों पर लगाया हुआ मिलता है। पत्ते-बड़ के पत्र जैसे लम्बगोल ४ से ६ इञ्च लम्बे तथा २ से ४ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के चार दल वाले और सुगन्धित होते हैं। फल-गोल, १ से १ १/२ इञ्च लम्बे, चिकने तथा पीले रंग के आते हैं। इसके बीजों से तैल निकालते हैं, जिसे सर्पन का तैल कहते हैं। पुन्नाग-यह मधुर, शीत, सुगन्धि और पित्तनाशक है। इसका तैल पुराने संधिवात में मालिश करते हैं। खुजली तथा सर की फुन्सियों में तैल लगाते हैं। सोज़ाक में इस तैल को खिलाते हैं।
अथ त्रिजातकं चातुर्जातकं च । तयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धि त्रिजातकम् । नागकेशरसंयुक्तं चातुर्जातकमुच्यते ॥ ७२ ॥ तद् द्वयं रोचनं रूक्षं तीक्ष्णोष्णं मुखगन्धहृत् । लघुपित्ताग्निकृद्वर्ण्य कफवातविषापहम् ॥७३॥ 'त्रिजातक' तथा 'चातुर्जातक' बोधक द्रव्य तथा उनके एकत्र गुण-दालचीनी, इलायची और तेजपात इन्हीं तीनों द्रव्यों का समभाग में योग होने से उसे 'त्रिसुगन्धि' या 'त्रिजातक' कहते हैं और यदि उन्हीं द्रव्यों में समभाग से 'नागकेशर' भी मिला दी जाय तो उसे 'चातुर्जातक' कहते हैं। त्रिजातक तथा चातुर्जातक-रुचिकारक, रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मुख की दुर्गन्ध को दूर करने वाले, लघु, पित्त तथा अग्निवर्धक, वर्ण्य (शरीर के रङ्ग को उत्तम करने वाले), कफ, वात तथा विष को नष्ट करने वाले होते हैं ॥ ७२-७३ ॥
अथ कुङ्कुमम् ( केशर ) । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणाँश्चाह कुङ्कुमं घुसृणं रक्तं काश्मीरं पीतकं वरम् । संकोचं पिशुनं धीरं बाह्लीकं शोणिताभिधम् ॥ काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवेद्धि तत् । सूक्ष्मकेशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम् ॥७५॥ बाह्लीकदेशसंजातं कुङ्कुमं पाण्डुरं स्मृतम् । केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम् ॥७६॥ कुङ्कुमं पारसीकं यन्मधुगन्धि तदीरितम् । ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ॥७७॥ कुङ्कुमं कटुकं स्निग्धं शिरोरोगव्रणजन्तुजित् । तिक्तं वमिहरं वर्ण्यं व्यङ्गदोषत्रयापहम् ॥७८॥ केशर के नाम-कुङ्कुम, घुसृण, रक्त, काश्मीर, पीतक, वर, सङ्कोच, पिशुन, धीर, बाह्लीक और शोणिताभिध (रक्तवाची सभी शब्द ) ये सब केशर के संस्कृत नाम हैं। देश भेद से केशर की उत्तमता एवं उसके लक्षण-काश्मीर देश के खेतों में जो 'केशर' उत्पन्न होता है वह सूक्ष्म केशरों से युक्त, कुछ रक्त वर्ण वाला तथा कमल की समान सुन्दर गन्ध से युक्त होता है एवं वह 'उत्तम' माना जाता है। जो 'बाह्लीक' (बुलारा) देश में उत्पन्न होने वाला 'केशर' होता है वह पाण्डुर (शुक्ल तथा पीतवर्ण युक्त) वर्ण का एवं 'केतकी' के समान गंध
कर्पूरादिवर्गः २३३ से युक्त होता है। यह सूक्ष्म केशरों से युक्त होता है और 'मध्यम' माना जाता है। जो 'पारसीक' (फारस) देश में उत्पन्न होने वाला केशर होता है वह मधु (शहद) के समान गन्ध वाला, कुछ पाण्डुर वर्णयुक्त तथा मोटे केशरों से युक्त होता है और वह 'अधम' माना जाता है। केशर-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध और वर्ण्य (शरीर के वर्ण के लिये हितकर) होता है तथा यह शिरोरोग, व्रण, कृमि, वमन, व्यङ्ग (झाईं) तथा त्रिदोष इन सबों को नष्ट करने वाला होता है ॥ ७४-७८ ॥
२९ केशर हिं०-केशर । म०, गु०-केशर । बं०-जाफरान । क०-कुङ्कुम । ते०-कुङ्कुम पुव । ता०- कुङ्कुमपु । फा०-करकीमास । अ०-जाफरान । अं०-Saffron (सॅफ्रॉन) । ले०-Crocus sativus Linn. (क्रोकस् सेटाइवस् लिन.)। Fam. Iridaceae (इरिडेँसी)। केशर का नैसर्गिक उत्पत्ति स्थान दक्षिण योंरप है। यह स्पेन से बम्बई में बहुत आता है और भारतवर्ष के बाजारों में बिकता है। ईरान, स्पेन, फ्रान्स, इटली, ग्रीस, तुर्की, चीन और फारस आदि देशों में इसकी खेती की जाती है। हमारे देश के काश्मीर में पम्पूर (४३०० फीट नामक स्थान पर तथा जम्मू के किश्तवाड़ में इसकी खेती की जाती है। यहाँ का उत्पन्न हुआ केशर भाव- प्रकाशकार की दृष्टि से सर्वोत्तम समझा गया है। इसका बहुवर्षायु क्षुप १।। फुट तक ऊँचा होता है। जड़ के नीचे प्याज के समान गांठदार कन्द (Corm) होता है। इसमें कांड नहीं होता। पत्ते-घास के समान लम्बे, पतले, पनालीदार और जड़ ही से निकले हुए मूलपत्र (Radicle leaf) रहते हैं। इनके किनारे पीछे की तरफ मुड़े हुए होते हैं। आश्विन कार्तिक में इस पर फूल आते हैं। फूल-एकाकी या गुच्छों में, नीलोलोहित वर्ण के, पत्तों के साथ ही शरद्ऋतु में आते हैं। नीचे के पत्रकोश (Spathe), पुष्पध्वज (Scape) को घेरे रहते हैं तथा दो हिस्सों में विभक्त रहते हैं। परिपुष्प (Perianth) निवापसम (Funnel-shaped), नाल (Tube) पतला, दल ६ खण्डों में विभक्त दो श्रेणियों में एवं नाल का कण्ठ श्मश्रुल (बालों से युक्त) रहता है। कण्ठ पर ३ पुंकेशर (Stamen) रहते हैं एवं परागशय (Anther) पीतवर्ण का रहता है। कुक्षिवृन्त (Style) परिपुष्प के बाहर निकले हुए (Exserted), नारंगारक्त रंग के, मुद्रराकार, अखण्ड या खण्डित रहते हैं। फल-सामान्य स्फोटी फल (Capsule) आयताकार एवं बीज गोल होते हैं। इन फूलों के स्त्री केशर के सूखे हुए अग्रभाग जिन्हें कुक्षि (Stigma) कहा जाता है उन्हें ही केशर कहते हैं। कुक्षि (Stigma) ३, कुक्षिवृन्त के ऊपर लगी हुई या अलग, करीब १ इञ्च लम्बी गहरे लाल से लेकर हलके रक्ताभ भूरे रंग की एवं सामान्य दन्तुर या लहरदार होती है। कुक्षिवृन्त (Styles) करीब १ से. मि. लम्बे, करीब-करीब रम्भाकार, ठोस, पीताभ भूरे से लेकर पीताभ नारंगी रंग के रहते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र सुगन्ध रहती है तथा इसका स्वाद सुगन्धि तथा कड़वापन लिये हुए होता है। केशर के पौधे को बीज या उसके कन्द द्वारा लगाया जा सकता है। साधारणतः १ एकड़ भूमि से करीब ५०-५५ पौंड ताजा केशर प्राप्त होता है जो सूखने पर १०-११ पौंड रह जाता है। इसकी खेती तथा माल के तैयार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता रहती है। सूर्योदय के पहले जब फूल लगभग खिलने को होते हैं तब उनको तोड़ लेते हैं। उसमें से केशर को तोड़कर छलनी में डालकर मन्द आंच पर सुखाते हैं। केशर को हमेशा प्रकाशहीन बन्द पात्र में रखना चाहिये।
यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:
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२३४ | भावप्रकाशनिघण्टुः
रासायनिक संगठन— केसर में एक स्नेहीय तैल ८-१३%, करांव १% उड़नशील तैल, एक रंगहीन कडुवा पिकोक्रोसिन (Picrocrocin) नामक ग्लाइकोसाइड् एवं क्रोसेटिन (Crocetin) नामक रंजक द्रव्य का क्रोसिन (Crocin) ग्लाइकोसाइड् ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्रोसेटिन नामक रवेदार रंजक द्रव्य ३ प्रकार का होता है। अॅल्फा क्रोसेटिन ($\alpha$-crocetin, $C_{24} H_{28} O_{5}$) ०.७%, बीटा क्रोसेटिन ($B$-crocetin, $C_{25} H_{30} O_{5}$) ०.७%, एवं गामा क्रोसेटिन ($\gamma$-crocetin, $C_{26} H_{32} O_{5}$) ०.३% रहता है। क्रोसिन (Crocin) यह लाल रंग का चूर्ण होता है जो जल तथा मद्यसार में आसानी से घुल जाता है। संकेन्द्रित गन्धक के तेजाब में इसका गहरे नीले रंग का घोल बनता है जो रखने पर नील लोहित, रक्त तथा अन्त में भूरे रंग का हो जाता है। शोरे के तेजाब से यह हरे रंग का हो जाता है।
गुण और प्रयोग— केसर उष्ण, सुगन्धि, दीपन, पाचन, उद्वेष्टन-निरोधि, मनःप्रसादकर, रुचिकर, वर्ण्य, वश्य, कामोत्तेजक, विषघ्न, आर्तवजनक, मूत्रल एवं अल्प वेदनाहर है। आमाशयोत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधि गुणों के लिये यह बहुत प्रसिद्ध है तथा यह श्रेष्ठ उत्तेजक एवं वृष्य औषध मानी जाती है। यह वातनाड़ियों के लिये शामक है। सुगन्धित रंजक द्रव्य के रूप में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके उड़नशील तैल में अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही गुण होते हैं।
इसका उपयोग अतिसार, शूल, मूत्रकृच्छ्र, अनार्तव, पीडितार्तव, कास, श्वास, कण्ठरोग, यकृत-विकार, आमवात, नाड़ीशूल एवं शिरोरोगों में किया जाता है।
- (१) पीडितार्तव में इसको पूर्ण मात्रा में देने से शूरु कम होता है तथा भार्तव स्राव ठीक होने लगता है। गर्भाशय के पीड़ा युक्त विकारों में इसकी गोली योनि में धारण कराई जाती हैं। स्तनों पर इसके लेप से दूध बढ़ता है।
- (२) मूत्राघात में १ तोला केशर मधुयुक्त जल में रात में भिगो कर सुबह उसे पिलाने से लाभ होता है। (सु. उ. अ. ५८-३०)
- (३) बच्चों की सरदी में गरम दूध में केशर खिलाते हैं, तथा ललाट एवं छाती पर लगाते हैं।
- (४) केसर तथा शर्करा को घृत में भून कर उसके नस्य से सूर्यावर्त एवं अर्धावभेदक आदि में लाभ होता है। शिरःशूल में इसे मस्तक पर लगाते हैं।
- (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं।
- (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदर शूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं।
प्रमाप तथा परीक्षा— केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हों। कुक्षिकृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्र्गैनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता—इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी. सी. जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१%
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पोटैशियम डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या इससे कम नहीं होनी चाहिये।
व्यामिश्रण— इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिकृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस) के मेथिल् आरेज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी-कभी सत्व निकाला हुआ केसर रंग कर के बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, गिलसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं।
मात्रा— २-४ र०।
अथ गोरोचना । तस्या नामानि गुणांश्चाह
गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना । गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा । विषाऽलक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ॥ ७९ ॥
गोरोचन के नाम तथा गुण— गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन—शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है ॥ ७९ ॥
३० गोलोचन
- हि०— गोलोचन, गोरोचन ।
- बं०— गोरोचना ।
- म०— गोरोचन ।
- गु०— गोरुचन्दन, गोरोचन ।
- ते०— गोरोचनमु ।
- ता०— गोरोचनम् ।
- फा०— संगगाव ।
- अ०— हजरुल बकर ।
- अं०— Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन) ।
- ले०— Bezoar (बेझोर) ।
गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से परतदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी किसी का रङ्ग नारंगी या लाल युक्त होता है। इसी प्रकार किसी किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी।
इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है।
गुण और प्रयोग— गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, विषहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है।
इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है।
२३६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १ ) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुन- राक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं । यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं । ( २ ) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है । ( ३ ) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है । मात्रा—१-२ र० । नोट—पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है । गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है । ले०-Extractum fellis bovini ( एक्स्ट्रैक्टम् फेलिस् बोहिनि )। अं०-Purified Ox- Gall ( प्यूरिफाइड ऑक्स-गॉल् )। हि०-गो या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा । ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार ( ९०% ) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इनमें पित्त के लवण तथा रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है । इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है । जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (विटामिन्) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्रॉम्बिन् ( Prothrombin ) के निर्माण के लिये भिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा-५-१५ ग्रेन । अथ नखं नखी च ( गन्धद्रव्यम् ) तयोर्नामानि गुणांश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ॥ ८० ॥ नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी । नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ॥ ८१ ॥ लघूष्णं शुक्लं वर्ण्य स्वादु व्रणविषापहम् । अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ॥ ८२ ॥ सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण-नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख-ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्ताविकार (किंता वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक, एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं ॥ ८०-८२ ॥ कर्पूरादिवर्गः २३७ ३१ नख-नखी हि०-नख, नखी, छोटा नख । बं०-नखी गन्ध द्रव्य, छोट नखी । म०-नखला, वाघनख । ते०-नखमुच्चिप्प । गु०-नखला, सावजना नख । क०-नख, बाघमख । फा०-नाखून पर्यां । अ०-अजफारुतिब, इकलिलुल मुलुक । अं०-Land snail (लैंड स्नेल)। ले०-Helix aspera (हेलिक्स अॅस्पेरा); Achatina fulica (ॲचॅटिना फूलिका) । नख एक सुगन्धि द्रव्य है। यद्यपि इसे नख, व्याघ्रनख आदि नाम दिये गये हैं तथापि यह किसी जानवर का नाखून नहीं है। यह एक प्रकार के सीप की जाति के समुद्री जीव के मुख के ऊपर का आवरण है जो नख सदृश होने के कारण नख कहा जाता है। भावप्रकाशकार ने इनके दो भेद लिखे हैं। बड़े को नख या व्याघ्रनख तथा छोटे को नखी लिखा है। अन्य ग्रन्थों में नखी के आकृति के अनुसार ५ भेद लिखे हैं। बेर के पत्ते के सदृश, कमलदल सदृश, घोड़े के खुर की आकृति के, हाथी के कान के समान आकार वाले तथा सुअर के कान के समान ये पांच प्रकार होते हैं। इनमें से सुअर के कान के समान निषिद्ध माना गया है। कुछ लोगों ने हाथी के कान सदृश और घोड़े के खुर के समान आकृति वाले नख का उपयोग गन्धयोगों में तथा बेर या कमलदल सदृश नख का उपयोग धूपन में बतलाया है। यह गहरे भूरे रंग का तथा अनेक पटलों से बना हुआ कठोर, अपारदर्शक तथा नख के सदृश होता है। इसके उन्नतोदर पृष्ठ पर परत साफ दिखलाई देते हैं। इसको जलाने से दुर्गन्ध आती है लेकिन तैल के साथ पकाने से तैल सुगन्धित होता है। अन्य ग्रन्थों में इसके शोधन का विधान मिलता है। भैंस के गोबरयुक्त जल, तिन्त्रिड़ी जल या मृत्तिकायुक्त जल के साथ स्वेदन करके, प्रक्षालन करने के पश्चात् भून कर गुड़हरीतकी मिले जल में बुझाते हैं। फिर पीस कर उपयोग में लाते हैं। चरक में प्रायोगिक धूम्रपान की वर्ति के योग में (सू. अ. ५ श्लो. २०), श्वयथुचिकित्सा (चि. अ. १६) में शैलेयकादि तैल और प्रदेह में, महासुगन्धहस्ती नामक अगद के योग में (चि. अ. २३ ), अमृतादि तैल (चि. अ. २८) तथा वातरक्त चिकित्सा (चि. अ. २९) में शतपुष्पादि तैल के योग में अन्य द्रव्यों के साथ नख का प्रयोग लिखा है। सुश्रुत में एला- दिगण में व्याघ्रनख का उल्लेख है । तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका अधिक उपयोग होता है। अथ बालम् [ सुगन्धबाला ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह बालं ह्रीबेरबर्हिष्ठोदीच्यं केशाम्बुनाम च । बालकं शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् ॥ हृल्लासारुचिवीसर्पहृद्रोगामातिसारजित् ॥ ८३ ॥ सुगन्धबाला के नाम तथा गुण-बाल, ह्रीबेर, बर्हिष्ठ, उदीच्य, केशनाम (केशवाचक सभी शब्द), एवं अम्बुनाम (जलवाची सभी शब्द ) तथा बालक ये सब 'सुगन्धबाला' के संस्कृत नाम हैं। सुगन्धवाला-शीतवीर्य, रूक्ष, लघु, अग्निदीपक तथा पाचक होती है और यह हृल्लास (जीमिचलाना ), अरुचि, वीसर्प, हृद्रोग, आम तथा अतिसार इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ ८३ ॥ ३२ सुगन्धबाला हि०-सुगन्धवाला, नेत्रवाला । बं०-बाला । म०-काला वाला । गु०-वालो, कालो वालो । क०-बलरकसी-गिडा । ते०-मुत्तुपलागमु, प्ररांकुटी । ता०-पेरामुदिवेर । ले०-Pavonia odorata Willd. (पॅवोनिया ओडोरेटा विल्ड) । Fam. Malvaceae (मालवेसी) ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का पूर्ण एवं सटीक लिप्यन्तरण है:
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२३८ | भावप्रकाश निघण्टुः सुगन्धवाला - पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिन्ध, पश्चिम प्रायद्वीप और सिलोन में अधिक उत्पन्न होती है। इसके क्षुप में थोड़ी सी कस्तूरी की सुगन्ध रहती है। इसका क्षुप-सीधा तथा १॥-२ फीट ऊँचा होता है और समस्त क्षुप पर बारीक रोवें होते हैं। पत्ते-१ से ३ इञ्च लम्बे गोलाकार हृदयाकृति, कंधी के पत्तों के आकार वाले, ३ से ५ भागों में थोड़ी दूर तक विभक्त और ऊपर के पत्ते दन्तुर होते हैं। पत्तों को मसलने से चिपचिपापन मालूम होता है। शाखाओं के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। पुष्पद्दल-किञ्चित् हल्के गुलाबी रङ्ग के होते हैं। फल-अण्डाकृति, छोटे एवं चने बराबर होते हैं। बीज-भूरे रंग के, तैल से युक्त लेकिन गन्धहीन होते हैं। मूल-७-८ इञ्च लम्बे, प्रायः ऐंठे हुए तथा अधिक से अधिक ३/४ इञ्च मोटे, चिकने, भूरे रंग के तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहते हैं। इसमें कस्तूरी के समान सुगन्ध रहती है। औषध में इन्हीं मूलो का व्यवहार किया जाता है। नोट-बाजार में सुगन्धवाला के नाम से मिलने वाला गांठदार द्रव्य सुगन्धवाला नहीं है। उसे असली तगर मानते हैं। उसका वर्णन पहले किया गया है। कुछ लोगों ने इसके लैटिन नाम में खस का लैटिन नाम दिया है, वह उचित नहीं है। कुछ लोगों ने खस जाति के ही दूसरे तृण का लैटिन नाम सुगन्धवाला के लिए दिया है जिसको कुछ लोग खस का ही पर्याय मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें लुआबदार पदार्थ तथा उत्तेजक सुगन्धि द्रव्य है। गुण और प्रयोग-सुगन्धवाला शीतल, स्नेहन, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं बल्य है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, दाह, तृषा, हल्लास, वमन, अतिसार, व्रणशोथ एवं विसर्प में किया जाता है। ( १ ) किसी भी प्रकार के ज्वर में षडंग पानीय के रूप में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, श्वेत चन्दन, सुगन्धवाला एवं सोंठ का क्वाथ देने से ज्वर का दाह एवं प्यास कम हो जाती है। ( २ ) बेल के साथ इसका उपयोग संग्रहणी में लाभकर होता है। अतिसार में आदी के साथ इसको फाण्ड बना कर पिलाते हैं। बच्चों के अतिसार में चाँवल के धोवन के साथ मिश्री, मधु तथा सुगन्धवाला देते हैं। वमन, हल्लास आदि में भी तण्डुलोदक के साथ इसको देते हैं। ( ३ ) रक्तपित्त में चन्दन, मिश्री तथा तण्डुलोदक के साथ इसका प्रयोग किया गया है। ( ४ ) विसर्प में इसके चूर्ण को घृत के साथ लेप करते हैं। श्वित्र में इसकी जली हुई काली राख का लेप लाभदायक माना जाता है। मात्रा-३-६ माशा।
अथ वीरणम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह
स्याद्वीरणं वीरतर्वीरञ्च बहुमूलकम् । वीरणं पाचनं शीतं वान्तिहल्लघु तिक्तकम् ॥ ८४ ॥ स्तम्भनं ज्वरनुद् भ्रान्तिमदहत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पकृच्छ्रदाहव्रणापहम् ॥८५॥ वीरण अर्थात् गांडर घास के नाम तथा गुण-वीरण, वीरतरु, वीर और बहुमूलक ये नाम संस्कृत में वीरण के हैं। वीरण-पाचक, शीतवीर्य, वमन को दूर करने वाला, लघु, तिक्त रसयुक्त एवम् स्तम्भन होता है। यह ज्वर, भ्रमरोग, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, मूत्रकृच्छ्र, दाह और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८४-८५ ॥
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कर्पूरादिवर्गः | २३६
अथोशीरम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह
वीरणस्य तु मूलं स्यादाशीरं नलदञ्च तत् । अमृणालञ्च सेव्यञ्च समगन्धिकमित्यपि ॥८६॥ उशीरं पाचनं शीतं स्तम्भनं लघु तिक्तकम् ॥ ८७ ॥ मधुरं ज्वरहद्धान्तिमदनुत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पदाहकृच्छ्रव्रणापहम् ॥ ८८ ॥ खस के नाम तथा गुण - 'वीरण' नामक घास के जड़ को 'खस' कहते हैं। उसके संस्कृत नाम-उशीर; नलद, अमृणाल, सेव्य और समगन्धिक ये सब हैं। खस-पाचक, शीतवीर्य, स्तम्भन, लघु, तिक्त तथा मधुर रस युक्त होता है और यह ज्वर, वमन, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्र और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८६-८८ ॥
३३ वीरण-खस
हि०-खस, वीरण मूल, गांडर, बेना। बं०-वेणर मूल, खसखस । म०-वाला । गु०-वालो । क०-मुडिवाल । ते०-वट्टिवेलु । ता०-वैट्टिवेर । फा०-रेशये वाला, दीखेवाला । अं०-Cuscus grass (कसकस ग्रास ) ले०-Andropogon muricatus Retz. (एन्ड्रोपोगोन् म्युरिकैट्स् रेझ. ); Vetiveria zizanioides (Linn.) Nash (वेटिवेरिया झाझेनिऑईडिस (लिन) नैश)। Fam, Gramineae ( ग्रैमिनी ) । यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह अधिकतर खुले हुये दलदल वाले स्थानों में होता है। खस-तृणजातीय औषधि का क्षुप २ से ५ फुट तक ऊँचा एवं दृढ होता है। यह गुच्छबद्ध और समूह बद्ध होकर उगता है। पत्ते-सरकण्डें के समान १-२ फुट लम्बे और पतले होते हैं। ये दो कतारों में तथा आधार पर परस्पराच्छादित रहते हैं। मूलीयपत्र कुछ अधिक लम्बे रहते हैं। मध्यशिरा दबी हुई तथा पत्तों के किनारों पर दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटे रहते हैं। फूलों का घनहरा पीलापन या किञ्चित् लाली युक्त होता है। इसकी जड़ सुगन्धित होती है। इसी को खस कहते हैं। औषध के अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में इसके बने परदे एवं पंखों आदि का उपयोग किया जाता है। सुगन्धि के लिये इसके इत्र का भी बहुत व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, राल, रंजक पदार्थ, अम्लद्रव्य, चूने का लवण, लोहभस्म तथा काष्ठयुक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खस शीतल, तिक्त, स्तम्भक, पाचक, पित्तनाशक, मूत्रजनक, पसीने की दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वरहर, दाहशामक, स्तन्यजनक, वमन को रोकने वाला, श्रमहर एवं जल को सुगन्धित करने वाला है। इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, विष, स्वेद दुर्गन्ध, वमन, कुष्ठ एवं आमाशयिक प्रक्षोभ आदि में किया जाता है। इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है। ( १ ) वमन को रोकने के लिये ३ तो० खस को १ पाव उबलते जल में डालकर उसके फांट को पिलाते हैं। इसके साथ धनियाँ का भी उपयोग लाभदायक है। विसूचिका में वमन रोकने के लिये २ बूँद इत्र बताशा में भरकर खिलाते हैं। ( २ ) पसीने की अधिकता तथा मसूरिका में इसका लेप किया जाता है। ( ३ ) लोहबान के साथ चिलम में रखकर या सिगरेट बनाकर इसका धूम्रपान करने से शिरःशूल दूर होता है। मात्रा-२-४ माशा।
२४० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ जटामांसी । तस्या नामानि गुणांश्चाह जटामांसी भूतजटा जटिला च तपस्विनी । मांसी तिक्ता कषाया च मेध्या कान्तिबलप्रदा ॥ स्वादी हिमा त्रिदोषास्रदाहवीसर्पकुष्ठनुत् ॥ ८९ ॥ जटामांसी (बालछड़) के नाम तथा गुण— जटामांसी, भूतजटा, जटिला, तपस्विनी और मांसी ये सब संस्कृत नाम जटामांसी के हैं। जटामांसी (बाल छड़)-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मेधाजनक, कान्तिकारक, बलप्रद, स्वादिष्ट और शीतवीर्य होती है और यह त्रिदोष, रक्तप्रकोप, दाह, वीसर्प एवम् कुष्ठ को दूर करने वाली होती है ॥ ८९ ॥ ४४ जटामांसी हि०-जटामांसी, बालछड़ । बं०-,गु०-,म०-जटामांसी । ते०-जटामांशी । क०-जेटा- मावशीं । पं०-बिल्लीलोटन । ता०-जटामाशी । का०-भूतजटा । सु०-सम्बुल । फा०-नारदे हिन्दी । अ०-सुंबुलत्तीवे हिन्दी, सुम्बुले हिन्दो । अं०-Spikenard (स्पाइकनार्ड); Indian Nard (इण्डियन नार्ड); Nardus root (नार्डस् रूट) । ले०-Nardostachys jatamansi DC. (नार्डोस्टैकिस् जटामांसी डीसी.) । Fam. Valerianaceae (वैलेरियानेसी) । जटामांसी—यह हिमालय के जंगलों में कुमाऊँ से सिक्कम तक १७ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा भूटान में उत्पन्न होती है । इसका बहुवर्षायु क्षुप सीधा खड़ा रहता है । राइजोम (भौमिक तना) काष्ठमय, लम्बा, मजबूत एवं सूखे हुये रेशेदार पर्णवृन्त से युक्त रहता है । भूमि के ऊपर जड़ से कई शाखाए निकलती हैं और वे ५-७ अंगुल तक सघन बारीक जटाकार रोवें से भरी रहती हैं । पत्ते-जटा को छोड़ कर ऊपर ६-७ इञ्च लम्बे तथा १ इञ्च चौड़े, जड़ की ओर संकुचित, मृदु, रोमश या चिकने मूलीय पत्ते रहते हैं । काण्डपत्र-एक या दो जोड़े, १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त, आयताकार या उपलत्वाकार होते हैं । डंडियों के अन्त में सफेद या किंचित् गुलाबी रङ्ग के छोटे- छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं । फल-छोटे-छोटे गोल, सफेद रोयेंदार तथा उनके ऊपर बाह्यकोष के अंडाकार, तीक्ष्ण, दन्तुर बाह्यदल लगे रहते हैं । इसके सूखे हुये राइजोम (भौमिक तना) तथा मूल का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका मूल गहरे धूसर (Grey) रंग का, छोटी अँगुली के बराबर मोटा तथा रक्ताभ भूरे रंग के रोओं से युक्त होता है । ये रोएदार तन्तु इसके सूखे हुये पर्णवृन्त तथा मूल के भाग हैं जिनके आपस में मिलने से जटासी बन जाती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की होती है। इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गन्ध (असली तगर के समान) होती है तथा इसका स्वाद सुगन्धियुक्त कडुवा होता है। इसको हमेशा ताजी खरीदना चाहिये । नोट—अन्य निघण्टुओं में गन्धमांसी, आकाशमांसी, कृष्णा सुगन्धमांसी आदि भेद लिखे हुवे हैं । प्राचीन ग्रन्थों में इसके स्वतन्त्र उपयोग बहुत कम मिलते हैं । रासायनिक संगठन—इसमें का प्रधान तत्त्व एक उड़नशील तैल है जो ०.३-०.४% पाया जाता है । यह तैल हलके पीले रंग का कुछ हरिताभ, जल से हलका, हवा में जमने वाला, कपूर के समान गन्ध वाला, कडुवा तथा तीता होता है । इस तैल में ईस्टर, अल्कोहल तथा सेस्की टर्पेन हाइड्रोकार्बन पदार्थ होते हैं । इस तैल के अतिरिक्त जटामांसी में १% एक रवेदार किन्तु जल में न घुलने वाला अम्ल द्रव्य तथा राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—जटामांसी शीतल, सुगन्धि, दीपन, पाचन, बल्य, रक्ताभिसरणोत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधि, वातानुलोमक, मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, वातनाड़ीशामक, संज्ञास्थापन,
कर्पूरादिवर्गः २४१ मेध्य, त्रिदोषघ्न, केश्य, ज्वरहर, स्वेददोषहर, कान्तिवर्धक, वेदनास्थापन, हृदयबल्य एवं सौमनस्य जनन है । इसके सेवन से क्षुधा बढ़ती है, पाचन ठीक होता है किन्तु कोष्ठबद्धता नहीं होती । इसके सेवन से उदर में उष्णता मालूम होती है, डकार आती है, संपूर्ण शरीर में उष्णता मालूम होकर पसीना आता है, मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा नाड़ी सबल होती है। मस्तिष्क एव नाड़ी तन्तुओं पर इसकी पोषक तथा उत्तेजक क्रिया होती है। अल्प मात्रा में बहुत दिन देते रहने से मन की चञ्चलता शान्त होती है, काम करने में उत्साह बढ़ता है तथा नाड़ी का बल बढ़ता है । अपस्मार, अपतन्त्रक तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) मस्तिष्क तथा नाड़ी तन्तुओं के विकारों में जटामांसी बहुत लाभप्रद होती है। शरावियों को व्रण होने पर या उन पर कोई शस्त्रक्रिया करने पर उनको एक तरह का भ्रमणयुक्त कम्प उत्पन्न होता है। ऐसी अवस्था में जटामांसी के प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है। अत्यन्त मानसिक परिश्रम या असैथ्र्य से थकावट उत्पन्न होने पर इसका सेवन नाड़ियों के लिए बलकारक तथा श्रमहर होता है। अपतन्त्रक में इससे आवेग कम होते हैं । शिरःशूल के लिये यह उत्कृष्ट औषध है । मानसिक आघात में यह बहुत जल्दी काम करती है । हींग, कस्तूरी आदि की अपेक्षा जटामांसी इन विकारों में अधिक उपयोगी तथा शीघ्र कार्यकर मानी जाती है। भूतावेश जैसी चेष्टाओं में जटामांसी, ब्राह्मी स्वरस तथा घोडबच का मधु के साथ प्रयोग करते हैं। अपस्मार, अपतन्त्रक, हृदय की धड़कन, कम्पवात तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका फाण्ट बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इनमें इसे १ से २ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार पिलाते हैं। अपस्मार में इसके तैल का २-५ बूँद की मात्रा में सेवन कराया जाता है । (२) रक्ताभिसरण ठीक न होता हो तो यह बहुत ही उपयुक्त औषध है । इससे मस्तिष्कगत रक्तप्रवाह सन्तुलित होता है जिससे सर का भारीपन, चक्कर, मूर्च्छा, आँखों के सामने अंधियारी, सुनाई कम पड़ना आदि में लाभ होता है। हृदय की धड़कन, कमजोरी तथा हृदय के कारण उदर में वायु सञ्चित होने पर इसे सुगन्ध द्रव्य तथा नवसादर के साथ खिलाते हैं। इससे रक्त- वाहिनियों का संकोच होकर रक्तपित्त, विसर्प तथा रक्तस्राव में लाभ होता है। (३) जटामांसी ४, दालचीनी १, शीतलचीनी १, सौंफ १, सोंठ १ तथा मिश्री ८ भाग इनके चूर्ण को ३-९ माशे की मात्रा में आध्मान, शूल, आमाशयिक शूल तथा आक्षेपयुक्त विकारों में देते हैं। बच्चों के आध्मान, उदरशूल, सुशिक्षितों तथा नाजुक प्रकृति की स्त्रियों के मन्दशूल, कुपचन आदि पचन संस्थान के विकारों में जटामांसी और नवसादर के साथ सुगन्धि द्रव्यों को मिलाकर देते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर पाचन सुधरता है। (४) औपसर्गिक शोथयुक्त ज्वरों में त्रिदोष की वृद्धि होने से रोगी प्रलाप करता है तथा सन्निपात के लक्षण दिखलाई देने लगते हैं । इन अवस्थाओं में इसके प्रयोग से शीघ्र लाक्षणिक लाभ होता है। इससे रक्ताभिसरण ठीक होता है, नाड़ी तन्तुओं को बल मिलता है, कफ ढीला होता है, दाह कम होता है तथा शोथ में भी लाभ होता है। विषम ज्वर में भी इससे पर्याप्त लाभ होता है। (५) विस्फोट एवं व्रणों में इसके लेप से जलन तथा पीडा कम होती है। मुखपाक में भी इससे जलन तथा पीड़ा का शमन होता है। झांई-व्यङ्ग आदि त्वग्दोषों में उबटन के रूप में व्यव- हार करने से त्वचा की कान्ति बढ़ती है । यह बालों के लिये भी लाभदायक है । शिरःशूल में इसका लेप करते हैं । दन्तशूल में इससे मज्जन कराते हैं। मुखदौर्गन्ध में इसे चबाते हैं। स्वेदाधिक्य में इसके चूर्ण का उपयोग मर्दन के लिये करते हैं। बेहोशी में इसे पीसकर आंखों पर लेप 16 करते हैं । १६ भा० नि०
२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ( ६ ) पीडितार्तव में इसके सेवन से पीड़ा कम होती है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है । स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के काल में कुछ विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक अवसाद के लक्षण उत्पन्न होते हैं ऐसी अवस्थाओं में जटामांसी बहुत उपयोगी होती है । मात्रा—५-१० रत्ती । अथ शैलेयम् ( भूरिछरीला ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह शैलेयन्तु शिलापुष्पं वृद्धं कालानुसार्यकम् ॥ ९० ॥ शैलेयं शीतलं हृद्यं कफपित्तहरं लघु । कण्डूकुष्ठाइमरीदाहविष हृद् गुदरुक्हृत् ॥ ९१ ॥ शैलेय ( भूरिछरीला ) के नाम तथा गुण-शैलेय, शिलापुष्प, वृद्ध और कालानुसार्यक ये सब संस्कृत नाम भूरिछरीला के हैं। भूरिछरीला-शीतवीर्य, हृद्य ( हृदय को हितकर ), कफ तथा पित्तनाशक, लघु, एवम् खुजली, कुष्ठ, पथरी, दाह, विष तथा गुदा से रक्त गिरना इन सब को दूर करने वाला है । ३५ छरीला हि०-छरीला, भूरिछरीला, पत्थरफूल । बं-शैलज । म०-दगडफूल । गु०-पत्थरफूल, छडीलो । क०-कल्लुडूवु । ते०-शैलेय मनेद्रव्यमु, रतिपंचे । ता०-कलपसी । फा०-उशनह, गुलेसंग । अ०-उस्नः । अं०-Stone flowers ( स्टोन फ्लावर्स ); Yellow Lichen ( यलो लाइचेन ) । लै०-Parmelia perlata Ach. ( पार्मीलिया परलॅटा आक० ) ; Fam. Parmeliaceae ( पार्मेलीयेंसी ) । छरीला-यह क्षुद्र वनस्पति पहाड़ी जमीन के पत्थरों पर उत्पन्न होती है और जान पड़ता है मानो यह पत्थर से ही अपना आहार लेती है। यह हिमालय और नीलगिरि के पहाड़ों पर पाई जाती है। यह वृक्षों और दीवारों पर भी पाई जाती है। यह हरी पेडींसी सन्निभ होकर जब सूख कर उतरती है तब इसके ऊपर का पृष्ठ काला और नीचे का सफेद होता है। जो अधिक सफेद होती है वही अच्छी समझी जाती है। इसकी कई जातियां पाई जाती हैं। इसका स्वाद फीका तिक्त-कषाय होता है। औषध के लिये हमेशा नया तथा सुगन्धयुक्त छरीला काम में लेना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें पीत रवेदार पदार्थ, गोंद, लाइचेनिन एवं क्राइसोफेनिक एसिड, ये पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—छरीला शीतल, सुगन्धि, हृद्य, सौम्य मूत्रल, दीपन, वेदनास्थापन, ग्राही एवं शोथहर है । यह कफ, पित्त, दाह, तृषा, वमन, श्वास, व्रण, कण्डू, अश्मरी, विष, हृद्रोग, गुदरक्तस्राव एवं रक्तविकार दूर करने वाला है। पेशाब रुकने पर १ तो० छरीला के फांट में मिश्री एवं जीरा मिलाकर पिलाते हैं तथा इसे गरम जल में भिगोकर कमर पर बांधते हैं। इसे ठण्डे जल में पीस कर सर पर लेप करने से शिरःशूल दूर होता है। व्रण पर इसे लगाने से लाभ होता है। यकृत् शूल निवारण के लिये इसका उपयोग करते हैं । अञ्जन के योगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है । मात्रा-२-४ माशा । १. विषहृल्लासरुग्जित इति पाठान्तरम् । कर्पूरादिवर्गः २४३ अथ मुस्तकं-नागरमुस्तकञ्च । (मोथा-नागरमोथा) । तयोर्नामानि गुणांश्चाह मुस्तकं न स्त्रियां मुस्तं त्रिषु वारिदनामकम् । कुरुविन्दश्च संख्यातोऽपरः क्रोडकसेरुकः ॥९२॥ भद्रमुस्तञ्च गुन्द्रा च तथा नागरमुस्तकः । मुस्तं कटु हिमं ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् ॥९३॥ कषायं कफपित्तास्रतृड्ज्वरारुचिजन्तुहृत् । अनूपदेशे यज्जातं मुस्तकं तत्प्रशस्यते । तत्रापि मुनिभिः प्रोक्तं वरं नागरमुस्तकम् ॥ ९४ ॥ मोथा तथा नागरमोथा के नाम और गुण- मुस्तक ( इसका स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिङ्गों में प्रयोग होता है, मुस्त ( यह तीनों लिङ्गों में होता है ), वारिदनामक ( मेघवाची सभी शब्द ) और कुरुविन्द ये सब संस्कृत नाम मोथा के हैं। दूसरे प्रकार का जो मोथा है जिसे नागरमोथा कहते हैं, उसके संस्कृत नाम-- क्रोडकसेरुक, भद्रमुस्त, गुन्द्रा तथा नागरमुस्तक ये सब हैं । मोथा-कडुतिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतवीर्य, ग्राही, अग्निदीपक तथा पाचक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तकोप, तृषा, ज्वर, अरुचि और कृमि का नाशक होता है। जो 'मोथा' अनूप देश में उत्पन्न होता है बड़ी श्रेष्ठ होता है। उसमें भी मुनियों ने 'नागरमोथा' को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है । ३६ मोथा हि०-मोथा । बं-मुता, मुथा । म०-मोथा, बिम्बल, भद्रमुष्टि । गु०-मोथ । क०-कोरनारि । तै०-तुंगमुस्ते । ता०-कोरइ किलंगु । फा०-मुष्के जमीं । अ०-सोभ (अ) द् कूर्फी । अं०-Nut- grass ( नट्ग्रास ) । लै०-Cyperus rotundus Linn. ( साइपेरस् रोटन्डस् लिन. ) । Fam. Cyperaceae ( साइपेरेंसी ) । मोथा इस देश के सब प्रान्तों में बहुलता से होता है। यह तृणजातीय वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है किन्तु बरसात में सर्वत्र देखने में आती है। इसमें मूलीय पत्रगुच्छ होता है जो एक कठोर कन्द सदृश भौमिककाण्ड से निकलता है । नीचे सूत्रकार अन्तर्भूमिकायी कांद भी प्रायः होते हैं जिनने पौन से एक इञ्च के घेरे में अंडाकार कंद निकले रहते हैं जो कसेरू के समान ऊपर से काले रंग के और भीतर से लालीयुक्त सफेद होते हैं और इनमें सुगन्ध आती है। डंडी-पतली, ६ से २४ इञ्च तक ऊँची, त्रिकोणकार तथा पत्तों के बीच से निकली रहती है। पत्ते-लम्बे और पतले होते हैं । डंडी के अग्रपर समस्थमूर्धजक्रम में पुष्पवाहक शाखायें निकलती हैं जो छोटे-छोटे अवृन्त काण्डजव्यूहों का संयुक्तव्यूह होती हैं । पुष्पव्यूह का आधार भाग तीन पत्रसदृश कोणपुष्पकों से घिरा रहता है । इसके काले-काले कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । नोट-भावप्रकाशकार ने मोथा एवं नागरमोथा ये दो भेद यहां लिखे हैं तथा मुस्ता का एक अन्य कैवर्तमुस्ता ( जलजमुस्ता, केवटीमोथा ) भेद आगे लिखा है । नागरमोथा का ही दूसरा नाम भद्रमुस्ता लिखा है। अन्य निघण्टुओं में भद्रमुस्ता अलग लिखा है। सब मोथे के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा एक दूसरे के स्थान पर इनका उपयोग किया जा सकता है। अनूप देश में होने वाला नागरमोथा अधिक प्रशस्त माना गया है। यह हमेशा ताजा तथा सुगन्धयुक्त खरीदना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल, वसा, शर्करा, गोंद, कार्बोहाइड्रेट, अॅल्ब्युमिन सदृश पदार्थ, तन्तु तथा राख एवं अत्यल्प मात्रा में क्षाराम आदि पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-मोथा ग्राही, दीपक, पाचक, स्वेदजनक, मूत्रजनक, स्तन्यवर्धक, आर्तव- जनक, किञ्चित् गर्भाशयोत्तेजक, केशवर्धक, व्रणरोपक एवं कृमिघ्न है ।
यहाँ दोनों पृष्ठों का स्पष्ट एवं सम्पूर्ण प्रतिलेखन (transcription) दिया जा रहा है:
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( १ ) कुपचन, वमन एवं अतिसार यदि आमाशय तथा आन्त्र के विकारों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आमातिसार में ताजे कन्द को आर्द्रक के साथ पीसकर मधु मिला कर खिलाते हैं। इसमें २० मोथे के कन्दों को ३ गुने दूध तथा जल में उबाल कर दूध शेष रहने पर छानकर पिलाते हैं। सभी प्रकार के अतिसार में इसके क्वाथ में (क्वाथ ठंडा होने पर) मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। ( २ ) स्वेदजनक, मूत्रजनक एवं उत्तेजक होने से यह ज्वर, ज्वरातिसार एवं पित्त ज्वर में उपयोगी है। ( ३ ) विसूचिका तथा मदात्यय में तृषा शान्ति के लिये इसके शीतल क्वाथ को पिलाते हैं। ( ४ ) अक्षिव्रण में इसे घृत में भूनकर पीसकर लगाने से २, ४ दिन में लाभ होता है। आँख की फूली एवं लालिमा में बकरी के मूत्र में इसे पीसकर उसका अंजन किया जाता है। ( ५ ) इसकी ताजी जड़ को घिसकर गोघृत मिलाकर व्रण पर लगाते हैं तथा इसको जल में पीसकर दुग्धवृद्धि के लिये स्तन पर लेप करते हैं। ( ६ ) रोमन लोग आर्तवजनन औषध के रूप में गर्भाशय की बीमारियों में इसका व्यवहार करते थे। मात्रा— ३-६ माशा।
३७ नागर मोथा
- हि०— नागर मोथ।
- बं०— नागरमथा।
- म०— नागरमोथा, लवाला।
- सा०— नागर मोथो।
- गु०— नागरमोथ।
- क०— कोन्नरि गड्ड्डे।
- ते०— नागमुस्तेल्लु।
- ता०— मुट्टाकाचि।
- फा०— मुष्के जमीं।
- अ०— सोजद कूफी।
- ले०— Cyperus scariosus R. Br. (साइपेरस् स्कैरिओसस् भार. न.)।
- Fam. Cyperaceae (साइपेरेसी)।
नागरमोथा— मोथे के समान तृणजातीय वनौषधि बंगाल, पेगु, उत्तरप्रदेश एवं पूर्व तथा दक्षिण के भागों के तालाब तथा सजल स्थान में पाया जाता है। इसकी डंडी १६ से ३६ इञ्च तक ऊँची, पतली त्रिकोणाकार होती है। जड़ के नीचे कंदवत् लम्बे-लम्बे, अंगुली प्रमाण मोटे, दबे हुये गहरे भूरे रंग के जो अन्तर्भूमिशायी काण्ड होते हैं उन्हीं को नागरमोथा कहते हैं जिनका चिकित्सा में उपयोग किया जाता है।
रासायनिक संगठन— मोथा के समान।
गुण और प्रयोग— नागरमोथा शीतल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही, स्वेदजनन, कफघ्न, मेध्य, तृष्णानिग्रहण, स्तन्यजनन, स्तन्यशोधन, कण्डूघ्न, मूत्रजनन, उत्तेजक तथा जन्तुनाशक है। इसका उपयोग मोथे के समान ही किया जाता है। यद्यपि इसमें इतने उपयुक्त धर्म हैं तथापि इसका प्रयोग अन्य औषधों के साथ अधिक किया जाता है। ( १ ) अरुचि, आमातिसार, वमन, रक्ताशं तथा कुपचन में नागरमोथा गुणकारी है। संग्रहणी में इससे बहुत लाभ होता है। ( २ ) ज्वर, प्रसूतिज्वर तथा पैत्तिक ज्वर में हमेशा इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे प्यास कम होती है, पसीना आता है, उत्तेजना आती है, जीभ का स्वरूप अच्छा होता है, पेशाब साफ होता है तथा गर्भाशय का थोड़ा सा संकोच भी होता है। प्रसूता को दुग्ध शुद्धि तथा वृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं तथा जल में घिस कर स्तन पर लेप करते हैं। इससे स्तन की दूध की गाँठें कम होती हैं।
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कर्पूरादिवर्गः | २४५
( ३ ) परमा में नागरमोथा बहुत लाभदायक है। यह प्रथम एवं द्वितीयावस्था में दिया जाता है। ( ४ ) अपस्मार में उत्तर दिशा में होने वाले मोथे को पीसकर समान वर्ण वाली सबत्सा गौ के दुग्ध के साथ पिलाने से लाभ होता है। ( ५ ) इसका जन्तुघ्न धर्म अधिक मात्रा में देने से ही मालूम होता है। कांडू में इसका लेप किया जाता है। मात्रा— ३-६ माशा।
अथ कर्चूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
कर्चूरो वेधमुख्यश्च द्राविडः कल्पकः शटी । कर्चूरो दीपनो रुच्यः कटुकस्तिक्त एव च ॥ ९५ ॥ सुगन्धिः कटुपाकः स्यात्कुष्ठाशौव्रणकासनुत् । उष्णो लघुहरेच्छ्वासं गुल्मवातकफक्रिमीन् ॥ ९६ ॥
कचूर के नाम तथा गुण— कर्चूर, वेधमुख्य, द्राविड, कल्पक और शटी ये सब संस्कृत नाम कचूर के हैं। कचूर कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, सुगंध युक्त, पाक में कटुरस युक्त, उष्णवीर्य और लघु होता है एवं यह कुष्ठ, बवासीर, व्रण, खांसी, श्वास, गुल्म, वात, कफ और कृमि इन सब रोगों का नाशक होता है ॥ ९५-९६ ॥
३८ कचूर
- हि०— कचूर।
- बं०— शटी, एकांगी, शोरी, कचूरा।
- म०— कचोरा।
- गु०— कचूरो, षट् कचूरो।
- ते०— कचोरमु।
- ता०— किच्चिलिक किंशंगु।
- क— कचोरा।
- अ०— जरंबाय, एरकूल कापूर।
- फा०— कजूर।
- अं०— Zedoary. (झिडोअरी)।
- ले०— Curcuma zedoaria Rosc. (कर्युमा झेडोरिया रास्)।
- Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)।
पूर्व हिमालय, सिंहल द्वीप, कनारा का तटीय प्रदेश तथा बर्मा के पश्चिम में यह आपही आप उत्पन्न होता है और कई प्रान्तों में रोपित किया हुआ भी पाया जाता है।
इसका क्षुप— तीन चार फीट ऊँचा हल्दी के समान होता है और जड़ के नीचे अनेक कंद होते हैं। उनको कचरा कर सुखा लेते हैं। इसी को कचूर कहते हैं। पत्त—१-२ फीट लंबे, आयताकार, लंबाग्र और नीचे की ओर क्रमशः संकुचित होकर पत्रवृन्त में परिणत हो जाते हैं। ये कुछ कालापन लिये हुये तथा मध्य शिरा पर नीलारुण रंगीन धब्बों से युक्त होते हैं। पुष्पदंड पत्तियों के पहले निकलता है। कोणपुष्पक रक्ताभ और ऊपर के अपुष्प पत्र अधिक लाल होते हैं। फूल—नलिकाकार पीले रंग के आते हैं। फल—त्रिकोणाकार और बीज अंडाकार और सफेद होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कन्द लंबागोल, भीतर हलके पीले और पूर्णतः विकसित रहते हैं। मूलाग्र कन्द अनेक और भीतर मुक्तावर्ण के होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कंद कर्पूर तुल्य प्रियगंध वाले होते हैं। इन्हीं कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को मछली भूनने के काम में लाते हैं। इसी क्षुप के समान काली हलदी का क्षुप होता है जिसका वर्णन पृ० ११८ पर किया गया है।
कचूर का पर्याय शटी क्यों पड़ा इस सम्बन्ध में श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है कि प्राचीन ग्रन्थों में 'कचूर' का उल्लेख नहीं है, शटी का है। इस शटी (कपूरकचरी) की उपलब्धि कम होने के कारण उसके स्थान पर प्रतिनिधिरूप में कचूर का उपयोग होने लगा तथा उसे भी शटो...
२४६ भावप्रकाशनिघण्टुः नाम दे दिया गया। शटी (कचूर) और शठी (कपूरकचरी) यह थोड़ा सा नामभेद कोई योजना- पूर्वक पार्थक्य दिखलाने के लिये नहीं रखा होगा। बल्कि गलती से ऐसे दो नाम पड़ गये होंगे। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, कटु मुलायम राल, गोंद, स्टार्च, शर्करा एवं ऑर्र्गेनिक अम्ल आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कचूर सुगन्धि, रुचिकर, दीपन, स्वर्य, कफहर, वातहर, मूत्रजनन एवं हृद्य है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अर्श, हिक्का, ज्वर, संग्रहणी, प्लीहा, गुल्म, कुष्ठ, कृमि एवं व्रण में किया जाता है। ( १ ) मुख को साफ करने के लिये इसको चबाते हैं। गायक इसको आवाज साफ करने के लिये चूसते हैं। इससे खांसी एवं गले की खराश में लाभ होता है। ( २ ) इसके ताजे कंदों का पाक या खण्ड प्रसूता के लिए पौष्टिक माना जाता है। ( ३ ) विषमज्वर, प्रतिश्याय तथा शरीर में पीड़ा हो तो कचूर, छोटी पीपल एवं दालचीनी का क्वाथ मधु मिलाकर पिलाते हैं तथा पीड़ा में इसका लेप करते हैं। ( ४ ) श्वेत प्रदर तथा पूयमेह में यह बहुत लाभप्रद है। परमा में इसके फांट से जलन कम होकर पेशाब साफ होता है। ( ५ ) जलोदर में इसके पत्तों का रस पिलाया जाता है। गांठों तथा फोड़े आदि पर इसके पत्तों को पीसकर बांधा जाता है। अर्श तथा अतिसार में इसका शाक के रूप में प्रयोग लाभप्रद माना जाता है। ( ६ ) बच्चों के आक्षेप में कंबोडियन माताएं इसको चबाकर सर तथा शरीर पर लगाती हैं। ( ७ ) मोच में इसको पीसकर फिटकिरी मिलाकर लगाते हैं। मात्रा—१-४ माशा।
अथ मुरा (मुरहरी, एकाङ्गी)। तस्या नामानि गुणांश्चाह मुरा गन्धकुटी दैत्या सुरभिः शालपर्णिका ॥ ९७ ॥ मुरा तिक्ता हिमा स्वादी लघ्वी पित्तानिलापहा । ज्वरासृग्भूतदोषघ्नी कुष्ठकासविनाशिनी ॥ ९८ ॥ मुरा (एकाङ्गी) के नाम तथा गुण—मुरा, गन्धकुटी, दैत्या, सुरभि और शालपर्णिका ये सब संस्कृत नाम मुरा के हैं। मुरा—तिक्त रस युक्त, शीतवीर्य, स्वादिष्ट और लघु होती है एवं यह पित्त, वात, ज्वर, रक्तविकार, भूत और राक्षस सम्बन्धी बाधा, कुष्ठ तथा खांसी इन सबों को दूर करने वाली होती है ॥ ९७-९८ ॥
३९ मुरा मुरा नामक गन्धद्रव्य के सम्बन्ध में मतभेद है। कुछ लोग इसे मरोडफली (Helicteres- isora Linn, हेलिक्टेरिस आइसोरा लिन.) मानते हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। डा० कर्नल चोपरा की पुस्तक में एरिथ्रिना स्ट्रिक्टा राक्सब. (Erythrina stricta Roxb.) का संस्कृत नाम मुरा लिखा मिलता है। पंजाबी में मुरां नाम साइर्नन्थस् का दिया है जिसके पुष्पों का दमे में उपयोग होता है। कुछ लोग इसे कचूर, कपूरकचरी या जटामांसी का भेद मानते हैं। अधिक संभव है यह कपूरकचरी का भेद हो ।
कर्पूरादिवर्गः २४७ अथ गन्धपलाशी (कपूरकचरी) (सुगन्धिद्रव्यं काश्मीरे प्रसिद्धम्) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शठी पलाश़ी षड्ग्रन्था सुव्रता गन्धमूलिका । गन्धारिका गन्धवधूर्वधूः पृथुपलाशिका ॥ ९९ ॥ भवेदगन्धपलाशी तु कषाया ग्राहिणी लघुः । तिक्ता तीक्ष्णा च कटुकाऽनुष्णाऽऽस्यमलनाशिनी । शोथकासव्रणश्वासशूलसिध्मग्रहापहा १ ॥ १०० ॥ कपूर कचरी जो कि काश्मीर देश में प्रसिद्ध एक प्रकार का सुगन्धि द्रव्य है, उसके नाम तथा गुण—शठी, पलाश़ी, षड्ग्रन्था, सुव्रता, गन्धमूलिका, गन्धारिका, गन्धवधू, वधू, पृथुपलाशिका और गन्धपलाशी ये सब संस्कृत नाम 'कपूर कचरी' के हैं। कपूर कचरी—कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, ग्राही, लघु, तीक्ष्ण तथा थोड़ा उष्णवीर्य होती है एवम् यह मुख के मल को दूर करने वाली, शोथ, खांसी, व्रण, श्वास, शूल, सिध्म (या-हिक्का) और ग्रहबाधा इन सबों को दूर करने वाली है ॥ ९९-१०० ॥
४० कपूर कचरी हि०—गंधपलाशी, कपूर कचरी, सितरूटी। बं०—शठी, गन्ध शटी। म०—कपूर कचरी। गु०—कपूर काचरी। क०—गन्ध शठी। ता०—शिमैकिचिलिक् किशांगु। पं०—कचूर कनु, शेदूरी। ले०—Hedychium spicatum Ham. ex Smith (हेडिचिअम् स्पाइकैटम् हेम्. एक्स स्मिथ)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)। यह हिमालय के साधारण प्रान्त, पंजाब, नेपाल और कुमाऊँ में अधिक उत्पन्न होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि है। जड़—बहुवर्षायु, कन्दवत् भूमि के भीतर समतल बढ़ती है। इसी को सुखा कर कार्य में लेते हैं। डंठल—लम्बा पत्रयुक्त होता है। पत्ते—हल्दी के पत्तों के समान एक फुट लम्बे, अनियमित चौड़े एवं आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—सफेद होते हैं। फल—त्रिकोष्ठयुक्त, गोलाकार और चिकना होता है। इसके मूलस्तंभ (मूल) को काटकर सुखाये हुये, छोटे बड़े सुगंधित टुकड़े बाजार में बिकते हैं। यह सफेद रंग के एवं पिष्टमय रहते हैं। इनका बाह्यत्वक् रक्ताभ भूरे रंग का होता है। इसका स्वाद कड़वा एवं तीता रहता है। अबीर के निर्माण एवं गुडाखू को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। कपूर कचरी नाम से इसी वर्ग के 'चन्द्रमूल' (Kaempfe- ria galangal Linn, केम्फेरिआ गैलगल् लिन) २ के मूल के टुकड़े भी व्यवहार में लाये जाते हैं जो इसी के समान होते हैं। बाजार में एक चीनी कपूर कचरी नामक औषध भी बिकती है जो देखने में अच्छी होते हुये भी उसमें सुगन्ध कम रहती है।
१. हिध्म इति पाठा० । २. चन्द्रमूल के क्षुप दक्षिण की तरफ बगीचों में लगाये मिलते हैं। इसमें १४% खनिज द्रव्य, सुगंधि तैल, ४% गोंद तथा अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ रहते हैं। यह मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं कफनिःसारक है। सर्दी-खाँसी में इससे सिद्ध तैल को नाक तथा छाती पर लगाते हैं एवं मधु के साथ १-२ रत्ती चूर्ण चटाते हैं। मुख को सुवासित करने के लिये इसके छोटे टुकड़े को मुख में रखते हैं। इसके उबटन का भी प्रयोग किया जाता है।
२४८ भावप्रकाश निघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च, गोंद, सेल्युलोज, अल्ब्यूमिन्, तैल, राल एवं सुगन्धि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-कपूरकचरी उष्ण, ग्राही, लघु, कटु, तिक्त, दीपन एवं वातानुलोमक होती है। इसका उपयोग कास, श्वास, हिक्का, वमन, अपतन्त्रक, शूल एवं व्रण में किया जाता है। दन्तशूल में इसके मंजन से लाभ होता है। इससे मुख की दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा-१-४ माशा । अथ प्रियङ्गन्धप्रियङ्गुश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह प्रियङ्गुः फलिनी कान्ता लता च महिलाऽऽह्वया ॥ १०१ ॥ गुन्द्रा गन्धफला श्यामा विष्वक्सेनाङ्गनाप्रिया । प्रियङ्गुः शीतला तिक्ता तुवराऽनिलपित्तहृत् ॥ १०२ ॥ १रक्तातीसारदौर्गन्ध्यस्वेददाहज्वरापहा । (वान्तिभ्रान्त्यतिसारघ्नी वक्त्रजाड्यविनाशिनी ) ॥ गुल्मतृड्विषमोहघ्नी२ तद्वद् गन्धप्रियङ्गुका ॥ १०३ ॥ 'प्रियङ्गु' तथा 'गन्धप्रियङ्गु' के नाम और गुण-प्रियङ्गु, फलिनी, कान्ता, लता, महिला- ह्वया (स्त्रीवाचक सभी शब्द), गुन्द्रा, गन्धफला, श्यामा, विष्वक्सेनाङ्गना और प्रिया ये सब संस्कृत नाम 'प्रियङ्गु' के हैं। प्रियङ्गु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतवीर्य होती है। यह वात, पित्त, रक्तातिसार, दुर्गन्ध, पसीना, दाह, ज्वर, (वमन, चक्कर, अतिसार, मुँह की जड़ता ) गुल्म, तृषा, विष और मोह इन सब रोगों को दूर करती है। इसी भाँति 'गन्धप्रियङ्गु' के भी गुण होते हैं ॥ १०१-१०३ ॥ अथ तत्फलगुणानप्याह तत्फलं मधुरं रूक्षं कषायं शीतलं गुरु । विबन्धाध्मानबलकृत्स्रंग्राहि कफपित्तजित् ॥ १०४ ॥ प्रियङ्गु का फल-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतवीर्य और गुरु होता है। यह विबन्ध- कारक, आध्मानकारक, बलकारक एवं संग्राही तथा कफपित्त नाशक होता है ॥ १०४ ॥ ४१ प्रियङ्गु प्रियङ्गु के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। इसी निघण्टु के धान्यवर्ग में कंगु (कंगुनी धान्य) के पर्याय में भी प्रियङ्गु नाम दिया हुआ है। इससे भ्रम होता है कि क्या यहाँ पर वर्णित प्रियङ्गु तथा धान्यवर्गोक्त प्रियङ्गु एक ही हैं ? प्रियङ्गु से कौन सा प्रियङ्गु लिया जाय ? वास्तव में कंगु के पर्याय में केवल प्रियङ्गु नाम देने से ही प्रियङ्गु से कंगु धान्य लेना उचित नहीं है। दोनों के गुण बिलकुल भिन्न हैं। जहां पर टीकाकारों ने स्पष्ट रूप से प्रियंगु के लिये कंगु लेने का निर्देश किया हो वहीं पर प्रियंगु के लिये कंगु का उपयोग किया जा सकता है अन्यथा प्रियंगु से कर्पूरादिवर्गोक्त प्रियंगु ही लेना उचित है। कुछ लोगों ने कंगु से पार्थक्य करने के लिये इसको गंधप्रियंगु लिखा है लेकिन भावप्रकाशकार ने यहां पर प्रियंगु तथा गंधप्रियंगु दो द्रव्यों का उल्लेख किया है। यहां १. रक्तातिस्रोग इति पाठो० । २. मोहनी इति पाठो० । कर्पूरादिवर्गः २४६ पर इन दोनों के गुण समान बतलाये हैं। धान्यवर्गोक्त कंगु, जिसका एक पर्याय प्रियंगु है, उसके तथा यहां पर उल्लिखित प्रियंगु के गुण समान नहीं हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। निम्नलिखित वर्णन केवल यहीं पर वर्णित प्रियंगु का है, कंगु (धान्य) का नहीं। यहाँ पर उपर्युक्त श्लोकों में जिन दो द्रव्यों का उल्लेख किया गया है, उनके लिये गंधप्रियंगु नाम देना ठीक है। हो सकता है कि प्रियङ्गु के संदिग्ध द्रव्य रहने के कारण दो विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का उपयोग भावप्रकाशकार के समय होता रहा हो, जिनमें से एक में गंध हो तथा दूसरे में गंध न हो या बहुत कम हो अथवा एक ही प्रकार के दो क्षुप हों जिनमें से एक में गंध हो और दूसरा निर्गध हो, जिसका आगे स्पष्टीकरण होगा। आजकल इसी उपर्युक्त 'प्रियङ्गु, गंधप्रियङ्गु' के लिये ३ प्रकार के द्रव्यों का उपयोग किया जा रहा है। बंबई की तरफ घऊँला नाम से प्रूनस् महालिव् (Prunus mahaleb) की फलमज्जा बिकती है, जिसका उपयोग प्रियङ्गु के रूप में वहां पर करते हैं। बंबई प्रान्त में श्वेतचंदन, घऊँला एवं कपूरकचरी को जल में पीस कर सुगंधित लेप के लिये प्रयोग किया जाता है। चरक ने रक्तपित्त में दाहशांति के लिये चन्दन और प्रियङ्गु के लेपन से उपलिप्त स्त्रियों के स्पर्श का विधान किया है।१ यह मज्जा छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूमवर्ण की, स्वाद में तिक्त एवं सुगन्धित होती है। दूसरा द्रव्य अॅग्लेइया रॉक्सबर्घियाना (Aglaia roxburghiana) के फल हैं जो कुछ गोल, छोटे, निंब फल सदृश एवं सूखने पर सिकुड़नदार दिखलाई देते हैं। इनका व्यवहार बहुत दिनों से होता आ रहा है लेकिन इसमें गंध नाम मात्र की होती है। तीसरा द्रव्य कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला (Callicarpa macrophylla) नामक गुल्म (झाड़ी) की पुष्प कलिकायें हैं जो छोटी-छोटी कङ्गुनी धान्य सदृश होती हैं। इसका वर्णन अभिनव बूटी दर्पण में है लेकिन वहां पर इसका लेटिन नाम नहीं लिखा है। इसके लेटिन नाम के साथ इसका वर्णन श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'वनौषधिदर्शिका' एवं 'बिहार की वनस्पतियाँ' इन पुस्तकों में किया है। मूल श्लोक एवं अन्य निघंटुओं में दिये हुए फलिनी, कृष्णपर्णी, गन्धफला, कृशाङ्गी, महिलाह्वया, पर्णभेदनी आदि इसके रूपपरिचयात्मक पर्याय इससे कुछ मिलते होने के कारण इसको प्रियङ्गु मानते हैं। एक बात ध्यान देने की है कि इसकी झाड़ी या गुल्म होता है। यह लता नहीं है। पुष्प भी श्वेत वर्ण के होते हैं। श्रीमान् बाबू भीमचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित 'दि एकॉनॉमिक बॉटॅनी ऑफ इण्डिया' से 'अभिनव बूटी दर्पण' में कुछ अंश उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि 'नेपाल, चटगाँव तथा पूर्व बंगाल के कुछ भागों में इसी का व्यवहार प्रियङ्गु के रूप में लोग करते हैं। नेपाल में दयालो तथा श्वेतदयालो नाम से उपयोग में लाई जाने वाली लताओं का वर्णन उपर्युक्त लता से ठीक मिलता है। श्वेतदयालो तथा दयालो एक ही समान हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि श्वेतदयालो गन्धयुक्त होती है एवं इसके पत्ते कुछ बड़े, अधिक श्वेत तथा स्पर्श में खुरदरे होते हैं। इससे मालूम होता है कि भावप्रकाशोक्त प्रियङ्गु तथा गन्धप्रियङ्गु यह दयालो तथा श्वेतदयालो हैं। जिला गढ़वाल और अलमोडा में धूढिया के नाम से यह प्रसिद्ध है तथा कुमाऊँ प्रान्त के वैद्य इसको प्रियङ्गु मानते हैं।' इन तीन द्रव्यों के अतिरिक्त मेंहदी के फूल, कुमुदनी, सरसों के फूल, मालकांगुनी एवं गोंदनी आदि को भी कुछ लोग प्रियंगु मानते हैं। चरक में संधानीय, शोणितास्थापन, पुरीष संग्रहणीय एवं मूत्रविरजनीय गणों में तथा सुश्रुत में अञ्जनादि, एलादि तथा प्रियंग्वादिगणों में प्रियंगु का १. प्रियङ्गुकाञ्चनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणां च वराङ्गनानाम् । (च. चि. अ. ४)
२५० भावप्रकाशनिघण्टुः उल्लेख है। चरक ने रक्त और पित्त की अतिवृद्धि को शान्त करने वालों में गन्धप्रियंगु को श्रेष्ठ माना है (च. सू. अ. २५) । उपर्युक्त तीन द्रव्यों का वर्णन यहां दिया जा रहा है। प्रियंगु १ (फूलप्रियंगु) हि०-प्रियंगु । फूलप्रियंगु, गन्धप्रियंगु, थुंडुंड, बूढ़ीघासी, दइया, दहिया । बं०-मथुरा । नेपा०- दयालो, श्वेतदयालो । पं०-सुमाली । ले०-Callicarpa macrophylla Vahl (कॉलिकार्पा मॅक्रोफाइला वाह.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी) । यह जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों तथा खुले हुये जंगल और परती भूमि में होता है। यह नेपाल, देहरादून के जलप्राय स्थानों, बंगाल तथा बिहार के अनेक स्थानों में पाया जाता है। बलिया स्टेशन के अहाते में लगे हुए इसी प्रकार के एक क्षुप का उल्लेख चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय से प्रकाशित 'सचित्र अभिनव बूटीदर्पण' में किया हुआ है। इसका गुल्म-४ से ८ फीट ऊंचा, और तूल रोमश होता है । शाखाएँ- अनियमित रूप से फैली रहती हैं। पत्ते-५ से १० इंच लंबे, अंडाकार, या अंडाकार-भालाकार, लम्बाग्र, ऊपर चिकने, नीचे तूलरोमश एवं किनारा गोल दन्तुर होता है। पुष्प-गुलाबी, सघन द्विविभक्त १ से ३ इंच व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-सफेद एवं १ १२-१।८ इंच व्यास के होते हैं। डालियाँ पुष्पगुच्छों के बोझ से झुक जाती हैं। इसकी छोटी छोटी प्रियंगु धान्य सदृश पुष्प कलिकाएँ फूल प्रियंगु के नाम से मिलती हैं । इनमें मसलने पर गन्ध भी होती है। शास्त्रीय गन्धप्रियंगु यही मालूम होती है। आभीण लोग गठिया में इसकी पत्तियों से सेंक करते हैं । प्रियंगु २ (घऊँला) हि०-प्रियंगु, महालिव । म०-गडुला, गावल । गु०-घऊंला । अ०-महुलिब । ले०-Prunus mahaleb Linn. (प्रुनस् महालिब् लिन.) । Fam. Rosaceae (रोजैसी) । यह बलोचिस्तान में पाया जाता है। इसका गुल्म अनेक फैली हुई तथा सीधी शाखाओं से युक्त होता है। पत्ते-कुछ लंबाई लिये अंडाकार एवं दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के; फल- छोटे, अंडाकार एवं नोकीले होते हैं। घऊंला नाम से प्रियंगु की मज्जा बंबई के बाजार में बिकती है। यह छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूम वर्ण की, कडवी और सुगंधित होती है। सुगंधि लेप में श्वेत चन्दन तथा कपूर कचरी के साथ इसका उपयोग बंबई प्रान्त में लोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में अल्प मात्रा में पद्मकाष्ठ में पाया जाने वाला हाइड्रोसाये- निक एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहने के कारण इसका उपयोग सावधानी के साथ करना चाहिये । इसके अतिरिक्त इसमें काउमॅरिन् (Coumarin), सॅडिसिलिक् एसिड (Salicylic acid) एवं अंमिग्डॅलिन् (Amygdalin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, वेदनाहर, दीपन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग पीडा- युक्त कुपचन, आमाशय के क्षत तथा आमाशय के अर्बुद में करते हैं। मात्रा-२-५ रत्ती । प्रियंगु ३ हि०-प्रियंगु । कं०-तेविलकामि । ले०-Aglaia roxburghiana Miq. (अँग्लैइया राक्स बर्थियाना मिक्.) । Fam. Meliaceae (मेलियेंसी) ।
कर्पूरादिवर्गः २५१ यह पश्चिमी प्रायद्वीप में कोंकण और मिदनापुर से दक्षिण की ओर सिलोन तक ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका साधारण वृक्ष होता है। छाल किंचित् खाकी रंग की और चिकनी होती है। लकड़ी मजबूत तथा चमकीले लाल रंग की होती है। पत्ते-पक्षवत् पत्ते ३-१० इंच लम्बे और उनके पत्रक संख्या में ५, १॥ से ५॥ इंच लम्बे, पतले अण्डाकार या अण्डाकार-प्रासवत और चिकने होते हैं। पुष्प-व्यास में १ इंच से कम, पीताभ और पत्ती के बराबर लम्बी मञ्जरियों में होते हैं जो पत्र कोण के ऊपर निकलती हैं। फल-कुछ कुछ गोल, निम्बफल सदृश, ३/८-३/४ इंच व्यास के, रोमश तथा हरिण के रंग के रहते हैं जो सूखने पर भूरे रंग के सिकुडनदार तथा आकार में छोटे हो जाते हैं। इसमें १ या २ बीज रहते हैं जो चिपटे करीब ३/८ इंच लम्बे (ताजी अवस्था में) तथा एक तरफ से उन्नतोदर रहते हैं। बीज का स्वाद खट्टा तथा कसैला रहता है। ताजी अवस्था में इसमें सुगन्ध रहती है जो सूखने पर नहीं रहती । इसके फलों का उपयोग बहुत दिनों से प्रियंगु के नाम से किया जा रहा है। हो सकता है कि भावप्रकाशकार ने प्रियंगु का जो फल लिखा है वह यही हो । गुण और प्रयोग-यह शीतल एवं ग्राही होता है। इसका उपयोग ज्वर, पित्त तथा शोथयुक्त रोगों में किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा । अथ रेणुका । तस्या नामानि गुणाँश्चाह रेणुकाराजपुत्री च नन्दिनी कपिला द्विजा । भस्मगन्धा पाण्डुपुत्री स्मृता कौन्ती हरेणुका ॥ रेणुका कटुका पाके तिक्ताक्ष्णोष्णा कटुर्लघुः । पित्तला दीपनी मेध्या पाचनी गर्भपातिनी । बलासवातकृच्छ्रह्वै¹ तृट्कण्डूविषदाहहृत् ॥ १०६ ॥ रेणुका के नाम तथा गुण-रेणुका, राजपुत्री, नन्दिनी, कपिला, द्विजा, भस्मगन्धा, पाण्डुपुत्री, कौन्ती तथा हरेणुका ये सब पर्यायवाची शब्द रेणुका के हैं। रेणुका-पाक में कटुरसयुक्त, किंचित् उष्णवीर्य, तिक्त तथा कटुरस युक्त और लघु होती है एवम् यह पित्तजनक, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पाचक, गर्भ गिराने वाली, कफ तथा वातकारक होती है। यह तृषा, खुजली, विष और दाह को दूर करती है ॥ १०५-१०६ ॥ ४२ रेणुका रेणुका एक संदिग्ध औषध है। रेणुक बीज नाम से विदेश में होने वाली निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फल बिकते हैं। लेकिन संभवतः ये फल शास्त्रीय रेणुका नहीं हैं । शास्त्रीय रेणुका शायद पिप्पलीवर्ग की पाइपर ऑरेण्टियकम् वालू. (Piper aurantiacum Wall.) के फल हैं। कुछ लोग निर्गुण्डी के बीज को ही रेणुका कहते हैं जो उसके प्रतिनिधि हो सकते हैं। चरक में शिरोविरेचन एवं वमनोपग गणों में रेणुक बीज का पाठ है। ग्रहणी के मध्वरिष्ट में एवं व्रणपीडन रूप में रेणुका का उल्लेख है । चरक, सुश्रुत तथा रा. नि. इसको गर्भपातक नहीं मानते । सुश्रुत में हरेणुका का उल्लेख एलादिगण, पिप्पल्यादिगण में तथा रेणुका का उल्लेख कटु- वर्ग में एवं भगंदर, नाडी, उपदंश व्रण तथा विष में इसका प्रयोग किया गया है। १. बलासवातवैकलव्य इति पाठो० । तृष्णादाहविषक्लैव्यकफवातविनाशिनी ॥ (नि. र.)
२५२ भावप्रकाशनिघण्टुः यहाँ पर वर्णन विदेश से आने वाले निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फलों का किया गया है। हि०-रेणुका, रेणुक, संभालू का बीज । गु०-हरेणु । म०-रेणुक बीज । इरा०-पंजनगुस्त । अ०-अथलक् । ले०-Vitex agnus-castus Linn. (वाइटेक्स एग्नस्-कास्टस् लिन्.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनैसी) । यह बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय प्रदेश आदि प्रदेशों में होता है । देहरादून के 'वैज्ञानिक बाग' में यह लगाया हुआ है । इसका गुल्म या वृक्ष होता है जिसकी शाखाएं चौपहल होती हैं। पत्ते-लम्बे पत्रनाल से युक्त, करतलाकार संयुक्त, पत्रक पांच कभी-कभी सात भी, भालाकार और लम्बे नोक वाले होते हैं। फल-साधारण मटर के बराबर, अण्डाकृति तथा धूसर वर्ण के होते हैं। बाह्य दल एवं वृन्त इसमें लगा रहता है। ये फल बहुत कड़े रहते हैं तथा काटने पर इसके अन्दर ४ खण्ड दिखलाई देते हैं जिनमें एक-एक छोटा चिपटा बीज रहता है। भारतीय निर्गुण्डी के फल से ये फल करीब आधे छोटे होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें कास्टाइन (Castine) नामक एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील दाहजनक पदार्थ, अम्लरूप्य एवं तैल, ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—ईरानी रेणुक बीज स्तम्भन, शोथघ्न, आनुलोमिक, मूत्रजनन एवं उत्तेजक हैं। प्लीहावृद्धि तथा यकृत रोग के कारण उत्पन्न जलोदर में इसको देते हैं। हिचकी में छोटी पीपल के साथ इसको खिलाते हैं। मात्रा—४ र०-१ मा० । अथ ग्रन्थिपर्णम् ( गठिवन ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिपर्णं ग्रन्थिकञ्च काकपुच्छञ्च गुच्छकम् । नीलपुष्पं सुगन्धञ्च कथितं तैलपर्णकम् ॥ १०८ ॥ ग्रन्थिपर्णं तिक्ततीक्ष्णं कटूष्णं दीपनं लघु । कफवातविषश्वासकण्डूदौर्गन्ध्यनाशनम् ॥१०८॥ गठिवन के नाम तथा गुण—ग्रन्थिपर्ण, ग्रन्थिक, काकपुच्छ, गुच्छक, नीलपुष्प, सुगन्ध और तैलपर्णक ये सब संस्कृत नाम गठिवन के हैं। गठिवन-तिक्त तथा कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा लघु होता है। यह कफ, वात, विष, श्वास, खुजली और दुर्गन्ध इन सबों को दूर करनेवाला होता है ॥ १०७-१०८ ॥ ४३ गठिवन गठिवन का स्वरूप भी संदिग्ध ही है। आगे स्थौणेयक तथा चोरक नामक दो ग्रन्थिपर्ण के भेद दिये हुये हैं वे भी संदिग्ध ही हैं। कुछ विद्वान् इन तीनों नामों को एक दूसरे का पर्याय मानते हैं। तालीसपत्र के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में से एक द्रव्य का स्थानिक नाम थुनेर होने से कुछ विद्वान् उसे ही स्थौणेयक मानते हैं। इस तरह यदि ग्रन्थिपर्ण एवं चोरक को थुनेर सजा- तीय माना जाय तो ये सब द्रव्य तालीसपत्र (थुनेर) के वर्ग के हो जाते हैं। श्री शालिग्राम जी ने इसे आसाम की ओर बहुत उत्पन्न होने वाली तृण जाति की गांठदार सुगन्धित वनस्पति माना है जिसमें पत्ते अंगुली के समान लम्बे-लम्बे और फूल नीले गुच्छों में आते हैं। कुछ लोग वनतुलसी को गठिवन मानते हैं। श्री डॉ. वा. ग. देसाई ने ग्रन्थिपर्ण नाम से एक वनस्पति का वर्णन किया है। उसके गुण शास्त्रोक्त ग्रन्थिपर्ण से मिलते नहीं फिर भी सादृश्य होने से उसका संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया जाता है। कर्पूरादिवर्गः २५३ सं०-ग्रन्थितृण । हि०-केसो, मचोटी । पं०-मचूटि, केसू । काश्मी०-द्रोब । सिं०-इंद्राणी । इरा०-हझार, बंदुक । अं०-Knot-grass (नॉट्-ग्रास्) । ले०-Polygonum aviculare Linn. (पॉलिगोनम् एविक्युलेर लिन्.) । Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह काश्मीर से कुमाऊं तक ६ से १२ हजार फीट की ऊँचाई में होता है। इसका छोटा सा क्षुप होता है। जड़-लम्बी, कुछ काष्ठमय एवं चिमड़ी होती है तथा उससे अनेक उपमूल निकले रहते हैं। शाखाएं-बहुत सी, जमीन पर फैली हुई एवं गोल होती हैं। इसकी टहनियों की ग्रंथियाँ बहुत गांठदार होती हैं तथा वहीं से पत्र निकलते हैं। पत्र-एकान्तर, शल्याकृति, अखण्ड, धूसर रंग के एवं १ इञ्च से छोटे होते हैं। पुष्प-श्वेत या लाल रंग के होते हैं। फल-त्रिकोणयुक्त, हरे एवं अग्रपर सूक्ष्म झुर्रीदार, चमकीले एवं काले होते हैं। सिन्ध में बीजों को बीजवंद कहते हैं। बला के बीजों को भी अनेक स्थानों में बीजवंद कहा जाता है। चिकित्सा में इसके मूल, पञ्चाग एवं बीजों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें पोलिगोनिन् अम्ल तथा सुगन्धित तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसकी जड़ रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, आनुलोमिक, ज्वरघ्न एवं कफघ्न है। बीज संसन, मूत्रजनन एवं वामक होते हैं। (१) अश्मरी या मूत्रकृच्छ्र में इसके पंचाग के क्वाथ या मूल रस का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बहुत लाभ होता है। (२) जीर्ण अतिसार में मूल रस या पंचांग रस देते हैं। (३) विषमज्वर में मूल रस का उपयोग करते हैं। (४) फुफ्फुस विकारों में विशेष कर श्वसनिका शोथ एवं कुकास में पंचांग क्वाथ पिलाते हैं। (५) सूखी हुई जड़ को पीसकर लगाने से वेदना कम होती है। विसर्प, बस्तिपीडा एवं आंत्र की पीडा में पत्तों का लेप किया जाता है। अथ स्थौणेयकम् । (ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः, ईषत्सुगन्धं 'थुनेर' इति लोके प्रसिद्धम् ) तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्थौणेयकं बर्हिबर्हं शुकबर्हञ्च कुक्कुरम् । शीर्णरोमशुकञ्चापि शुकपुष्पं शुकच्छदम् ॥१०९॥ स्थौणेयकं कटु स्वादु तिक्तं स्निग्धं त्रिदोषनुत् ॥ ११० ॥ मेधाशुक्रकरं रुच्यं रक्षोघ्नं ज्वरजन्तुजित् । हन्ति कुष्ठास्रतृड्दाहदौर्गन्ध्यतिलकालकान् ॥ १११ ॥ 'गठिवन' के ही भेद में थोड़ी सुगन्ध से युक्त जो 'थुनेर' नाम से लोक में प्रसिद्ध औषध है, उसके नाम तथा गुण—स्थौणेयक, बर्हिबर्ह, शुकबर्ह, कुक्कुर, शीर्णरोम, शुक, शुकपुष्प और शुक- च्छद ये सब संस्कृत नाम 'थुनेर' के हैं। थुनेर—कटु, तिक्तरस युक्त, स्वादिष्ट, स्निग्ध, तीन दोषों को दूर करने वाला, मेधा तथा शुक्र को बढ़ाने वाला, रुचिकारक, रक्षोघ्ननाशक एवं ज्वर, कृमि, कुष्ठ, रक्तविकार, तृषा, दाह, दुर्गन्ध और तिलकालक नामक रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ १०९-१११ ॥
२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४४ थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थि- पर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि. अ. ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि. अ. २३), बलातैल में (चि. अ. २८) एवं मदनफल उल्कारिकामोदक योग में (क. अ. १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण (सू. अ. ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०--Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्यूनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०--भांट, सं०--कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे क्षुप प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं। प्रत्येक भाग कडु और दुर्गन्धयुक्त होता है। पत्र-विपरीत, ४-९ इञ्च लम्बे, १-६ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, लम्बे नोक एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं। बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है। आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है। इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है। बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है। केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं। उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठा में पीस कर देते हैं। त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं। अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेडर' इति नेपालदेशे भवति । तस्य नामानि गुणाँश्चाह निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पुत्रः क्षेमको रिपुः । चोरको १ मधुरस्तिक्तः कटुः पाके कटुर्लघुः ॥ ११२ ॥ तीक्ष्णो हृद्यो हिमो हन्ति कुष्ठकण्डूकफानिलान् । रक्षोऽश्रीस्वेदमेदोऽस्रज्वरगन्धविषव्रणान् ॥ 'गठिवन' का ही भेद 'भटेडर' है जो कि नेपाल देश में उत्पन्न होता है, उसके नाम तथा गुण—निशाचर, धनहर, कितव, गणहासक, चोरक, शङ्कित, चण्ड, दुष्पुत्र, क्षेमक और रिपु ये सब संस्कृत नामक 'भटेडर' के हैं। भटेडर-मधुर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, पाक में कटु, लघु, तीक्ष्ण, हृदय के लिये हितकर और शीतवीर्य है। यह—कुष्ठ, खुजली, कफ, वात, रक्षोग्रह, अलक्ष्मी, पसीना, मेदरोग, रक्तविकार, ज्वर, दुर्गन्ध, विष और व्रण इन सबों को दूर करता है ॥११२-११३॥ ४५ भटेडर ( चोरक ) चोरक यह भी संदिग्ध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है। कुछ लोगों ने स्थौणेयक एवं चोरक को एक ही वनस्पति माना है। चरक में 'संज्ञास्थापन दशेमानि' में इसका उल्लेख है। धूपन द्रव्यों के साथ इसका उल्लेख है और उन्मादोक्त महापैशाचिक घृत में इसका प्रयोग किया १. रोचको इति पाठान्० । कर्पूरादिवर्गः २५५ गया है। अपस्मार, हिक्का, श्वास एवं पीनस, नासारोग आदि में भी चोरक का उल्लेख है। कुछ लोग पान की जड़ का व्यवहार 'चोरक' नाम से करते हैं। पञ्जाब की तरफ चोरा नाम से एक द्रव्य मिलता है। इसका लेटिन नाम Angelica glauca Edgw.; Fam. Umbelliferae (अंजेनिका ग्लॉका, एज., अम्बेलीफेरी) दिया हुआ है। यह पश्चिम हिमालय में काश्मीर से लेकर सिमला तक ८०००-१०००० की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसका क्षुप ४-७ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-चिकना, स्वावलम्बी, पोला तथा महीन प्रसी- ताओं से युक्त रहता है। पत्ते-प्रायः बड़े, १-३ पक्षवत् होते हैं। पत्रक-संख्या में ३, अण्डाकार या भालाकार, अनियमित एवं तीक्ष्ण दांतों से युक्त, ऊपरी पृष्ठ गहरे रंग का एवं अधोपृष्ठ श्वेतलिस रहता है। पुष्प-बहुत सफेद या नीलारुण रंग के तथा सवृन्तमुर्धज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल- चिकने, चिपटे आयताकार, १३ मि. मि. लम्बे एवं ६ मि. मि. चौड़े होते हैं। गुण और प्रयोग—यह हृद्य एवं उत्तेजक है और आध्मान एवं कुपचन में भी उपयोगी हैं। अथ तालीसपत्रम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तालीसमुक्तं पत्राढ्यं धात्रीपत्रञ्च तत्स्मृतम् ॥ ११४ ॥ तालीसं लघु तीक्ष्णोष्णं श्वासकासकफानिलान् । निहन्यरुचिगुल्मामवह्निमान्द्यक्षयामयान् ॥ तालीसपत्र के नाम तथा गुण—तालीस, पत्राढ्य और धात्रीपत्र से संस्कृत नाम 'तालीसपत्र' के हैं। तालीसपत्र-लघु, तीक्ष्ण और उष्णवीर्य होता है एवं यह-श्वास, खांसी, कफ, वात, अरुचि, गुल्म, आम, अग्नि की मन्दता और क्षयरोग इन सबों को दूर करता है ॥ ११४-११५ ॥ ४६ तालीसपत्र तालीसपत्र—यह नाम विभिन्न वर्गों के वृक्षों के पत्तों को भिन्न स्थानों में दिया हुआ दिख- लाई देता है। पहले लोग प्राचीनआमलक-फ्लैकोर्टिआ कॅटाफ्रॅक्टा राक्स (Flacourtia cataphracta Roxb.) के पत्तो को तालीसपत्र कहा करते थे। दक्षिण में कहीं कहीं तमालपत्र-सिर्नेमोमम् तमाल (Cinnamomum tamal ) के पत्रों को तालीसपत्र कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, राज- पूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य टेक्सस् बॅकेटा (Taxus baccata) के पत्तों का व्यवहार तालीस पत्र के नाम से करते हैं। इसे कुछ लोग स्थौणेयक भी मानते हैं। बंगाल के वैद्य एबिस वेब्बियाना (Abies webbiana) के पत्तों का व्यवहार तालीसपत्र के रूप में करते हैं। नेपाल एवं पंजाब के कुछ वैद्य तालीसफार, रोडोडेन्ड्रोन् एन्थोपोमोन (Rhododendron anthopogon) के पत्तों का व्यवहार करते हैं जिसकी २, ३ अन्य उपजातियाँ भी होती हैं। प्राचीनआमलक का वर्णन आगे फलवर्ग में आया है तथा तमाल पत्र का वर्णन पहले (पृष्ठ २२८) किया जा चुका है। यहाँ पर बाकी तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। चरक में दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है। सुश्रुत में शिरोविरेचनगण में इसका पाठ है। तालीसपत्र के शास्त्रीय गुण इस प्रकार दिये हुए हैं—यह तिक्त, कडु, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, शिरोविरेचन तथा कफ, वात, कास, श्वास, क्षय, वमन, अरुचि, गुल्म, आम, अग्निमांद्य और कृमि का नाश करने वाला है।
२५६ भावप्रकाशनिघण्टुः तालीसपत्र १ हि०-तालीसपत्र, थुनो, बिर्मी । गढ०-थुनेर । काश्मी०-पोस्तित् । वंब०-तालीसपत्र, बर्मी । बं०-बिर्मी । नेपा०-तेहीरे । खास०-दिंगंसहेर । अ०-जर्नब । अं०-Himalayan Yew (हिमालयन् यू ) । Taxus baccata Linn. (टॅक्सस् बॅकॅटा लिन.) । Fam. Taxa- ceae (टॅक्सॅसी) । हिमालय के काश्मीर, पूर्वी पजाब का पहाड़ी प्रदेश, गढवाल, अफगानिस्तान तथा अपर बर्मा आदि स्थानों में ६-१० हजार फीट की ऊँचाई पर इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं कहीं १०० फीट तक ऊँचे झोपड़ाकृतिक वृक्ष होते हैं। इसका स्तंभ छोटा किन्तु उसकी गोलाई १०, १२ फीट होती है। छाल-पतली, किंचित् लाली- युक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-दृढ, बाहरी भाग सफेद तथा अंदर का भाग रक्ताभ श्वेत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले रहते हैं। ये १-१॥ इञ्च लंबे, दशमांश इञ्च चौड़े, रेखाकार, कड़े, चिपटे, नोकीले, ऊपरी पृष्ठ पर गहरे हरे रंग के और अधःपृष्ठ पर हल्के पीले या सुरमई रंग के होते हैं। शिरा एक और पत्रनाल छोटा होता है। पत्तियों से विशेषतः सूखने पर एक प्रकार की गंध आती है। लालकोष में घिरा हुआ हरिताभ बीज होता है जो शीर्ष पर खुला रहता है। पहाड़ी लोग इसकी छाल से एक प्रकार का चाय सदृश पानक बनाकर पीते हैं और इसके फलों को खाते हैं। यद्यपि युक्तप्रान्त, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य तालीसपत्र के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं तथापि थुनेर नाम से इसके स्थौणेयक होने की अधिक संभावना है। बिर्मि नाम से उत्तरी भारत में आर्तव प्रवर्तक एवं शामक औषध के रूप में तथा अपस्मार, अपतंत्रक तथा नाड़ीदौर्बल्य आदि में इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसके बीज तथा पत्र में एक विषैला द्रव्य है जो बीज के ऊपर के लालकोष में नहीं होता। इसमें टॅक्सीन (Taxine ) नामक एक क्षाराम पाया जाता है। गुण और प्रयोग-तालीसपत्र अवसादक, उद्वेष्टननिरोधि, आर्तवजनन, वातानुलोमक, कफनिःसारक एवं बल्य है। इसकी क्रिया कुछ डिजिटॅलिस के समान होती है। अल्प मात्रा में प्रयोग करने पर नाडी एवं श्वास की गति कम होती है। मध्यम मात्रा में श्वास बढ़ता है तथा हृत्स्पन्द होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होता है। गर्भपात कराने के लिये प्रयुक्त करने पर गर्भपात नहीं होता लेकिन मृत्यु हो सकती है। बड़ी मात्रा से विषैला परिणाम होने से चक्कर, वमन, आक्षेप, नशा, आंखों की पुतलियों का विस्तार, मंदश्वास एवं श्वसनकृच्छ होकर मृत्यु होती है। विषैले परिणाम से आमाशय, आंत तथा वृक्कों में शोथ भी हो जाता है। डिजिटॅलिस के समान इसका संचायी प्रभाव नहीं होता। अपस्मार आदि आक्षेप युक्त व्याधियों में इसका प्रयोग किया जाता है। शुष्क कास, श्वासनलिका के जीर्णशोथ एवं तमक श्वास आदि में देने से खांसी की तकलीफ कम हो जाती है। प्रसूता को इसका फांट दिया जाता है। बस्तिशोथ में भी इससे लाभ होता है। मात्रा-१-२ र०। तालीसपत्र २ हि०, बं०-तालीसपत्र । गढ०-चिलिराध । काश्मी०-बादर, बुदुल । कनवार-स्युन । नेपा०-गोब्रिश सुलह । कुमा०-राय । भूता०-दुमशिंग । अं०-Himalayan Siver Fer कर्पूरादिवर्गः २५७ ( हिमालयन् सिल्वर फर ) । ले०-Abies webbiana Lindl. ( एविस वेबिआना लिंड ) । Fam. Pinaceae (पिर्नेंसी)। इसके ऊँचे सदाहरित वृक्ष हिमालय पर सिक्किम, भूटान के प्रदेश में ९ से १३ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष १५० फीट तक ऊँचे एवं स्तम्भ की गोलाई ३० फीट तक होती है। छाल-खाकी युक्त भूरे रंग की और खुरदरी होती है। नवीन शाखाएं प्रायः सूक्ष्म और भूरे रोमों से ढकी हुई रहती हैं। शाखाएँ प्रायः झुकी हुई रहती हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लंबे, दशमांश इञ्च चौड़े, पतले, रेखाकार और काण्ड से पेचदार क्रम से निकले हुवे परन्तु देखने में केवल दो कतारों में निकले हुए से मालूम होते हैं। इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला तथा गहरे हरे रंग का होता है और अधःपृष्ठ पर मध्यशिरा के दोनों ओर दो दो सफेद धुंधली रेखाएं होती हैं। पत्ते नताग्र होते हैं और अग्र पर प्रायः दो तीक्ष्ण और कठोर नोक निकले रहते हैं। फल-लंब गोल या आयताकार, २-४ इञ्च का और पकने पर गहरे बैंगनी रंग का होता है। बीज-करीब इञ्च का षष्ठमांश लम्बा होता है। इस जाति में मोरिण्डा नामक, ले०-एबिस पिण्ड्रो (Abies pindrow ) वृक्ष भी होता है जो इससे बहुत मिलता जुलता है। इसमें नवीन शाखायें रोमरहित और पत्तियां २-३ इञ्च लम्बी, दो कतारों में निकली हुई और दो दिशाओं में फैली हुई रहती हैं। एविस् वेबिआना में वे ऊपर की ओर हर दिशा में फैली हुई रहती हैं। इसके फल भी दूसरे की अपेक्षा छोटे और मोटे होते हैं। ये जौनसार में प्रायः १० हजार फीट के नीचे (देबुवन, मुंडाली आदि में) पाये जाते हैं। प्रायः पूर्वी भारत में एबिस वेबिआना के ही पत्र तालीशपत्र के नाम से बेचे जाते हैं। बंगाल के वैद्य इसी का व्यवहार करते हैं। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफनिःसारक, ग्राही एवं बल्य है। इसका उपयोग जीर्ण श्वास, कास, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, अरुचि एवं बस्तिविकार में किया जाता है। (१) तालीसादि चूर्ण १०-२० र० की मात्रा में श्वास, कास, रक्तपित्त, अग्निमांद्य एवं अति- सार आदि में दिया जाता है। बच्चों के श्वसनी फुफ्फुस पाक में १३ र० चूर्ण तथा कस्तूरी वटी १ र० की ६ मात्रा बना कर हर ४ घण्टे पर देने से लाभ होता है। (२) इसके पत्तों का स्वरस ५-१० बूँद जल या दुग्ध के साथ बच्चों के दंतोद्भेद के समय होने वाले ज्वर एवं कफविकार आदि में दिया जाता है। बंगाल में प्रसूता को बल्य औषध की तरह इसे देते हैं। (३) स्वरभंग, जीर्णश्वसनिका शोथ, राजयक्ष्मा तथा अन्य कफविकारों में इसके क्वाथ या फांट का उपयोग करते हैं। (४) इसके पत्तों का चूर्ण मधु एवं वासा स्वरस के साथ कास, श्वास तथा रक्तष्ठीवन में दिया जाता है। मात्रा-१-२ माशा । तालीसपत्र ३ इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनमें से २, ३ के पत्तों का प्रयोग तालीसपत्र के स्थान पर 17 नेपाल तथा पंजाब के कुछ वैद्य करते हैं। इनका संक्षेप में वर्णन किया गया है। १७ भा० नि०
२४८ भावप्रकाशनिघण्टुः (क) हि०-तालीसफर, तालीसपर। काश्मी०-तज्जकस्रुम । झेलम०-निचनी, रतनकाट, नेरा। पं०-तालिस्त्री। ले०-Rhododendron anthopogon D. Don. (रोडोडेन्ड्रॉन् एन्थोपोगोन् डी. डोन)। Fam, Ericaceae (एर्रिकेसी)। यह हिमालय में १०-१४ हजार फीट की ऊँचाई पर काश्मीर से भूटान तक उत्पन्न होता है। इसके सदा हरित गन्धयुक्त छोटे छोटे क्षुप १ से १।। फीट ऊँचे होते हैं। शाखाओं पर वल्क पत्र और खुरदरापन होता है। पत्ते-सनाल, १-१।। इञ्च लंबे, अंडाकार या चौड़े आयताकार, ऊपरी पृष्ठ पर चमकदार और अधःपृष्ठ पर भूरे रोमावरण से युक्त होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों का गुच्छा लगता है। फूल-किंचित पीले आते हैं। फल-बहुत छोटे और अंडाकार होते हैं। बीज-बहुत सूक्ष्म तथा दीर्घवृत्ताकार होते हैं। गुण और प्रयोग -इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक माना जाता है। पत्ते-उत्तेजक तथा सुगंधित होते हैं। इसके चूर्ण के नस्य से छीकें आती हैं। ऐसी धारणा है कि हिमालय के पूर्वोभाग में अधिक ऊँचाई पर चढ़ते समय शिरःशूल तथा हृल्लास उत्पन्न करने वाली वनस्पतियों में से एक यह हो । मात्रा-२-८ रत्ती । (ख) गढवाल-सिमारेस। ने०, हि०-चैरैलु । काश्मी०-तग्गर । कुमाऊं-चिमुल । ले०-Rhododendron campanulatum D. Don (रोडोडेन्ड्रॉन् कम्पैनुलैटम् डी. डोन)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है । इसका गुल्म-कुछ बड़ा; पत्ते-३-५ इञ्च लंबे, दीर्घवृत्ताकार, आयताकार तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। नीचे के पृष्ठ पर दालचीनी रंग के सघन रोमों से शिराएं ढकी रहती हैं। पुष्प-बैंगनी या नीलापन किये श्वेत रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते बकरियों के लिये विषैले समझे जाते हैं। अर्धावभेदक तथा प्रतिश्याय में तम्बाकू के साथ इसके पत्तों का नस्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। जीर्ण आम- वात, फिरंग तथा गृध्रसी में इसके पत्तों का आभ्यन्तरिक उपयोग किया जाता है। नेपाल में इसके पंचाग का प्रयोग जीर्ण ज्वर तथा राजयक्ष्मा में किया जाता है। मात्रा-२-८ २०। (ग) गढवाल-सिमरित। भोटिया-तल्लसुमा । यू०, हि०-ताली सफर । ले०-Rhodo- dendron lepidotum Wall. (रोडोडेन्ड्रॉन् लेपिडोटम् वाल.)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका क्षुप छोटा तथा गन्धयुक्त होता है। पत्ते-१/२ इञ्च से १।।। इञ्च लम्बे, प्रायः विनाल, ऊपर से लट्वाकार और कुण्ठिताग्र या भालाकार और कुछ नोकीले और अधःपृष्ठ श्वेत या भुरचई रंग के रोमावरण से ढका हुआ रहता है। फूल-लाल, बैंगनी या पीले, ३-४ के गुच्छों में या अकेले रहते हैं। फल-छोटे, ५ धारीयुक्त होते हैं तथा बीज छोटे-छोटे अण्डाकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण (क) के समान ही हैं। अथ कङ्कोलं सुगन्धिद्रव्यम् 'सीतलचीनी' इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्च कङ्कोलं' कोलकं प्रोक्तं तथा कोषफलं स्मृतम् । कङ्कोलं लघु तीक्ष्णोष्णं तिक्तं हृद्यं रुचिप्रदम् । आस्यदौर्गन्ध्यहृद्रोगकफवातामयान्व्यहेत् ॥ १. कक्कोलं इति पाठा० । कर्पूरादिवर्गः २५६ 'कङ्कोल नामक' सुगन्ध द्रव्य जो कि शीतल चीनी नाम से प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- कङ्कोल, कोलक और कोषफल ये सब संस्कृत नाम 'शीतलचीनी' के हैं। शीतलचीनी-लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तिक्त रस युक्त, हृदय को हितकर तथा रुचिकारक होती है। यह मुख की दुर्गन्धता, हृद्रोग, कफ तथा वातरोग और आन्ध्य (आँखों से न दीखना) इन सबों को दूर करती है ॥ ११६ ॥ ४७ शीतलचीनी हि०-शीतलचीनी, कबाबचीनी, कङ्कोल, शीतलमिर्च । बं०-कबाबचिञि, सुगन्धमरिच । म०-कङ्कोल, कापूरचीनी । गु०-चणकबाब । क०-गन्धमेणसु । ते०-चलवमिरियालु । ता०-वा- टिमलगु । फा०-कबाबह, कबाबचीनी । अ० हब्बुल ऊरूस, कबाबेसीनी । अं०-Cubebs (क्यूबेब्स); Tailed Pepper (टेल्ड पेपर) । ले०-Piper cubeba Linn. f. (पाइपर क्यूबेबा लिन.) । Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी) । शीतलचीनी-यह एक लता जाति की वनस्पति का पूर्ण रूप से विकसित किन्तु अपक्व अवस्था में सुखाया हुआ फल है, जो काली मरिच के समान होता है। यह जावा, सुमात्रा तथा बोर्निओ में होती है। लङ्का में इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में विशेष कर मैसूर में इसकी कुछ उपज की जाती है। इसकी आरोही बहुवर्षायु लता होती है। कांड-चिकना, लचीला एवं जोड़दार होता है। पत्ते-असंग, सकृन्त, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार, नोकीले, गोल या हृदत् पर्णतलवाले, चर्मवत् तथा चिकने होते हैं। शिराएं बहुत होती हैं। पुष्प-अद्विलिंगी तथा अवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-गोल, अष्ठिफल होते हैं जिनमें आधार की तरफ डंठल लगा रहता है। हरी अवस्था में ही इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है। यह अपक्व फल काली मिर्च के समान, गोल, झुर्रीदार गहरे भूरे रंग के एवं करीब ४ मि० मि० व्यास के सूखे हुये होते हैं। इसके शिखर पर त्रिकोणयुक्त कुक्षि लगी रहती है तथा आधार पर ४ मि० मि० लंबा डंठल रहता है। इसके अन्दर एक बीज रहता है। इसको चबाने से मनोरम तीक्ष्ण मसालेदार विशिष्ट गन्ध आती है; स्वाद कडुवा, चरपरा तथा जीभ ठंडी मालूम पड़ती है। औषध में इन्हीं फलों का व्यवहार किया जाता है। कुछ लोग इसके दो भेद मानते हैं। छोटे तथा पतले छिलके वाले फलों को शीतलचीनी एवं बड़े तथा मोटे छिलके वाले फलों को कबाबचीनी कहा जाता है। वास्तव में एक ही लता के यह फल होते हैं। प्राचीन काल से मुखशुद्धि के लिये पान के साथ या स्वतन्त्र रूप में तथा मसालों में इसका प्रयोग किया जाता रहा है। रासायनिक संघटन-कबाबचीनी में उड़नशील तैल ५-२०%, क्यूबैबिन् (Cubebin, C20 H20 O6), राल, तैल, स्टार्च, गोंद, क्यूबैबिक् एसिड (Cubebic acid) करीब ०.९६% तथा कॅल्शियम ऑग्झैलेट, फॉस्फेट एवं मैलेट तथा मैग्नेशियम् मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें के प्रधान गुणकारी तत्व उड़नशील तैल एवं क्यूबैबिक एसिड हैं। पुराने कबाबचीनी द्वारा निकाले तैल में गंधहीन एवं पारदर्शक एक प्रकार का कर्पूर (Camphor of cubeb, C15 H26 O) पाया जाता है। इसमें का उड़नशील तैल स्वच्छ, हल्के पीताभ या नीलाभ हरित रंग का, विशिष्ट गंधयुक्त एवं उष्ण कर्पूरवत् स्वादवाला होता है। इस तैल में प्रधान रूप में टर्पेन्स (Terpenes) एवं सैस्क टर्पेन्स (Sesquiterpenes) पाये जाते हैं। भारतीय कबाबचीनी में भी उपर्युक्त तैल से मिलता
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२६० भावप्रकाशनिघण्टुः घुलता उड़नशील तैल पाया जाता है। तैल को शीत तथा प्रकाशहीन स्थान में बन्द बोतलों में रखना चाहिये । परीक्षा- किसी श्वेत पात्र में कबाबचीनी का चूर्ण रखकर उस पर १ बूंद गंधक का तेजाब रखकर ऊपर से देखने से नीलारुण (Purple) रंग दिखलाई देता है। अच्छी कबाबचीनी में सिकुड़े हुये अविकसित फल १०% से अधिक, कांड ५% से अधिक, इनको छोड़कर अन्य पदार्थ २% से अधिक, राख ८% से अधिक एवं अम्ल में न घुलने वाली राख २% से अधिक न होनी चाहिये। गुण और प्रयोग- कबाबचीनी उष्ण, उत्तेजक, कफघ्न, वातघ्न, प्रतिदूषक (Antiseptic), मूत्रजनक, दीपन, पाचन, रुचिकर, वृष्य, तृष्णा शामक तथा मुख की दुर्गन्ध एवं जड़तानाशक है। इसमें स्थानिक प्रक्षोभक गुणों के कारण यह श्लेष्मकला के लिये उत्तेजक है। प्रचूषण के पश्चात् इसके कार्यकारोसत्व का उत्सर्ग वृक्क एवं श्वसनसंस्थान द्वारा होता है। मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पाचनक्रिया विकृत कर देती है। त्वचा की उत्तेजना से कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न होती है। (१) प्रतिदूषक एवं मूत्रल औषध की तरह इसे पुराने सोजाक में देते हैं। ३०-६० र० चूर्ण दुग्ध के साथ या २३० फिटकिरी के साथ दिन में ३ बार देते हैं। इससे बस्तिशोथ में भी लाभ होता है। (२) श्वसन संस्थान के विकारों में प्रतिदूषक एवं उत्तेजक कफनिःसारक रूप में खदिरादि गुटिका जैसी चूसने की गोली बनाकर उसे चूसने को दिया जाता है। गले की शिथिलता तथा मुखपाक आदि में भी इससे लाभ होता है। गायक गला साफ करने के लिये इसको चूसते हैं। खांसी आदि में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाते हैं। इसका धूम्रपान श्वास में लाभदायक है। (३) नाक के श्लेष्मा को कम करने के लिये इसके नस्य का उपयोग किया जाता है। (४) इसके तैल को मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग, बस्तिशोथ, सोजाक तथा सोजाक की पुरानी अवस्था में शर्करा के साथ या गोंद के साथ एमल्शन बनाकर या कैप्सुल में रख कर प्रयोग करते हैं। जीर्ण श्वसनिका शोथ में इसको उष्ण जल मे डालकर उसकी वाष्प संघी जाती है। मात्रा- चूर्ण १-४ माशा। तैल ५-२० बूंद।
अथ गन्धकोकिला गन्धमालती च । तयोर्गुणानाह स्निग्धोष्णा कफहत्तिक्ता सुगन्धा गन्धकोकिला । गन्धकोकिलया तुल्या विज्ञेया गन्धमालती ॥ 'गन्धकोकिला' तथा 'गन्धमालती' के गुण- गन्धकोकिला-तक्तरसयुक्त, स्निग्ध, सुगन्ध- युक्त, उष्णवीर्य एवं कफनाशक होती है। 'गन्धकोकिला' के समान 'गन्धमालती' के भी गुण समझना चाहिये ॥ ११७ ॥
४८ गन्धकोकिला एवं गन्धमालती ये दोनों ही संदिग्ध गन्ध द्रव्य हैं। बाजार में गन्धकोकिला नाम से एक प्रकार के फल बिकते हैं जो देखने में हपुषा के समान किन्तु कुछ चिपटे होते हैं। गन्धमालती नाम से एक प्रकार की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं जो रेशेदार किचित् बादामी रंग के होते हैं। आगे पुष्पवर्ग में मालती (जाती, चमेली) एवं स्वर्णजाती का वर्णन आया है। मालती (रतेड) नामक एक अन्य लता होती है जिसे कुछ लोगों ने गंधमालती लिखा है। इसकी एक अन्य उपजाति
कर्पूरादिवर्गः २६१ भी पाई जाती है। निघण्टुकारों ने जो जातीभेद लिखा है वह संभवतः यही रतेड हो या यह यहाँ पर वर्णित गन्धमालती हो। गन्धमालती (रतेड) का लैटिन नाम (Aganosma caryophyl- lata G. Don.) (अँगैनोस्मा कॅरियोफाइलँटा जी० डोन) एवं इसी के भेद का A. calycina A. DC. (अँ० कॅलिसिना ए० डी० सी०) है जिनका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। **लै०-**Aganosma caryophyllata G. Don. (अँगैनोरमा कॅरियोफाइलैटा जी. डोन.)। Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । हिं०, बं०- मालती। संथा०- रतेड़। यह बंगाल, मुंगेर, उत्तरी सरकार एवं दक्षिण में होती है। इसकी लता-विस्तार में फैलने वाली तथा आरोही होती हैं। पत्ते लट्वाकार या अण्डाकार ३-५५ × १.५-३ इञ्च बड़े, पर्णशिराएं रक्ताभ, आमने सामने के पत्ते कभी-कभी छोटे बड़े एवं फलक का आधार तिरछा होता है। पुष्प-बड़े, श्वेत, सुगंधि, तथा समस्त काण्डज गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल नीचे पतला किन्तु ऊपर चौड़ा रहता है। फली-दो-दो, अग्र पर जुड़ी हुई एवं ४ से १४ इञ्च लंबी तथा अग्र की ओर क्रमशः संकुचित रहती हैं। गुण और प्रयोग- यह वामक है। इसके पत्तों का पैत्तिक विकारों में प्रयोग करते हैं। पानी से अंगुलियों के बीच जब पक जाता है तब इसकी अग्रय कलिकाओं का स्वरस लगाया जाता है। इसके पुष्पों का नेत्र विकारों में प्रयोग करते हैं।
अथ लामज्जकम् । (उशीरवत् पीतच्छवितृणविशेषः)। तस्य नामगुणानाह लामज्जकं सुनालं स्यादमृणालं लवं$^१$ लघु । इष्टकापथकं सेव्यं नलदञ्चावदातकम् ॥११८॥ लामज्जकं हिमं तिक्तं लघु दोषत्रयास्त्रजित् । स्वदामयस्वेदकृच्छ्रदाहपित्तास्त्ररोगनुत् ॥११९॥ 'लामज्जक' जो कि 'वीरग' घास की भाँति पीत वर्ण का एक विशेष तृण होता है उसके नाम तथा गुण- लामज्जक, सुनाल, अमृणाल, लव, लघु, इष्टकापथक, सेव्य, नलद और अवदातक ये सब संस्कृत नाम 'लामज्जक' के हैं। लामज्जक-तिक्तरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होता है एवं यह त्रिदोष, रक्तविकार, चर्मरोग, पसीना, मूत्रकृच्छ्र, दाह और रक्तपित्त इन सबों को दूर करता है।
४९ लामज्जक लामज्जक भी संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे खस की तरह का पीतवर्ण का तृणविशेष मानते हैं। कुछ ग्रंथकारों का कहना है कि जब तक इसका निर्णय नहीं हो जाता तब तक लामज्जक के स्थान पर खस का व्यवहार करना चाहिये। कुछ नवीन ग्रन्थकारों ने लामज्जक का लै० नाम Cymbopogon jwarankusa (साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश) लिखा है। श्रीयुत् यादव जी अपनी द्रव्यगुणविज्ञान पुस्तक में लिखते हैं कि यह (साम्बो-ज्वरांकुश) यूनानी औषध विक्रेताओं के यहाँ इजखिर नाम से बिकता है तथा इजखिर उष्णवीर्य द्रव्य होने से इसे लामज्जक नहीं मान सकते। वे इसे भूतृण मानते हैं। बाजार में एक पीतवर्ण का खस मिलता है। हो सकता है कि उसका लैटिन नाम ज्ञात न हो या वह खस का ही भेद हो लेकिन लामज्जक के स्थान पर उसका प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ निम्न वर्णन साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश का किया गया है। हिं०- लखवी, लामज्जक, करनकुश, घाटजारी। **मिर्जापुर-**इन्द्रबगई। **बं०-**कारांकुस । म०- पिवलावाला। **पं०-**बूर, इभरंकुश। **गु०-**पिलो वालो । **ते०-**पासनगड्डि। **ता०-**कामाच्चिपिल्लु। १. लयमिति पाठ० ।
२६२ | भावप्रकाश निघण्टुः क०-करिलावचा। अ०-इजखिर। इरा०-गुर्गियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एन्ड्रोपोगॉन् ज्वरांकुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साम्बोपोगॉन् ज्वरांकुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लंबे, ०'२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लंबे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डंडी निकली रहती है। जड़-लंबी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगंधित तथा पीले रङ्ग की होती है। इसके पंचाग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तव- जनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचांग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के काथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचांग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा-३-६ तो०।
अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणांश्चाह एलवालुकमैलैयं सुगन्धि हरिवालुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच१मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥ १२१ ॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भांति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण- एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धि, हरिवालुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्यत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कड़वरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, व्रण, वमन, प्यास, खांसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ मूत्ररोग और कृमिरोग इन सबों को दूर करती है ॥ १२०-१२१ ॥ ५० एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेशानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अशोक अमर्यारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजका- रिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। १. कपित्थफल इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः | २६३ उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, अँलोज (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रूनस् सिरैसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डा० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिस- ओइडिस् को एलवालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आधमान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक १ हि०-आलुवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरैसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोजैसी) । इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लंबे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर ( तीक्ष्णाग्रगोल दांत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्मकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायैनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ र० । एलवालुक २ हि०-बालका सागं । बं०-वालुक। म०-व (वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै । ते०- इसकदन्गिकुर । ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडंसी )। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती हैं। इसके क्षुप छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लंबे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-वाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में बालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं। इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है। गुण और प्रयोग-इसका पंचांग सुगंधि, आनुलोमिक एवं कृमिघ्न है। कृमिरोग में इसके पंचांग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं। हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं।
२६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कैवर्त्तीमुस्तकम् ( केवटी मोथा ) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुष्ठघ्नं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्त्तीमुस्तकानि च ॥ १२२ ॥ मुस्ताचपेलवपुरं शुकाभं स्याद्वितुन्नकम् ॥ १२३ ॥ वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ॥ १२४॥ 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुष्ठघ्न, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटी मोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण- यह मोथा की भांति, कोमल दलकोश तथा शुक की भांति वर्ण से युक्त होता है। केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है ॥ १२२-१२४ ॥ ✿ 'केवटीमोथा' - 'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग् मुस्ताकृतिः ॥ १२२-१२४ ॥ यहां पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भांति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं ॥ १२२-१२४ ॥ ५१ केवटीमोथा कैवर्त्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है। मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्त्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है। केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं। इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं। इसलिये इन्हें कैवर्त्तमुस्तक माना जा सकता है। डा. देसाई ने ले.-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. अमैरन्थेसी) का संस्कृत नाम शितिवार, वितुन्नक लिखा है। इसे हि. में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है। शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है। शिति- वार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं। सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है। शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है। इसका क्षुप समस्त भारत में होता है। यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते- एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली- दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं। पत्ते का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है। बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं। १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं। बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है। मात्रा-३-१ तोला। अथ स्पृक्का ( असवरग ) । सुगन्धिद्रव्यम् ( शाकविशेषः ) । 'लङ्कोइकपुरी' ति लोके च । तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः । समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोपिकेत्यपि ॥ १२५ ॥ १. पुरमिति पाठ० । २. शुकाममिति पाठ० । कर्पूरादिवर्गः | २६५ स्पृक्का स्वाद्धी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत् । कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री ज्वररक्तहृत् ॥ १२६ ॥ स्पृक्का (असवरग) जो कि सुगन्धिद्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण-स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोपिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का- स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती है एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है ॥ १२५-१२६ ॥ ५२ स्पृक्का । स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु. सू. ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले. नाम मार्सि- लिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेलू (Tri- folium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डा० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलबारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०-मखमली चोधारी । म०-कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजवान, चौधारा। क०-करितुंबे । ते०-मोगबीराकु । ता०-पेथिमसरी । अं०-Malabar catmint (मॅलंबर केटमिण्ट) । ले०-Ani- someles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलबारिका र० ब्र०) | Fam. Labiatae (लेविपटी) । इसका क्षुप अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते-मोटे, लंबगोल, कुछ शंक्वाकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कडवे रहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-३ चम्मच । तैल २-५ बूंद । 'पर्पटी' इति प्रसिद्ध 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम् । अथ पर्पटी [ पनडी ] । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्चक्रवर्त्तिनी ॥ १२७ ॥ पर्पटी सुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः । विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ॥ १२८ ॥ १. दाहास्र इति पाठ० ।
२६६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण - पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जनुका, जननी, जनी, जतूकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्र- वर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तक और कुष्ठ को दूर करने वाली है ॥ १२७-१२८ ॥ ५३ पर्पटी सुगन्धि पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डा. देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट । गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-मांली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटौ)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धि उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भांग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा - ½-१ चम्मच । अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटी। धमन्यञ्जनकंशी च निर्मन्थ्या¹ सुषिरा नली ॥१२९॥ नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ॥ 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य देखने में मूंगे के समान होती है और जो कि कहीं-कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- नलिका, विद्रुमलता, कपोत- चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकंशी, निर्मन्थ्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है ॥ १२९-१३० ॥ ५४ नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े १. निर्मथ्या इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः २६७ या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् [पुण्डेरी ] इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्लं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ॥ १३१ ॥ 'पुण्डेरी' इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण- प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम 'पुण्डेरी' के हैं। पुण्डेरी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है ॥ १३१ ॥ ५५ पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है। पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है। पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क. अ. २) में कन्दविष का उल्लेख है। 'पुण्डरी- केण रक्तवमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे।' प्रपौण्डरीक का एक नाम 'चक्षुष्य' होने से 'चाकसू' नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है। डा. देसाई ने चाकसू को 'वन्यकुलत्थ' लिखा है। वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है। कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है। निम्न वर्णन चाकसू का है। सं०-चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका। हि०-चाक्षुस्, चाकसू। पं०-चक्सू । गु०-चीमेड। काठि०-चमेड। म०-चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०-करुकानम् । ते०-चनुपाल विट्टलु । कं०-क्रीड, निन्द्रताळ । अ०-जश्मीजज, हब्बुरसूदान । फा०-चश्मीजञ्ज, चशुम । ले०-Cassia absus Linn. (कॅसिआ ऍब्सस् लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है। इसके एक वर्षीय क्षुप ८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं। पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है। पत्रक संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लंबे, करीब २ कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं। पुष्प संयुक्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी में रहते हैं। फली-चिपटी, रोमश तथा १-१½ इञ्च लंबी होती है। बीज-संख्या में पांच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लंबाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं। बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कडवी मज्जा निकलती है।