भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ भावप्रकाशनिघण्टुः नाम दे दिया गया। शटी (कचूर) और शठी (कपूरकचरी) यह थोड़ा सा नामभेद कोई योजना- पूर्वक पार्थक्य दिखलाने के लिये नहीं रखा होगा। बल्कि गलती से ऐसे दो नाम पड़ गये होंगे। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, कटु मुलायम राल, गोंद, स्टार्च, शर्करा एवं ऑर्र्गेनिक अम्ल आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कचूर सुगन्धि, रुचिकर, दीपन, स्वर्य, कफहर, वातहर, मूत्रजनन एवं हृद्य है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अर्श, हिक्का, ज्वर, संग्रहणी, प्लीहा, गुल्म, कुष्ठ, कृमि एवं व्रण में किया जाता है। ( १ ) मुख को साफ करने के लिये इसको चबाते हैं। गायक इसको आवाज साफ करने के लिये चूसते हैं। इससे खांसी एवं गले की खराश में लाभ होता है। ( २ ) इसके ताजे कंदों का पाक या खण्ड प्रसूता के लिए पौष्टिक माना जाता है। ( ३ ) विषमज्वर, प्रतिश्याय तथा शरीर में पीड़ा हो तो कचूर, छोटी पीपल एवं दालचीनी का क्वाथ मधु मिलाकर पिलाते हैं तथा पीड़ा में इसका लेप करते हैं। ( ४ ) श्वेत प्रदर तथा पूयमेह में यह बहुत लाभप्रद है। परमा में इसके फांट से जलन कम होकर पेशाब साफ होता है। ( ५ ) जलोदर में इसके पत्तों का रस पिलाया जाता है। गांठों तथा फोड़े आदि पर इसके पत्तों को पीसकर बांधा जाता है। अर्श तथा अतिसार में इसका शाक के रूप में प्रयोग लाभप्रद माना जाता है। ( ६ ) बच्चों के आक्षेप में कंबोडियन माताएं इसको चबाकर सर तथा शरीर पर लगाती हैं। ( ७ ) मोच में इसको पीसकर फिटकिरी मिलाकर लगाते हैं। मात्रा—१-४ माशा।
अथ मुरा (मुरहरी, एकाङ्गी)। तस्या नामानि गुणांश्चाह मुरा गन्धकुटी दैत्या सुरभिः शालपर्णिका ॥ ९७ ॥ मुरा तिक्ता हिमा स्वादी लघ्वी पित्तानिलापहा । ज्वरासृग्भूतदोषघ्नी कुष्ठकासविनाशिनी ॥ ९८ ॥ मुरा (एकाङ्गी) के नाम तथा गुण—मुरा, गन्धकुटी, दैत्या, सुरभि और शालपर्णिका ये सब संस्कृत नाम मुरा के हैं। मुरा—तिक्त रस युक्त, शीतवीर्य, स्वादिष्ट और लघु होती है एवं यह पित्त, वात, ज्वर, रक्तविकार, भूत और राक्षस सम्बन्धी बाधा, कुष्ठ तथा खांसी इन सबों को दूर करने वाली होती है ॥ ९७-९८ ॥
३९ मुरा मुरा नामक गन्धद्रव्य के सम्बन्ध में मतभेद है। कुछ लोग इसे मरोडफली (Helicteres- isora Linn, हेलिक्टेरिस आइसोरा लिन.) मानते हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। डा० कर्नल चोपरा की पुस्तक में एरिथ्रिना स्ट्रिक्टा राक्सब. (Erythrina stricta Roxb.) का संस्कृत नाम मुरा लिखा मिलता है। पंजाबी में मुरां नाम साइर्नन्थस् का दिया है जिसके पुष्पों का दमे में उपयोग होता है। कुछ लोग इसे कचूर, कपूरकचरी या जटामांसी का भेद मानते हैं। अधिक संभव है यह कपूरकचरी का भेद हो ।
कर्पूरादिवर्गः २४७ अथ गन्धपलाशी (कपूरकचरी) (सुगन्धिद्रव्यं काश्मीरे प्रसिद्धम्) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शठी पलाश़ी षड्ग्रन्था सुव्रता गन्धमूलिका । गन्धारिका गन्धवधूर्वधूः पृथुपलाशिका ॥ ९९ ॥ भवेदगन्धपलाशी तु कषाया ग्राहिणी लघुः । तिक्ता तीक्ष्णा च कटुकाऽनुष्णाऽऽस्यमलनाशिनी । शोथकासव्रणश्वासशूलसिध्मग्रहापहा १ ॥ १०० ॥ कपूर कचरी जो कि काश्मीर देश में प्रसिद्ध एक प्रकार का सुगन्धि द्रव्य है, उसके नाम तथा गुण—शठी, पलाश़ी, षड्ग्रन्था, सुव्रता, गन्धमूलिका, गन्धारिका, गन्धवधू, वधू, पृथुपलाशिका और गन्धपलाशी ये सब संस्कृत नाम 'कपूर कचरी' के हैं। कपूर कचरी—कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, ग्राही, लघु, तीक्ष्ण तथा थोड़ा उष्णवीर्य होती है एवम् यह मुख के मल को दूर करने वाली, शोथ, खांसी, व्रण, श्वास, शूल, सिध्म (या-हिक्का) और ग्रहबाधा इन सबों को दूर करने वाली है ॥ ९९-१०० ॥
४० कपूर कचरी हि०—गंधपलाशी, कपूर कचरी, सितरूटी। बं०—शठी, गन्ध शटी। म०—कपूर कचरी। गु०—कपूर काचरी। क०—गन्ध शठी। ता०—शिमैकिचिलिक् किशांगु। पं०—कचूर कनु, शेदूरी। ले०—Hedychium spicatum Ham. ex Smith (हेडिचिअम् स्पाइकैटम् हेम्. एक्स स्मिथ)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)। यह हिमालय के साधारण प्रान्त, पंजाब, नेपाल और कुमाऊँ में अधिक उत्पन्न होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि है। जड़—बहुवर्षायु, कन्दवत् भूमि के भीतर समतल बढ़ती है। इसी को सुखा कर कार्य में लेते हैं। डंठल—लम्बा पत्रयुक्त होता है। पत्ते—हल्दी के पत्तों के समान एक फुट लम्बे, अनियमित चौड़े एवं आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—सफेद होते हैं। फल—त्रिकोष्ठयुक्त, गोलाकार और चिकना होता है। इसके मूलस्तंभ (मूल) को काटकर सुखाये हुये, छोटे बड़े सुगंधित टुकड़े बाजार में बिकते हैं। यह सफेद रंग के एवं पिष्टमय रहते हैं। इनका बाह्यत्वक् रक्ताभ भूरे रंग का होता है। इसका स्वाद कड़वा एवं तीता रहता है। अबीर के निर्माण एवं गुडाखू को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। कपूर कचरी नाम से इसी वर्ग के 'चन्द्रमूल' (Kaempfe- ria galangal Linn, केम्फेरिआ गैलगल् लिन) २ के मूल के टुकड़े भी व्यवहार में लाये जाते हैं जो इसी के समान होते हैं। बाजार में एक चीनी कपूर कचरी नामक औषध भी बिकती है जो देखने में अच्छी होते हुये भी उसमें सुगन्ध कम रहती है।
१. हिध्म इति पाठा० । २. चन्द्रमूल के क्षुप दक्षिण की तरफ बगीचों में लगाये मिलते हैं। इसमें १४% खनिज द्रव्य, सुगंधि तैल, ४% गोंद तथा अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ रहते हैं। यह मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं कफनिःसारक है। सर्दी-खाँसी में इससे सिद्ध तैल को नाक तथा छाती पर लगाते हैं एवं मधु के साथ १-२ रत्ती चूर्ण चटाते हैं। मुख को सुवासित करने के लिये इसके छोटे टुकड़े को मुख में रखते हैं। इसके उबटन का भी प्रयोग किया जाता है।