भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 143 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

२४८ भावप्रकाश निघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च, गोंद, सेल्युलोज, अल्ब्यूमिन्, तैल, राल एवं सुगन्धि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-कपूरकचरी उष्ण, ग्राही, लघु, कटु, तिक्त, दीपन एवं वातानुलोमक होती है। इसका उपयोग कास, श्वास, हिक्का, वमन, अपतन्त्रक, शूल एवं व्रण में किया जाता है। दन्तशूल में इसके मंजन से लाभ होता है। इससे मुख की दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा-१-४ माशा । अथ प्रियङ्गन्धप्रियङ्गुश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह प्रियङ्गुः फलिनी कान्ता लता च महिलाऽऽह्वया ॥ १०१ ॥ गुन्द्रा गन्धफला श्यामा विष्वक्सेनाङ्गनाप्रिया । प्रियङ्गुः शीतला तिक्ता तुवराऽनिलपित्तहृत् ॥ १०२ ॥ १रक्तातीसारदौर्गन्ध्यस्वेददाहज्वरापहा । (वान्तिभ्रान्त्यतिसारघ्नी वक्त्रजाड्यविनाशिनी ) ॥ गुल्मतृड्विषमोहघ्नी२ तद्वद् गन्धप्रियङ्गुका ॥ १०३ ॥ 'प्रियङ्गु' तथा 'गन्धप्रियङ्गु' के नाम और गुण-प्रियङ्गु, फलिनी, कान्ता, लता, महिला- ह्वया (स्त्रीवाचक सभी शब्द), गुन्द्रा, गन्धफला, श्यामा, विष्वक्सेनाङ्गना और प्रिया ये सब संस्कृत नाम 'प्रियङ्गु' के हैं। प्रियङ्गु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतवीर्य होती है। यह वात, पित्त, रक्तातिसार, दुर्गन्ध, पसीना, दाह, ज्वर, (वमन, चक्कर, अतिसार, मुँह की जड़ता ) गुल्म, तृषा, विष और मोह इन सब रोगों को दूर करती है। इसी भाँति 'गन्धप्रियङ्गु' के भी गुण होते हैं ॥ १०१-१०३ ॥ अथ तत्फलगुणानप्याह तत्फलं मधुरं रूक्षं कषायं शीतलं गुरु । विबन्धाध्मानबलकृत्स्रंग्राहि कफपित्तजित् ॥ १०४ ॥ प्रियङ्गु का फल-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतवीर्य और गुरु होता है। यह विबन्ध- कारक, आध्मानकारक, बलकारक एवं संग्राही तथा कफपित्त नाशक होता है ॥ १०४ ॥ ४१ प्रियङ्गु प्रियङ्गु के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। इसी निघण्टु के धान्यवर्ग में कंगु (कंगुनी धान्य) के पर्याय में भी प्रियङ्गु नाम दिया हुआ है। इससे भ्रम होता है कि क्या यहाँ पर वर्णित प्रियङ्गु तथा धान्यवर्गोक्त प्रियङ्गु एक ही हैं ? प्रियङ्गु से कौन सा प्रियङ्गु लिया जाय ? वास्तव में कंगु के पर्याय में केवल प्रियङ्गु नाम देने से ही प्रियङ्गु से कंगु धान्य लेना उचित नहीं है। दोनों के गुण बिलकुल भिन्न हैं। जहां पर टीकाकारों ने स्पष्ट रूप से प्रियंगु के लिये कंगु लेने का निर्देश किया हो वहीं पर प्रियंगु के लिये कंगु का उपयोग किया जा सकता है अन्यथा प्रियंगु से कर्पूरादिवर्गोक्त प्रियंगु ही लेना उचित है। कुछ लोगों ने कंगु से पार्थक्य करने के लिये इसको गंधप्रियंगु लिखा है लेकिन भावप्रकाशकार ने यहां पर प्रियंगु तथा गंधप्रियंगु दो द्रव्यों का उल्लेख किया है। यहां १. रक्तातिस्रोग इति पाठो० । २. मोहनी इति पाठो० । कर्पूरादिवर्गः २४६ पर इन दोनों के गुण समान बतलाये हैं। धान्यवर्गोक्त कंगु, जिसका एक पर्याय प्रियंगु है, उसके तथा यहां पर उल्लिखित प्रियंगु के गुण समान नहीं हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। निम्नलिखित वर्णन केवल यहीं पर वर्णित प्रियंगु का है, कंगु (धान्य) का नहीं। यहाँ पर उपर्युक्त श्लोकों में जिन दो द्रव्यों का उल्लेख किया गया है, उनके लिये गंधप्रियंगु नाम देना ठीक है। हो सकता है कि प्रियङ्गु के संदिग्ध द्रव्य रहने के कारण दो विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का उपयोग भावप्रकाशकार के समय होता रहा हो, जिनमें से एक में गंध हो तथा दूसरे में गंध न हो या बहुत कम हो अथवा एक ही प्रकार के दो क्षुप हों जिनमें से एक में गंध हो और दूसरा निर्गध हो, जिसका आगे स्पष्टीकरण होगा। आजकल इसी उपर्युक्त 'प्रियङ्गु, गंधप्रियङ्गु' के लिये ३ प्रकार के द्रव्यों का उपयोग किया जा रहा है। बंबई की तरफ घऊँला नाम से प्रूनस् महालिव् (Prunus mahaleb) की फलमज्जा बिकती है, जिसका उपयोग प्रियङ्गु के रूप में वहां पर करते हैं। बंबई प्रान्त में श्वेतचंदन, घऊँला एवं कपूरकचरी को जल में पीस कर सुगंधित लेप के लिये प्रयोग किया जाता है। चरक ने रक्तपित्त में दाहशांति के लिये चन्दन और प्रियङ्गु के लेपन से उपलिप्त स्त्रियों के स्पर्श का विधान किया है।१ यह मज्जा छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूमवर्ण की, स्वाद में तिक्त एवं सुगन्धित होती है। दूसरा द्रव्य अॅग्लेइया रॉक्सबर्घियाना (Aglaia roxburghiana) के फल हैं जो कुछ गोल, छोटे, निंब फल सदृश एवं सूखने पर सिकुड़नदार दिखलाई देते हैं। इनका व्यवहार बहुत दिनों से होता आ रहा है लेकिन इसमें गंध नाम मात्र की होती है। तीसरा द्रव्य कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला (Callicarpa macrophylla) नामक गुल्म (झाड़ी) की पुष्प कलिकायें हैं जो छोटी-छोटी कङ्गुनी धान्य सदृश होती हैं। इसका वर्णन अभिनव बूटी दर्पण में है लेकिन वहां पर इसका लेटिन नाम नहीं लिखा है। इसके लेटिन नाम के साथ इसका वर्णन श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'वनौषधिदर्शिका' एवं 'बिहार की वनस्पतियाँ' इन पुस्तकों में किया है। मूल श्लोक एवं अन्य निघंटुओं में दिये हुए फलिनी, कृष्णपर्णी, गन्धफला, कृशाङ्गी, महिलाह्वया, पर्णभेदनी आदि इसके रूपपरिचयात्मक पर्याय इससे कुछ मिलते होने के कारण इसको प्रियङ्गु मानते हैं। एक बात ध्यान देने की है कि इसकी झाड़ी या गुल्म होता है। यह लता नहीं है। पुष्प भी श्वेत वर्ण के होते हैं। श्रीमान् बाबू भीमचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित 'दि एकॉनॉमिक बॉटॅनी ऑफ इण्डिया' से 'अभिनव बूटी दर्पण' में कुछ अंश उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि 'नेपाल, चटगाँव तथा पूर्व बंगाल के कुछ भागों में इसी का व्यवहार प्रियङ्गु के रूप में लोग करते हैं। नेपाल में दयालो तथा श्वेतदयालो नाम से उपयोग में लाई जाने वाली लताओं का वर्णन उपर्युक्त लता से ठीक मिलता है। श्वेतदयालो तथा दयालो एक ही समान हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि श्वेतदयालो गन्धयुक्त होती है एवं इसके पत्ते कुछ बड़े, अधिक श्वेत तथा स्पर्श में खुरदरे होते हैं। इससे मालूम होता है कि भावप्रकाशोक्त प्रियङ्गु तथा गन्धप्रियङ्गु यह दयालो तथा श्वेतदयालो हैं। जिला गढ़वाल और अलमोडा में धूढिया के नाम से यह प्रसिद्ध है तथा कुमाऊँ प्रान्त के वैद्य इसको प्रियङ्गु मानते हैं।' इन तीन द्रव्यों के अतिरिक्त मेंहदी के फूल, कुमुदनी, सरसों के फूल, मालकांगुनी एवं गोंदनी आदि को भी कुछ लोग प्रियंगु मानते हैं। चरक में संधानीय, शोणितास्थापन, पुरीष संग्रहणीय एवं मूत्रविरजनीय गणों में तथा सुश्रुत में अञ्जनादि, एलादि तथा प्रियंग्वादिगणों में प्रियंगु का १. प्रियङ्गुकाञ्चनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणां च वराङ्गनानाम् । (च. चि. अ. ४)