भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० भावप्रकाशनिघण्टुः उल्लेख है। चरक ने रक्त और पित्त की अतिवृद्धि को शान्त करने वालों में गन्धप्रियंगु को श्रेष्ठ माना है (च. सू. अ. २५) । उपर्युक्त तीन द्रव्यों का वर्णन यहां दिया जा रहा है। प्रियंगु १ (फूलप्रियंगु) हि०-प्रियंगु । फूलप्रियंगु, गन्धप्रियंगु, थुंडुंड, बूढ़ीघासी, दइया, दहिया । बं०-मथुरा । नेपा०- दयालो, श्वेतदयालो । पं०-सुमाली । ले०-Callicarpa macrophylla Vahl (कॉलिकार्पा मॅक्रोफाइला वाह.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी) । यह जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों तथा खुले हुये जंगल और परती भूमि में होता है। यह नेपाल, देहरादून के जलप्राय स्थानों, बंगाल तथा बिहार के अनेक स्थानों में पाया जाता है। बलिया स्टेशन के अहाते में लगे हुए इसी प्रकार के एक क्षुप का उल्लेख चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय से प्रकाशित 'सचित्र अभिनव बूटीदर्पण' में किया हुआ है। इसका गुल्म-४ से ८ फीट ऊंचा, और तूल रोमश होता है । शाखाएँ- अनियमित रूप से फैली रहती हैं। पत्ते-५ से १० इंच लंबे, अंडाकार, या अंडाकार-भालाकार, लम्बाग्र, ऊपर चिकने, नीचे तूलरोमश एवं किनारा गोल दन्तुर होता है। पुष्प-गुलाबी, सघन द्विविभक्त १ से ३ इंच व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-सफेद एवं १ १२-१।८ इंच व्यास के होते हैं। डालियाँ पुष्पगुच्छों के बोझ से झुक जाती हैं। इसकी छोटी छोटी प्रियंगु धान्य सदृश पुष्प कलिकाएँ फूल प्रियंगु के नाम से मिलती हैं । इनमें मसलने पर गन्ध भी होती है। शास्त्रीय गन्धप्रियंगु यही मालूम होती है। आभीण लोग गठिया में इसकी पत्तियों से सेंक करते हैं । प्रियंगु २ (घऊँला) हि०-प्रियंगु, महालिव । म०-गडुला, गावल । गु०-घऊंला । अ०-महुलिब । ले०-Prunus mahaleb Linn. (प्रुनस् महालिब् लिन.) । Fam. Rosaceae (रोजैसी) । यह बलोचिस्तान में पाया जाता है। इसका गुल्म अनेक फैली हुई तथा सीधी शाखाओं से युक्त होता है। पत्ते-कुछ लंबाई लिये अंडाकार एवं दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के; फल- छोटे, अंडाकार एवं नोकीले होते हैं। घऊंला नाम से प्रियंगु की मज्जा बंबई के बाजार में बिकती है। यह छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूम वर्ण की, कडवी और सुगंधित होती है। सुगंधि लेप में श्वेत चन्दन तथा कपूर कचरी के साथ इसका उपयोग बंबई प्रान्त में लोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में अल्प मात्रा में पद्मकाष्ठ में पाया जाने वाला हाइड्रोसाये- निक एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहने के कारण इसका उपयोग सावधानी के साथ करना चाहिये । इसके अतिरिक्त इसमें काउमॅरिन् (Coumarin), सॅडिसिलिक् एसिड (Salicylic acid) एवं अंमिग्डॅलिन् (Amygdalin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, वेदनाहर, दीपन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग पीडा- युक्त कुपचन, आमाशय के क्षत तथा आमाशय के अर्बुद में करते हैं। मात्रा-२-५ रत्ती । प्रियंगु ३ हि०-प्रियंगु । कं०-तेविलकामि । ले०-Aglaia roxburghiana Miq. (अँग्लैइया राक्स बर्थियाना मिक्.) । Fam. Meliaceae (मेलियेंसी) ।
कर्पूरादिवर्गः २५१ यह पश्चिमी प्रायद्वीप में कोंकण और मिदनापुर से दक्षिण की ओर सिलोन तक ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका साधारण वृक्ष होता है। छाल किंचित् खाकी रंग की और चिकनी होती है। लकड़ी मजबूत तथा चमकीले लाल रंग की होती है। पत्ते-पक्षवत् पत्ते ३-१० इंच लम्बे और उनके पत्रक संख्या में ५, १॥ से ५॥ इंच लम्बे, पतले अण्डाकार या अण्डाकार-प्रासवत और चिकने होते हैं। पुष्प-व्यास में १ इंच से कम, पीताभ और पत्ती के बराबर लम्बी मञ्जरियों में होते हैं जो पत्र कोण के ऊपर निकलती हैं। फल-कुछ कुछ गोल, निम्बफल सदृश, ३/८-३/४ इंच व्यास के, रोमश तथा हरिण के रंग के रहते हैं जो सूखने पर भूरे रंग के सिकुडनदार तथा आकार में छोटे हो जाते हैं। इसमें १ या २ बीज रहते हैं जो चिपटे करीब ३/८ इंच लम्बे (ताजी अवस्था में) तथा एक तरफ से उन्नतोदर रहते हैं। बीज का स्वाद खट्टा तथा कसैला रहता है। ताजी अवस्था में इसमें सुगन्ध रहती है जो सूखने पर नहीं रहती । इसके फलों का उपयोग बहुत दिनों से प्रियंगु के नाम से किया जा रहा है। हो सकता है कि भावप्रकाशकार ने प्रियंगु का जो फल लिखा है वह यही हो । गुण और प्रयोग-यह शीतल एवं ग्राही होता है। इसका उपयोग ज्वर, पित्त तथा शोथयुक्त रोगों में किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा । अथ रेणुका । तस्या नामानि गुणाँश्चाह रेणुकाराजपुत्री च नन्दिनी कपिला द्विजा । भस्मगन्धा पाण्डुपुत्री स्मृता कौन्ती हरेणुका ॥ रेणुका कटुका पाके तिक्ताक्ष्णोष्णा कटुर्लघुः । पित्तला दीपनी मेध्या पाचनी गर्भपातिनी । बलासवातकृच्छ्रह्वै¹ तृट्कण्डूविषदाहहृत् ॥ १०६ ॥ रेणुका के नाम तथा गुण-रेणुका, राजपुत्री, नन्दिनी, कपिला, द्विजा, भस्मगन्धा, पाण्डुपुत्री, कौन्ती तथा हरेणुका ये सब पर्यायवाची शब्द रेणुका के हैं। रेणुका-पाक में कटुरसयुक्त, किंचित् उष्णवीर्य, तिक्त तथा कटुरस युक्त और लघु होती है एवम् यह पित्तजनक, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पाचक, गर्भ गिराने वाली, कफ तथा वातकारक होती है। यह तृषा, खुजली, विष और दाह को दूर करती है ॥ १०५-१०६ ॥ ४२ रेणुका रेणुका एक संदिग्ध औषध है। रेणुक बीज नाम से विदेश में होने वाली निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फल बिकते हैं। लेकिन संभवतः ये फल शास्त्रीय रेणुका नहीं हैं । शास्त्रीय रेणुका शायद पिप्पलीवर्ग की पाइपर ऑरेण्टियकम् वालू. (Piper aurantiacum Wall.) के फल हैं। कुछ लोग निर्गुण्डी के बीज को ही रेणुका कहते हैं जो उसके प्रतिनिधि हो सकते हैं। चरक में शिरोविरेचन एवं वमनोपग गणों में रेणुक बीज का पाठ है। ग्रहणी के मध्वरिष्ट में एवं व्रणपीडन रूप में रेणुका का उल्लेख है । चरक, सुश्रुत तथा रा. नि. इसको गर्भपातक नहीं मानते । सुश्रुत में हरेणुका का उल्लेख एलादिगण, पिप्पल्यादिगण में तथा रेणुका का उल्लेख कटु- वर्ग में एवं भगंदर, नाडी, उपदंश व्रण तथा विष में इसका प्रयोग किया गया है। १. बलासवातवैकलव्य इति पाठो० । तृष्णादाहविषक्लैव्यकफवातविनाशिनी ॥ (नि. र.)