भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 143 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

२५२ भावप्रकाशनिघण्टुः यहाँ पर वर्णन विदेश से आने वाले निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फलों का किया गया है। हि०-रेणुका, रेणुक, संभालू का बीज । गु०-हरेणु । म०-रेणुक बीज । इरा०-पंजनगुस्त । अ०-अथलक् । ले०-Vitex agnus-castus Linn. (वाइटेक्स एग्नस्-कास्टस् लिन्.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनैसी) । यह बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय प्रदेश आदि प्रदेशों में होता है । देहरादून के 'वैज्ञानिक बाग' में यह लगाया हुआ है । इसका गुल्म या वृक्ष होता है जिसकी शाखाएं चौपहल होती हैं। पत्ते-लम्बे पत्रनाल से युक्त, करतलाकार संयुक्त, पत्रक पांच कभी-कभी सात भी, भालाकार और लम्बे नोक वाले होते हैं। फल-साधारण मटर के बराबर, अण्डाकृति तथा धूसर वर्ण के होते हैं। बाह्य दल एवं वृन्त इसमें लगा रहता है। ये फल बहुत कड़े रहते हैं तथा काटने पर इसके अन्दर ४ खण्ड दिखलाई देते हैं जिनमें एक-एक छोटा चिपटा बीज रहता है। भारतीय निर्गुण्डी के फल से ये फल करीब आधे छोटे होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें कास्टाइन (Castine) नामक एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील दाहजनक पदार्थ, अम्लरूप्य एवं तैल, ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—ईरानी रेणुक बीज स्तम्भन, शोथघ्न, आनुलोमिक, मूत्रजनन एवं उत्तेजक हैं। प्लीहावृद्धि तथा यकृत रोग के कारण उत्पन्न जलोदर में इसको देते हैं। हिचकी में छोटी पीपल के साथ इसको खिलाते हैं। मात्रा—४ र०-१ मा० । अथ ग्रन्थिपर्णम् ( गठिवन ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिपर्णं ग्रन्थिकञ्च काकपुच्छञ्च गुच्छकम् । नीलपुष्पं सुगन्धञ्च कथितं तैलपर्णकम् ॥ १०८ ॥ ग्रन्थिपर्णं तिक्ततीक्ष्णं कटूष्णं दीपनं लघु । कफवातविषश्वासकण्डूदौर्गन्ध्यनाशनम् ॥१०८॥ गठिवन के नाम तथा गुण—ग्रन्थिपर्ण, ग्रन्थिक, काकपुच्छ, गुच्छक, नीलपुष्प, सुगन्ध और तैलपर्णक ये सब संस्कृत नाम गठिवन के हैं। गठिवन-तिक्त तथा कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा लघु होता है। यह कफ, वात, विष, श्वास, खुजली और दुर्गन्ध इन सबों को दूर करनेवाला होता है ॥ १०७-१०८ ॥ ४३ गठिवन गठिवन का स्वरूप भी संदिग्ध ही है। आगे स्थौणेयक तथा चोरक नामक दो ग्रन्थिपर्ण के भेद दिये हुये हैं वे भी संदिग्ध ही हैं। कुछ विद्वान् इन तीनों नामों को एक दूसरे का पर्याय मानते हैं। तालीसपत्र के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में से एक द्रव्य का स्थानिक नाम थुनेर होने से कुछ विद्वान् उसे ही स्थौणेयक मानते हैं। इस तरह यदि ग्रन्थिपर्ण एवं चोरक को थुनेर सजा- तीय माना जाय तो ये सब द्रव्य तालीसपत्र (थुनेर) के वर्ग के हो जाते हैं। श्री शालिग्राम जी ने इसे आसाम की ओर बहुत उत्पन्न होने वाली तृण जाति की गांठदार सुगन्धित वनस्पति माना है जिसमें पत्ते अंगुली के समान लम्बे-लम्बे और फूल नीले गुच्छों में आते हैं। कुछ लोग वनतुलसी को गठिवन मानते हैं। श्री डॉ. वा. ग. देसाई ने ग्रन्थिपर्ण नाम से एक वनस्पति का वर्णन किया है। उसके गुण शास्त्रोक्त ग्रन्थिपर्ण से मिलते नहीं फिर भी सादृश्य होने से उसका संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया जाता है। कर्पूरादिवर्गः २५३ सं०-ग्रन्थितृण । हि०-केसो, मचोटी । पं०-मचूटि, केसू । काश्मी०-द्रोब । सिं०-इंद्राणी । इरा०-हझार, बंदुक । अं०-Knot-grass (नॉट्-ग्रास्) । ले०-Polygonum aviculare Linn. (पॉलिगोनम् एविक्युलेर लिन्.) । Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह काश्मीर से कुमाऊं तक ६ से १२ हजार फीट की ऊँचाई में होता है। इसका छोटा सा क्षुप होता है। जड़-लम्बी, कुछ काष्ठमय एवं चिमड़ी होती है तथा उससे अनेक उपमूल निकले रहते हैं। शाखाएं-बहुत सी, जमीन पर फैली हुई एवं गोल होती हैं। इसकी टहनियों की ग्रंथियाँ बहुत गांठदार होती हैं तथा वहीं से पत्र निकलते हैं। पत्र-एकान्तर, शल्याकृति, अखण्ड, धूसर रंग के एवं १ इञ्च से छोटे होते हैं। पुष्प-श्वेत या लाल रंग के होते हैं। फल-त्रिकोणयुक्त, हरे एवं अग्रपर सूक्ष्म झुर्रीदार, चमकीले एवं काले होते हैं। सिन्ध में बीजों को बीजवंद कहते हैं। बला के बीजों को भी अनेक स्थानों में बीजवंद कहा जाता है। चिकित्सा में इसके मूल, पञ्चाग एवं बीजों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें पोलिगोनिन् अम्ल तथा सुगन्धित तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसकी जड़ रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, आनुलोमिक, ज्वरघ्न एवं कफघ्न है। बीज संसन, मूत्रजनन एवं वामक होते हैं। (१) अश्मरी या मूत्रकृच्छ्र में इसके पंचाग के क्वाथ या मूल रस का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बहुत लाभ होता है। (२) जीर्ण अतिसार में मूल रस या पंचांग रस देते हैं। (३) विषमज्वर में मूल रस का उपयोग करते हैं। (४) फुफ्फुस विकारों में विशेष कर श्वसनिका शोथ एवं कुकास में पंचांग क्वाथ पिलाते हैं। (५) सूखी हुई जड़ को पीसकर लगाने से वेदना कम होती है। विसर्प, बस्तिपीडा एवं आंत्र की पीडा में पत्तों का लेप किया जाता है। अथ स्थौणेयकम् । (ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः, ईषत्सुगन्धं 'थुनेर' इति लोके प्रसिद्धम् ) तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्थौणेयकं बर्हिबर्हं शुकबर्हञ्च कुक्कुरम् । शीर्णरोमशुकञ्चापि शुकपुष्पं शुकच्छदम् ॥१०९॥ स्थौणेयकं कटु स्वादु तिक्तं स्निग्धं त्रिदोषनुत् ॥ ११० ॥ मेधाशुक्रकरं रुच्यं रक्षोघ्नं ज्वरजन्तुजित् । हन्ति कुष्ठास्रतृड्दाहदौर्गन्ध्यतिलकालकान् ॥ १११ ॥ 'गठिवन' के ही भेद में थोड़ी सुगन्ध से युक्त जो 'थुनेर' नाम से लोक में प्रसिद्ध औषध है, उसके नाम तथा गुण—स्थौणेयक, बर्हिबर्ह, शुकबर्ह, कुक्कुर, शीर्णरोम, शुक, शुकपुष्प और शुक- च्छद ये सब संस्कृत नाम 'थुनेर' के हैं। थुनेर—कटु, तिक्तरस युक्त, स्वादिष्ट, स्निग्ध, तीन दोषों को दूर करने वाला, मेधा तथा शुक्र को बढ़ाने वाला, रुचिकारक, रक्षोघ्ननाशक एवं ज्वर, कृमि, कुष्ठ, रक्तविकार, तृषा, दाह, दुर्गन्ध और तिलकालक नामक रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ १०९-१११ ॥