भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 143 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४४ थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थि- पर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि. अ. ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि. अ. २३), बलातैल में (चि. अ. २८) एवं मदनफल उल्कारिकामोदक योग में (क. अ. १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण (सू. अ. ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०--Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्यूनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०--भांट, सं०--कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे क्षुप प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं। प्रत्येक भाग कडु और दुर्गन्धयुक्त होता है। पत्र-विपरीत, ४-९ इञ्च लम्बे, १-६ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, लम्बे नोक एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं। बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है। आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है। इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है। बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है। केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं। उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठा में पीस कर देते हैं। त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं। अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेडर' इति नेपालदेशे भवति । तस्य नामानि गुणाँश्चाह निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पुत्रः क्षेमको रिपुः । चोरको १ मधुरस्तिक्तः कटुः पाके कटुर्लघुः ॥ ११२ ॥ तीक्ष्णो हृद्यो हिमो हन्ति कुष्ठकण्डूकफानिलान् । रक्षोऽश्रीस्वेदमेदोऽस्रज्वरगन्धविषव्रणान् ॥ 'गठिवन' का ही भेद 'भटेडर' है जो कि नेपाल देश में उत्पन्न होता है, उसके नाम तथा गुण—निशाचर, धनहर, कितव, गणहासक, चोरक, शङ्कित, चण्ड, दुष्पुत्र, क्षेमक और रिपु ये सब संस्कृत नामक 'भटेडर' के हैं। भटेडर-मधुर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, पाक में कटु, लघु, तीक्ष्ण, हृदय के लिये हितकर और शीतवीर्य है। यह—कुष्ठ, खुजली, कफ, वात, रक्षोग्रह, अलक्ष्मी, पसीना, मेदरोग, रक्तविकार, ज्वर, दुर्गन्ध, विष और व्रण इन सबों को दूर करता है ॥११२-११३॥ ४५ भटेडर ( चोरक ) चोरक यह भी संदिग्ध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है। कुछ लोगों ने स्थौणेयक एवं चोरक को एक ही वनस्पति माना है। चरक में 'संज्ञास्थापन दशेमानि' में इसका उल्लेख है। धूपन द्रव्यों के साथ इसका उल्लेख है और उन्मादोक्त महापैशाचिक घृत में इसका प्रयोग किया १. रोचको इति पाठान्० । कर्पूरादिवर्गः २५५ गया है। अपस्मार, हिक्का, श्वास एवं पीनस, नासारोग आदि में भी चोरक का उल्लेख है। कुछ लोग पान की जड़ का व्यवहार 'चोरक' नाम से करते हैं। पञ्जाब की तरफ चोरा नाम से एक द्रव्य मिलता है। इसका लेटिन नाम Angelica glauca Edgw.; Fam. Umbelliferae (अंजेनिका ग्लॉका, एज., अम्बेलीफेरी) दिया हुआ है। यह पश्चिम हिमालय में काश्मीर से लेकर सिमला तक ८०००-१०००० की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसका क्षुप ४-७ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-चिकना, स्वावलम्बी, पोला तथा महीन प्रसी- ताओं से युक्त रहता है। पत्ते-प्रायः बड़े, १-३ पक्षवत् होते हैं। पत्रक-संख्या में ३, अण्डाकार या भालाकार, अनियमित एवं तीक्ष्ण दांतों से युक्त, ऊपरी पृष्ठ गहरे रंग का एवं अधोपृष्ठ श्वेतलिस रहता है। पुष्प-बहुत सफेद या नीलारुण रंग के तथा सवृन्तमुर्धज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल- चिकने, चिपटे आयताकार, १३ मि. मि. लम्बे एवं ६ मि. मि. चौड़े होते हैं। गुण और प्रयोग—यह हृद्य एवं उत्तेजक है और आध्मान एवं कुपचन में भी उपयोगी हैं। अथ तालीसपत्रम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तालीसमुक्तं पत्राढ्यं धात्रीपत्रञ्च तत्स्मृतम् ॥ ११४ ॥ तालीसं लघु तीक्ष्णोष्णं श्वासकासकफानिलान् । निहन्यरुचिगुल्मामवह्निमान्द्यक्षयामयान् ॥ तालीसपत्र के नाम तथा गुण—तालीस, पत्राढ्य और धात्रीपत्र से संस्कृत नाम 'तालीसपत्र' के हैं। तालीसपत्र-लघु, तीक्ष्ण और उष्णवीर्य होता है एवं यह-श्वास, खांसी, कफ, वात, अरुचि, गुल्म, आम, अग्नि की मन्दता और क्षयरोग इन सबों को दूर करता है ॥ ११४-११५ ॥ ४६ तालीसपत्र तालीसपत्र—यह नाम विभिन्न वर्गों के वृक्षों के पत्तों को भिन्न स्थानों में दिया हुआ दिख- लाई देता है। पहले लोग प्राचीनआमलक-फ्लैकोर्टिआ कॅटाफ्रॅक्टा राक्स (Flacourtia cataphracta Roxb.) के पत्तो को तालीसपत्र कहा करते थे। दक्षिण में कहीं कहीं तमालपत्र-सिर्नेमोमम् तमाल (Cinnamomum tamal ) के पत्रों को तालीसपत्र कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, राज- पूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य टेक्सस् बॅकेटा (Taxus baccata) के पत्तों का व्यवहार तालीस पत्र के नाम से करते हैं। इसे कुछ लोग स्थौणेयक भी मानते हैं। बंगाल के वैद्य एबिस वेब्बियाना (Abies webbiana) के पत्तों का व्यवहार तालीसपत्र के रूप में करते हैं। नेपाल एवं पंजाब के कुछ वैद्य तालीसफार, रोडोडेन्ड्रोन् एन्थोपोमोन (Rhododendron anthopogon) के पत्तों का व्यवहार करते हैं जिसकी २, ३ अन्य उपजातियाँ भी होती हैं। प्राचीनआमलक का वर्णन आगे फलवर्ग में आया है तथा तमाल पत्र का वर्णन पहले (पृष्ठ २२८) किया जा चुका है। यहाँ पर बाकी तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। चरक में दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है। सुश्रुत में शिरोविरेचनगण में इसका पाठ है। तालीसपत्र के शास्त्रीय गुण इस प्रकार दिये हुए हैं—यह तिक्त, कडु, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, शिरोविरेचन तथा कफ, वात, कास, श्वास, क्षय, वमन, अरुचि, गुल्म, आम, अग्निमांद्य और कृमि का नाश करने वाला है।